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Daily-current-affairs / 12 Aug 2026

विश्व हाथी दिवस 2026: हाथियों के साथ सुरक्षित सह-अस्तित्व की ओर भारत की पहल

विश्व हाथी दिवस 2026: हाथियों के साथ सुरक्षित सह-अस्तित्व की ओर भारत की पहल

संदर्भ:

हर वर्ष 12 अगस्त को विश्व हाथी दिवस (World Elephant Day) मनाया जाता है। इसका उद्देश्य हाथियों के संरक्षण, उनके प्राकृतिक आवासों की सुरक्षा तथा उनके सामने मौजूद मानवजनित खतरों के प्रति वैश्विक जागरूकता बढ़ाना है। विश्व हाथी दिवस की पहल वर्ष 2012 में शुरू की गई थी।

भारत के लिए हाथियों का संरक्षण विशेष महत्व रखता है, क्योंकि देश में दुनिया की जंगली एशियाई हाथी आबादी का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा पाया जाता है। इसलिए भारत की संरक्षण नीति केवल हाथियों की संख्या बनाए रखने तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके आवास, पारिस्थितिक गलियारों और मानव-हाथी सह-अस्तित्व को सुनिश्चित करने पर भी केंद्रित है।

एशियाई हाथी: भारत के पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा

एशियाई हाथी (Elephas maximus) एशिया का सबसे बड़ा स्थलीय स्तनपायी है। यह भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ देशों में पाया जाता है, जिसमें इसकी सबसे बड़ी आबादी भारत में है।

हाथी को 'की-स्टोन प्रजाति' (Keystone Species) तथा 'पारिस्थितिकी तंत्र अभियंता' (Ecosystem Engineer) के रूप में जाना जाता है। अपनी भोजन एवं आवागमन संबंधी गतिविधियों के माध्यम से हाथी वन पारिस्थितिकी तंत्र की संरचना को प्रभावित करते हैं। वे बीजों के प्रसार, पोषक तत्वों के चक्रण तथा वन पुनर्जनन में योगदान देते हैं। उनकी आवाजाही से बने रास्ते और जलस्रोत अन्य वन्यजीवों के लिए भी उपयोगी हो सकते हैं।

हाथियों के इसी व्यापक पारिस्थितिक महत्व को देखते हुए भारत ने वर्ष 2010 में हाथी को 'राष्ट्रीय विरासत पशु' (National Heritage Animal) घोषित किया।

भारत में हाथियों की वर्तमान स्थिति

भारत में हाथियों की संख्या का आकलन करने के लिए समकालिक अखिल भारतीय हाथी अनुमान (SAIEE) 2021–25 किया गया। इस आकलन में पहली बार बड़े स्तर पर डीएनए आधारित आनुवंशिक तकनीकों को शामिल किया गया और भारत में जंगली हाथियों की संख्या 22,446 आंकी गई। नई पद्धति के कारण इस आंकड़े की तुलना पुराने अनुमानों से सीधे करना उचित नहीं है। इसका महत्व एक अधिक वैज्ञानिक और विश्वसनीय आधाररेखा तैयार करने में है।

हाथियों की प्रमुख जैविक एवं व्यवहारिक विशेषताएँ

  • गर्भावधि: लगभग 22 महीने, जो स्थलीय स्तनधारियों में सबसे लंबी गर्भावधियों में से एक है।
  • सामाजिक संरचना: हाथियों के झुंड मुख्यतः मातृसत्तात्मक होते हैं और उनका नेतृत्व अनुभवी वयस्क मादाएँ करती हैं।
  • वयस्क नर: सामान्यतः अकेले रहते हैं या नर हाथियों के समूहों में पाए जाते हैं।
  • पारिस्थितिक भूमिका: हाथी प्रमुख प्रजाति और पारिस्थितिकी तंत्र अभियंता के रूप में कार्य करते हैं।
  • आवास: वन, घासभूमि तथा मिश्रित परिदृश्य, विशेषकर वे क्षेत्र जहाँ पर्याप्त भोजन और जल उपलब्ध हो।

प्रोजेक्ट एलिफेंट

भारत सरकार ने वर्ष 1992 में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के अंतर्गत प्रोजेक्ट एलिफेंट (Project Elephant) को केंद्र प्रायोजित योजना के रूप में शुरू किया।

इसका मुख्य उद्देश्य जंगली हाथियों, उनके आवासों और प्रवास मार्गों का संरक्षण करना तथा मानव-हाथी संघर्ष को कम करना है।

