सन्दर्भ:
हाल ही में संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय (UNU-INWEH) द्वारा जनवरी 2026 में जारी नवीनतम रिपोर्ट, "ग्लोबल वाटर बैंकरप्सी: लिविंग बियॉन्ड आवर हाइड्रोलॉजिकल मीन्स", वैश्विक जल सुरक्षा के विमर्श में एक बड़ा परिवर्तन का संकेत देती है। यह रिपोर्ट 'जल संकट' की पारंपरिक और अस्थायी धारणा को बदलते हुए 'जल दिवालियापन' (Water Bankruptcy) जैसी गंभीर संकट को केंद्र में रखता है। जल दिवालियापन की स्थिति तब उत्पन्न होती है जब किसी राष्ट्र का वार्षिक जल निष्कर्षण उसके प्राकृतिक पुनर्भरण (Natural Recharge) की क्षमता से निरंतर अधिक बना रहता है, जिसके परिणामस्वरूप पारिस्थितिक स्रोत्र का अपूरणीय क्षय होता है। भारत, विश्व में भूजल का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता है जो वैश्विक भूजल निष्कर्षण का लगभग 25% से अधिक हिस्सा उपयोग करता है। यह रिपोर्ट भारत के लिए एक गंभीर चेतावनी देती है।
जल दिवालियापन की अवधारणा:
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट इस अवधारणा को दो प्रमुख सिद्धांतों के माध्यम से विश्लेषित करती है:
-
-
- जल-विज्ञान दिवालियापन (Hydrological Insolvency): यह आर्थिक दिवालियापन के समानांतर एक स्थिति है। जिस प्रकार एक व्यक्ति अपनी आय से अधिक व्यय करके ऋण के जाल में फंस जाता है, उसी प्रकार 'हाइड्रोलॉजिकल आय' (वर्षा और प्राकृतिक स्रोत) से अधिक जल का उपभोग करते हैं, तो भूजल के 'मूलधन' (Principal Capital) को समाप्त करने लगते हैं। यह भविष्य की पीढ़ियों की जल सततता का दोहन है।
- अपरिवर्तनीयता (Irreversibility): जल दिवालियापन का सर्वाधिक घातक पक्ष इसकी अपरिवर्तनीय प्रकृति है। अत्यधिक दोहन के कारण जब भूगर्भीय एक्विफर्स (Aquifers) की संरचना संकुचित (Collapse) हो जाती है या सदियों पुराने ग्लेशियर पूर्णतः विलीन हो जाते हैं, तो उन्हें पुनः प्राप्त करना असंभव होता है। यह पारिस्थितिक पूंजी की स्थायी हानि है जिसे आर्थिक निवेश से भी प्राप्त नहीं किया जा सकता।
- जल-विज्ञान दिवालियापन (Hydrological Insolvency): यह आर्थिक दिवालियापन के समानांतर एक स्थिति है। जिस प्रकार एक व्यक्ति अपनी आय से अधिक व्यय करके ऋण के जाल में फंस जाता है, उसी प्रकार 'हाइड्रोलॉजिकल आय' (वर्षा और प्राकृतिक स्रोत) से अधिक जल का उपभोग करते हैं, तो भूजल के 'मूलधन' (Principal Capital) को समाप्त करने लगते हैं। यह भविष्य की पीढ़ियों की जल सततता का दोहन है।
-
भारतीय परिप्रेक्ष्य में जल पर निर्भरता और संकट:
-
-
- भारत की जल सुरक्षा और अर्थव्यवस्था अनिवार्य रूप से भूजल पर निर्भर है। भारत की कुल सिंचाई आवश्यकताओं का लगभग 62% भाग भूजल संसाधनों से ही पूर्ण होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में 85% पेयजल आपूर्ति और तीव्र शहरीकरण के बीच शहरी जल मांग का 50% भाग भूजल पर टिका है।
- बढ़ती जनसंख्या, कृषि की सघनता और अनियंत्रित औद्योगिक विस्तार ने भारत के भूजल भंडार को एक गंभीर की स्थिति में ला दिया है। सिंधु-गंगा के मैदानी भाग, जिन्हें कभी जल-समृद्ध माना जाता था, अब जल संकट के वैश्विक हॉटस्पॉट के रूप में चिन्हित किए जा रहे हैं। यहाँ भूजल का स्तर प्रतिवर्ष कई मीटर की दर से गिर रहा है, जो भारत की खाद्य सुरक्षा के लिए एक प्रत्यक्ष चुनौती है।
- भारत की जल सुरक्षा और अर्थव्यवस्था अनिवार्य रूप से भूजल पर निर्भर है। भारत की कुल सिंचाई आवश्यकताओं का लगभग 62% भाग भूजल संसाधनों से ही पूर्ण होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में 85% पेयजल आपूर्ति और तीव्र शहरीकरण के बीच शहरी जल मांग का 50% भाग भूजल पर टिका है।
