संदर्भ:
हाल ही में भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने नई दिल्ली में ओल चिकी लिपि के शताब्दी समारोह का उद्घाटन किया। यह समारोह वर्ष 1925 में पंडित रघुनाथ मुर्मू द्वारा इस लिपि के निर्माण के 100 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया। यह आयोजन भारत जैसे बहुभाषी देश में भाषाई विविधता, सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों के संरक्षण को लेकर देश की व्यापक नीति को भी दर्शाता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
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- संथाली भारत की प्रमुख जनजातीय भाषाओं में से एक है। लंबे समय तक यह भाषा लोककथाओं, गीतों और कथा-वाचन जैसी मौखिक परंपराओं के माध्यम से जीवित रही। इन परंपराओं ने सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखा, लेकिन अपनी अलग लिपि के अभाव में औपचारिक शिक्षा, साहित्यिक विकास और सरकारी स्तर पर मान्यता सीमित रही।
- वर्ष 1925 में पंडित रघुनाथ मुर्मू ने ओल चिकी लिपि का निर्माण किया, जिससे संथाली भाषा को वैज्ञानिक और ध्वनि-संबंधी लेखन प्रणाली प्राप्त हुई। उनकी साहित्यिक कृति हाई सेरेना (1936) सहित उपन्यासों, कविताओं और व्याकरण पुस्तकों ने संथाली को मौखिक परंपरा से एक सशक्त लिखित भाषा में परिवर्तित किया। इससे जनजातीय समाज में आत्मगौरव और पहचान को मजबूती मिली।
- संथाली भारत की प्रमुख जनजातीय भाषाओं में से एक है। लंबे समय तक यह भाषा लोककथाओं, गीतों और कथा-वाचन जैसी मौखिक परंपराओं के माध्यम से जीवित रही। इन परंपराओं ने सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखा, लेकिन अपनी अलग लिपि के अभाव में औपचारिक शिक्षा, साहित्यिक विकास और सरकारी स्तर पर मान्यता सीमित रही।
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संरचनात्मक और भाषाई विशेषताएँ:
अक्षर: कुल 30, जिनमें प्रत्येक एक विशिष्ट स्वर या व्यंजन का प्रतिनिधित्व करता है।
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- ध्वन्यात्मक शुद्धता: एक चिन्ह का संबंध केवल एक ही ध्वनि से होता है।
- सांस्कृतिक विशिष्टता: संथाली भाषा की विशिष्ट ध्वनियों को सटीक रूप से व्यक्त करती है, जिन्हें रोमन, बंगाली या देवनागरी जैसी लिपियाँ पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पातीं
- प्रभाव: साक्षरता, शिक्षा, साहित्य और डिजिटल उपयोग को बढ़ावा; यूनिकोड में समावेश तथा कीबोर्ड सुविधा उपलब्ध
- ओल चिकी की सटीक संरचना ने संथाली भाषा के मानकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिससे शिक्षण, प्रकाशन और पीढ़ियों के बीच ज्ञान के हस्तांतरण को नई गति मिली है।
- ध्वन्यात्मक शुद्धता: एक चिन्ह का संबंध केवल एक ही ध्वनि से होता है।
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संवैधानिक मान्यता और वर्तमान महत्व:
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- वर्ष 2003 में 92वें संविधान संशोधन के माध्यम से संथाली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया और ओल चिकी को इसकी आधिकारिक लिपि के रूप में मान्यता दी गई। दिसंबर 2025 में ओल चिकी लिपि का प्रयोग करते हुए भारतीय संविधान का संथाली भाषा में अनुवाद किया गया।
- इससे जनजातीय समुदायों को अपनी भाषा में शासन और कानून को समझने तथा लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग लेने का अवसर मिला।
- शताब्दी समारोह भारत में जनजातीय सशक्तिकरण, भाषाई विविधता और सांस्कृतिक समावेशन पर दिए जा रहे विशेष बल को भी दर्शाता है, जो एक भारत श्रेष्ठ भारत जैसे अभियानों के अनुरूप है।
- वर्ष 2003 में 92वें संविधान संशोधन के माध्यम से संथाली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया और ओल चिकी को इसकी आधिकारिक लिपि के रूप में मान्यता दी गई। दिसंबर 2025 में ओल चिकी लिपि का प्रयोग करते हुए भारतीय संविधान का संथाली भाषा में अनुवाद किया गया।
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निष्कर्ष:
ओल चिकी लिपि का शताब्दी वर्ष केवल एक लिपि का उत्सव नहीं, बल्कि जनजातीय पहचान, सांस्कृतिक दृढ़ता और भाषाई न्याय की स्वीकृति है। 1925 में इसके निर्माण से लेकर संवैधानिक मान्यता और आधुनिक डिजिटल उपयोग तक, ओल चिकी ने संथाली भाषा को शिक्षा, साहित्य और सार्वजनिक जीवन में सशक्त बनाया है। इसकी यह यात्रा दर्शाती है कि स्वदेशी भाषाओं का संरक्षण भारत की सांस्कृतिक विविधता, लोकतांत्रिक सहभागिता और सामाजिक विरासत के लिए अत्यंत आवश्यक है।