प्रमुख उद्देश्य

  • हाथियों की आबादी और प्राकृतिक आवासों का संरक्षण।
  • हाथी गलियारों और उनके आवागमन मार्गों की सुरक्षा।
  • मानव-हाथी संघर्ष को कम करना।
  • बंदी हाथियों के संरक्षण एवं बेहतर प्रबंधन को बढ़ावा देना।
  • हाथी-बहुल राज्यों को वित्तीय एवं तकनीकी सहायता उपलब्ध कराना।
  • वैज्ञानिक निगरानी तथा आधुनिक तकनीकों का उपयोग बढ़ाना।

वर्तमान में हाथी संरक्षण में डीएनए आधारित निगरानी, रेडियो-कॉलरिंग, कैमरा ट्रैप, प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों और अन्य तकनीकी साधनों का उपयोग बढ़ रहा है।

हाथी अभयारण्य और पारिस्थितिक गलियारे

भारत में वर्तमान में 33 अधिसूचित हाथी अभयारण्य (Elephant Reserves) हैं, जो 14 हाथी-बहुल राज्यों में लगभग 80,777 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हैं। 2014 के बाद हाथी अभयारण्यों की संख्या 26 से बढ़कर 2025–26 तक 33 हो गई है।

हाथियों के संरक्षण में केवल संरक्षित क्षेत्रों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। हाथी बड़ी दूरी तय करते हैं और भोजन, जल तथा प्रजनन के लिए विभिन्न वन क्षेत्रों के बीच आवाजाही करते हैं। इसलिए उनके आवासों को जोड़ने वाले वन्यजीव गलियारे (Wildlife Corridors) अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

'Elephant Corridors of India, 2023' रिपोर्ट के अनुसार भारत में 150 हाथी गलियारों की पहचान की गई है। ये गलियारे खंडित वन क्षेत्रों को जोड़ते हैं और हाथियों को अपेक्षाकृत सुरक्षित तरीके से एक आवास से दूसरे आवास तक जाने में सहायता करते हैं।

इन गलियारों का संरक्षण इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि सड़क, रेलवे, खनन, कृषि विस्तार और शहरीकरण जैसी गतिविधियाँ इनके प्राकृतिक मार्गों को बाधित कर सकती हैं।

कानूनी और अंतरराष्ट्रीय संरक्षण

एशियाई हाथी को IUCN की रेड लिस्ट में 'Endangered' (संकटग्रस्त) श्रेणी में रखा गया है।

भारत में इसे वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I में शामिल किया गया है, जिससे इसे उच्चतम स्तर का कानूनी संरक्षण प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त, एशियाई हाथी CITES के Appendix-I में सूचीबद्ध है।

हाथियों के अवैध शिकार की निगरानी के लिए MIKE (Monitoring the Illegal Killing of Elephants) कार्यक्रम महत्वपूर्ण है। यह CITES के तहत हाथियों की अवैध हत्या और अवैध शिकार के रुझानों की निगरानी में सहायता करता है।

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि हाथी अभयारण्यों को वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम के तहत बाघ अभयारण्यों जैसी अलग और समान वैधानिक श्रेणी प्राप्त नहीं है। हालांकि, इनमें शामिल वन एवं अन्य भूमि विभिन्न मौजूदा कानूनों और संरक्षण व्यवस्थाओं के माध्यम से संरक्षित हो सकती हैं।

बंदी हाथियों का संरक्षण:

जंगली हाथियों के साथ-साथ बंदी हाथियों के संरक्षण और प्रबंधन पर भी सरकार का ध्यान है।

गज सूचना मोबाइल एप्लीकेशन (Gaj Soochna Mobile Application) के माध्यम से बंदी हाथियों से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी को एक राष्ट्रीय आनुवंशिक डेटाबेस से जोड़ा गया है। इसमें हाथियों के डीएनए प्रोफाइल, रूपात्मक विशेषताओं और स्वामित्व संबंधी जानकारी शामिल की जाती है। इसका उद्देश्य अवैध व्यापार और अवैध स्थानांतरण पर नियंत्रण को मजबूत करना है।

इसके अतिरिक्त, बंदी हाथी (स्थानांतरण या परिवहन) नियम, 2024 के माध्यम से बंदी हाथियों के स्थानांतरण और परिवहन को विनियमित किया गया है। अंतरराज्यीय स्थानांतरण में निर्धारित प्रक्रियाओं और निगरानी को महत्व दिया गया है।

मानव-हाथी संघर्ष:

भारत में हाथी संरक्षण के सामने सबसे जटिल चुनौतियों में से एक मानव-हाथी संघर्ष (Human-Elephant Conflict) है।

