संदर्भ:
हाल ही में 18 सितंबर 2026 को चेन्नई के तिरुवन्मियूर स्थित भरत कलाक्षेत्र सभागार में 17वें कथकली महोत्सव का उद्घाटन किया गया। इसका आयोजन संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत कलाक्षेत्र फाउंडेशन द्वारा किया गया है। यह तीन दिवसीय महोत्सव 18 से 20 सितंबर 2026 तक आयोजित किया जा रहा है।
महोत्सव की थीम:
इस महोत्सव की थीम “कथा रस संगम – कॉनफ्लुएंस ऑफ एसेंस ऑफ स्टोरीज़” है, जो कथकली की कथा-वाचन और भाव-अभिव्यक्ति से जुड़े पक्षों को रेखांकित करती है।
कथकली क्या है?
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- कथकली केरल की एक प्रमुख शास्त्रीय नृत्य-नाट्य परंपरा है, जिसमें कहानी-कथन, नृत्य, संगीत, भव्य वेशभूषा, चेहरे के भाव और प्रतीकात्मक हस्त-मुद्राओं का संयोजन होता है। इसका विकास लगभग 17वीं शताब्दी के आसपास हुआ और इस पर केरल की पूर्ववर्ती नाट्य परंपराओं, जैसे कूडियाट्टम, कृष्णनाट्टम और रामनाट्टम, का प्रभाव रहा है।
- ‘कथकली’ शब्द ‘कथा’, जिसका अर्थ “कहानी” और ‘कली’, जिसका अर्थ “नाटक/खेल” है, से मिलकर बना है।
- कथकली केरल की एक प्रमुख शास्त्रीय नृत्य-नाट्य परंपरा है, जिसमें कहानी-कथन, नृत्य, संगीत, भव्य वेशभूषा, चेहरे के भाव और प्रतीकात्मक हस्त-मुद्राओं का संयोजन होता है। इसका विकास लगभग 17वीं शताब्दी के आसपास हुआ और इस पर केरल की पूर्ववर्ती नाट्य परंपराओं, जैसे कूडियाट्टम, कृष्णनाट्टम और रामनाट्टम, का प्रभाव रहा है।
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कथकली की प्रमुख विशेषताएँ:
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- भव्य श्रृंगार और वेशभूषा: कथकली में पात्रों के स्वरूप और उनके चरित्र को दर्शाने के लिए विशेष ‘वेषम्’ (श्रृंगार) का प्रयोग किया जाता है। पच्चा (हरा रंग) सामान्यतः उदात्त, महान और सद्गुणी पात्रों को दर्शाता है, जबकि अन्य श्रृंगार श्रेणियाँ अलग-अलग प्रकार के पात्रों की पहचान कराती हैं।
- नवरस और चेहरे के भाव: कलाकार भावनाओं को व्यक्त करने के लिए आँखों, भौंहों और चेहरे की मांसपेशियों की सूक्ष्म एवं सटीक गतिविधियों का प्रयोग करते हैं। इसमें शास्त्रीय नवरस की अवधारणा के आधार पर भावों को प्रस्तुत किया जाता है।
- मुद्राएँ: हाथों की मुद्राएँ या ‘मुद्रा’ कथकली की महत्वपूर्ण प्रतीकात्मक भाषा हैं। इनके माध्यम से कलाकार संवाद, क्रियाओं और कथा के विभिन्न तत्वों को व्यक्त करते हैं।
- संगीत और वाद्य संगति: कथकली प्रस्तुति में गायकों के साथ पारंपरिक ताल वाद्यों का प्रयोग किया जाता है। इनमें प्रमुख रूप से चेंडा, मड्डलम और चेंगिला शामिल हैं।
- भव्य श्रृंगार और वेशभूषा: कथकली में पात्रों के स्वरूप और उनके चरित्र को दर्शाने के लिए विशेष ‘वेषम्’ (श्रृंगार) का प्रयोग किया जाता है। पच्चा (हरा रंग) सामान्यतः उदात्त, महान और सद्गुणी पात्रों को दर्शाता है, जबकि अन्य श्रृंगार श्रेणियाँ अलग-अलग प्रकार के पात्रों की पहचान कराती हैं।
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कलाक्षेत्र फाउंडेशन के बारे में:
कलाक्षेत्र फाउंडेशन की स्थापना 1936 में रुक्मिणी देवी अरुंडेल द्वारा चेन्नई में की गई थी। इस संस्थान ने भारतीय शास्त्रीय कलाओं, विशेष रूप से भरतनाट्यम, संगीत, नृत्य और पारंपरिक हस्तशिल्प के संरक्षण, शिक्षा एवं प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
निष्कर्ष:
17वाँ कथकली महोत्सव भारत की पारंपरिक प्रदर्शन कलाओं की स्थायी प्रासंगिकता को रेखांकित करता है। इस प्रकार के महोत्सव सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक इसके हस्तांतरण तथा व्यापक प्रसार को बढ़ावा देते हैं। साथ ही, ये भारत की समृद्ध अमूर्त सांस्कृतिक परंपराओं के लिए संस्थागत समर्थन को मजबूत करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

