होम > Blog

Blog / 28 Jan 2026

डीआरडीओ की हाइपरसोनिक मिसाइल

संदर्भ:

26 जनवरी 2026 को आयोजित 77वें गणतंत्र दिवस परेड में भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने लंबी दूरी की पोत-रोधी हाइपरसोनिक मिसाइल का सार्वजनिक प्रदर्शन किया। यह उपलब्धि भारत की रक्षा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक और दूरगामी महत्व रखने वाली उपलब्धि मानी जा रही है।

एलआर-एएसएचएम के बारे में:

      • एलआर-एएसएचएम एक हाइपरसोनिक ग्लाइड मिसाइल है, जिसे डीआरडीओ द्वारा स्थिर एवं गतिशील समुद्री लक्ष्यों पर सटीक प्रहार के उद्देश्य से विकसित किया गया है। इसकी अधिकतम मारक क्षमता लगभग 1,500 किलोमीटर है। इस मिसाइल को गणतंत्र दिवस परेड के दौरान नई दिल्ली के कर्तव्य पथ पर इसके मोबाइल लॉन्चर के साथ प्रदर्शित किया गया।
      • यह मिसाइल अर्ध-बैलिस्टिक पथ का अनुसरण करती है। इसकी उड़ान की प्रारंभिक अवस्था बैलिस्टिक मिसाइल के समान होती है, किंतु इसके पश्चात यह अपेक्षाकृत कम ऊँचाई पर वायुमंडल के भीतर आगे बढ़ती है और स्किपतकनीक का प्रयोग करती है। इससे मिसाइल को उच्च गतिशीलता प्राप्त होती है तथा यह शत्रु की निगरानी प्रणालियों से बचने में सक्षम हो जाती है।
      • यह मिसाइल प्रारंभिक चरण में लगभग मैक 10 की गति प्राप्त करती है और औसतन मैक 5 की गति बनाए रखती है, जिससे इसे पहचानना एवं अवरोधित करना अत्यंत कठिन हो जाता है।

India's New Hypersonic Anti-Ship Missile Shown Off During Military Parade

मुख्य तकनीकी विशेषताएँ:

      • हाइपरसोनिक उड़ान एवं गतिशीलता: एलआर-एएसएचएम में दो-चरणीय ठोस ईंधन रॉकेट प्रणोदन प्रणाली का उपयोग किया गया है। प्रथम चरण मिसाइल को हाइपरसोनिक गति तक पहुँचाता है, जबकि द्वितीय चरण इसे और आगे ले जाकर बिना इंजन वाले ग्लाइड चरण में प्रवेश कराता है। इस चरण में मिसाइल नियंत्रित मोड़ लेती है, जिससे बचने की संभावना और अनिश्चितता बढ़ती है।
      • कम पहचान क्षमता: अत्यधिक गति के साथ कम ऊँचाई पर उड़ान भरने के कारण यह मिसाइल भूमि एवं समुद्र आधारित रडार प्रणालियों से बच निकलती है। परिणामस्वरूप शत्रु को प्रतिक्रिया देने का समय अत्यंत सीमित रह जाता है और उसकी बहुस्तरीय वायु रक्षा प्रणाली प्रभावहीन हो जाती है।
      • स्वदेशी तकनीक: एलआर-एएसएचएम में प्रयुक्त सभी एवियोनिक्स, सेंसर तथा मार्गदर्शन प्रणालियाँ पूर्णतः स्वदेशी हैं। यह रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत की दिशा में भारत के निरंतर प्रयासों को स्पष्ट रूप से प्रतिबिंबित करता है।

रणनीतिक महत्व:

      • समुद्री क्षेत्र में सुदृढ़ रोकथाम क्षमता: लंबी दूरी से शत्रु पोतों पर प्रहार करने की क्षमता के कारण एलआर-एएसएचएम भारत की समुद्री रोकथाम शक्ति को उल्लेखनीय रूप से सशक्त बनाती है। हिंद महासागर क्षेत्र में यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जहाँ नौसैनिक शक्ति व्यापार, सुरक्षा और भू-राजनीतिक स्थिरता को सीधे प्रभावित करती है।
      • त्वरित प्रतिक्रिया एवं प्रतिरोधक क्षमता: अपनी अत्यधिक गति के कारण यह मिसाइल अपनी अधिकतम सीमा को लगभग 15 मिनट में पार कर सकती है। इससे शत्रु के निर्णय लेने और प्रतिक्रिया देने की समय-सीमा अत्यंत संकुचित हो जाती है, जिससे भारत की प्रतिरोधक क्षमता कई गुना बढ़ जाती है।
      • बहु-क्षेत्रीय उपयोग की संभावना: प्रारंभिक चरण में इसे भारतीय नौसेना के लिए तटीय बैटरियों से तैनात किया जाएगा। भविष्य में इसके जहाज़ से प्रक्षेपित, वायु से प्रक्षेपित तथा थलसेना और वायुसेना के लिए पृथक संस्करण विकसित किए जाने की भी संभावना है, जिससे यह एक बहुउपयोगी हथियार प्रणाली के रूप में उभर सकती है।

प्रभाव:

एलआर-एएसएचएम के अनावरण के साथ भारत उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में सम्मिलित हो गया है, जिनके पास उन्नत हाइपरसोनिक हथियार तकनीक उपलब्ध है। इस वर्ग में अमेरिका, रूस और चीन जैसे देश शामिल हैं। यह उपलब्धि सामग्री विज्ञान, प्रणोदन तकनीक और उच्च गति वायुगतिकी के क्षेत्र में भारत की प्रगति को दर्शाती है, जो सतत हाइपरसोनिक उड़ान के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।

ग्लाइड वाहन आधारित मिसाइल प्रणालियों के साथ-साथ डीआरडीओ स्क्रैमजेट प्रणोदन तकनीक पर आधारित हाइपरसोनिक क्रूज़ मिसाइलों के विकास पर भी कार्य कर रहा है। यह हाइपरसोनिक युद्ध क्षमता के विकास के लिए भारत की द्वि-आयामी रणनीति को दर्शाता है।

निष्कर्ष:

डीआरडीओ द्वारा विकसित एलआर-एएसएचएम हाइपरसोनिक मिसाइल भारत की रणनीतिक और तकनीकी क्षमताओं में एक गुणात्मक परिवर्तन का प्रतीक है। इसके रक्षा ढांचे में सम्मिलित होने से भारत की प्रतिरोधक शक्ति, समुद्री पहुँच तथा त्वरित प्रहार क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। यह उपलब्धि वैश्विक रक्षा प्रौद्योगिकी परिदृश्य में भारत की स्थिति को और अधिक सुदृढ़ बनाती है। उन्नत हथियार प्रणालियों में निरंतर नवाचार के माध्यम से भारत न केवल अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ कर रहा है, बल्कि आत्मनिर्भरता और तकनीकी बढ़त भी सुनिश्चित कर रहा है, ऐसे युग में जहाँ युद्ध की प्रकृति तीव्र गति और अत्याधुनिक तकनीक से परिभाषित हो रही है।