वन क्षेत्रों के विखंडन, कृषि भूमि के विस्तार, बस्तियों के फैलाव और हाथी गलियारों में मानवीय गतिविधियों के बढ़ने से हाथियों और मनुष्यों के बीच संपर्क बढ़ रहा है। इसके परिणामस्वरूप मानव मृत्यु, चोट, फसल क्षति और संपत्ति के नुकसान जैसी घटनाएँ होती हैं।

इस समस्या से निपटने के लिए संघर्ष-प्रवण क्षेत्रों की पहचान एवं मानचित्रण, Rapid Response Teams, प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और राज्य एवं जिला प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय पर जोर दिया जा रहा है।

2023 में जारी हाथी-विशिष्ट मानव-हाथी संघर्ष न्यूनीकरण दिशानिर्देशों का उद्देश्य संघर्ष को कम करना तथा मनुष्यों और हाथियों के बीच सुरक्षित एवं शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को बढ़ावा देना है।

इस संदर्भ में केवल हाथियों को दूसरे क्षेत्रों में स्थानांतरित करना दीर्घकालिक समाधान नहीं है। अधिक प्रभावी रणनीति उनके पारंपरिक आवागमन मार्गों को सुरक्षित रखना और स्थानीय समुदायों को संरक्षण प्रक्रिया का भागीदार बनाना है।

प्रमुख चुनौतियाँ:

भारत में हाथी संरक्षण के सामने निम्नलिखित प्रमुख चुनौतियाँ बनी हुई हैं-

·        आवासों का विखंडन और वन क्षेत्र में कमी।

·        हाथी गलियारों पर अतिक्रमण और अवसंरचनात्मक दबाव।

·        सड़क एवं रेलवे दुर्घटनाएँ।

·        मानव-हाथी संघर्ष और फसल क्षति।

·        अवैध शिकार एवं हाथीदाँत का अवैध व्यापार।

·        खनन, औद्योगिक गतिविधियों और अनियोजित विकास का दबाव।

·        जलवायु परिवर्तन के कारण भोजन और जल की उपलब्धता में बदलाव।

·        हाथी-बहुल क्षेत्रों में राज्यों के बीच समन्वय की आवश्यकता।

आगे की राह:

हाथी संरक्षण को केवल प्रजाति-आधारित संरक्षण के बजाय लैंडस्केप-स्तरीय संरक्षण (Landscape-level Conservation) के रूप में देखने की आवश्यकता है।

इसके लिए-

  • हाथी गलियारों की वैज्ञानिक पहचान और कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
  • सड़क और रेलवे परियोजनाओं में वन्यजीव मार्ग योजनाएँ (Wildlife Passage Plans) को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए।
  • अंडरपास, ओवरपास और अन्य वन्यजीव-अनुकूल अवसंरचना का विस्तार किया जाए।
  • AI, कैमरा ट्रैप, रेडियो-कॉलर और सेंसर आधारित प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों का प्रभावी उपयोग किया जाए।
  • मानव-हाथी संघर्ष वाले क्षेत्रों में त्वरित मुआवजा एवं राहत व्यवस्था मजबूत की जाए।
  • स्थानीय समुदायों को संरक्षण के प्रत्यक्ष भागीदार और लाभार्थी बनाया जाए।
  • हाथी गलियारों के संरक्षण के लिए अंतरराज्यीय और सीमा-पार सहयोग को बढ़ावा दिया जाए।
  • संरक्षण योजनाओं में जलवायु परिवर्तन के संभावित प्रभावों को भी शामिल किया जाए।

निष्कर्ष

विश्व हाथी दिवस केवल हाथियों के प्रति संवेदना व्यक्त करने का अवसर नहीं है, बल्कि यह हमें मनुष्य और प्रकृति के बीच संबंधों को पुनः संतुलित करने की आवश्यकता की याद दिलाता है।

भारत में हाथियों का संरक्षण केवल एक वन्यजीव संरक्षण कार्यक्रम नहीं, बल्कि जैव विविधता, वन पारिस्थितिकी, स्थानीय आजीविका और सतत विकास से जुड़ा व्यापक मुद्दा है। हाथियों के लिए सुरक्षित गलियारे वास्तव में स्वस्थ वन पारिस्थितिकी तंत्र के लिए सुरक्षित गलियारे हैं।

इसलिए भारत की दीर्घकालिक संरक्षण रणनीति का लक्ष्य केवल हाथियों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि ऐसे जुड़े हुए आवास, सुरक्षित आवागमन मार्ग और संवेदनशील मानव-वन्यजीव प्रबंधन तंत्र विकसित करना होना चाहिए, जिसमें विकास और संरक्षण के बीच संतुलन कायम हो सके।

 

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