-
जल संकट के बहुआयामी कारक:
-
-
- प्रदूषण का प्रसार: औद्योगिक अपशिष्टों के अनियंत्रित विसर्जन, कृषि में उर्वरकों के अत्यधिक प्रयोग और प्राकृतिक रूप से विद्यमान आर्सेनिक एवं फ्लोराइड ने भूजल की गुणवत्ता को व्यापक रूप से प्रभावित किया है। जब स्वच्छ जल अनुपलब्ध हो जाता है, तो भौतिक रूप से जल की उपस्थिति के बावजूद वह उपयोग लायक नहीं रह जाता है।
- मानव निर्मित सूखा: आधुनिक ड्रिलिंग तकनीकों और विद्युत पंपों की सुलभता ने भूजल निष्कर्षण की दर को प्राकृतिक पुनर्भरण की दर से कई गुना बढ़ा दिया है जिससे इस संसाधन का दोहन हो रहा है। इससे 'सामान्य पूल संसाधनों की त्रासदी' (Tragedy of the Commons) उत्पन्न हुई है, जहाँ व्यक्तिगत लाभ के लिए सार्वजनिक संपदा का विनाश हो रहा है।
- खाद्य सुरक्षा बनाम जल सुरक्षा: भारत के जल निष्कर्षण का लगभग 90% भाग कृषि क्षेत्र में व्यय होता है। चावल और गन्ने जैसी जल-गहन फसलों के प्रति अत्यधिक झुकाव ने जल संकट के मुहाने पर खड़ा कर दिया है। समाधान के रूप में फसल विविधीकरण (Crop Diversification) और मोटे अनाज (Millets) की ओर संक्रमण अनिवार्य है।
- चक्रीय जल अर्थव्यवस्था (Circular Water Economy): 'उपयोग करो और फेंको' की मानसिकता के स्थान पर 'उपयोग, शोधन और पुन: उपयोग' (Reduce, Reuse, Recycle) को अपनाना होगा। शहरी भारत में अपशिष्ट जल (Wastewater) का शत-प्रतिशत शोधन ही वह 'रिकवर्ड इनकम' है जो जल दिवालियापन के खाते को संतुलित कर सकती है।
- प्रदूषण का प्रसार: औद्योगिक अपशिष्टों के अनियंत्रित विसर्जन, कृषि में उर्वरकों के अत्यधिक प्रयोग और प्राकृतिक रूप से विद्यमान आर्सेनिक एवं फ्लोराइड ने भूजल की गुणवत्ता को व्यापक रूप से प्रभावित किया है। जब स्वच्छ जल अनुपलब्ध हो जाता है, तो भौतिक रूप से जल की उपस्थिति के बावजूद वह उपयोग लायक नहीं रह जाता है।
-
भारत की नीतिगत, निवारक एवं सुधारात्मक पहल:
भारत ने जल प्रबंधन को एक व्यापक और बहुआयामी दृष्टिकोण प्रदान किया है। जल शक्ति मंत्रालय के माध्यम से केंद्र सरकार राज्यों को तकनीकी और वित्तीय सहायता प्रदान कर रही है। इसके अंतर्गत जल शक्ति मंत्रालय के नेतृत्व में एक बहु-स्तरीय प्रबंधन ढांचा विकसित किया गया है।
जल एक राज्य का विषय (State Subject) होने के कारण, केंद्र सरकार ने राज्यों को एक मानक कानूनी ढांचा प्रदान करने हेतु 'मॉडल भूजल विधेयक' प्रस्तावित किया है। इसका उद्देश्य भूजल के अंधाधुंध निष्कर्षण को विनियमित करना और वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) को कानूनी रूप से अनिवार्य बनाना है। जनवरी 2026 तक, 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने इस मॉडल विधेयक को अपनाया है, जो भारत के सहकारी संघवाद में जल प्रशासन की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
(2) जल शक्ति अभियान: कैच द रेन (JSA: CTR)
JSA: CTR अभियान की शुरुआत 22 मार्च 2021 को विश्व जल दिवस के अवसर पर की गई। यह अभियान जल संरक्षण पर राष्ट्रव्यापी जागरूकता निर्माण एवं सामूहिक कार्रवाई को प्रोत्साहित करता है। JSA: CTR के पाँच केंद्रित कार्य हैं:
-
-
-
- जल संरक्षण एवं वर्षा जल संचयन
- सभी जल निकायों की पहचान, जियो-टैगिंग एवं सूचीबद्धता
- सभी जिलों में जल शक्ति केंद्र स्थापित करना
- केंद्रित वनीकरण
- जागरूकता सृजन
- जल संरक्षण एवं वर्षा जल संचयन
-
-
(3) जन संचय जन भागीदारी (JSJB)
-
-
-
- जल संरक्षण को एक 'जन आंदोलन' में परिवर्तित करने हेतु सितंबर 2024 में 'जल संचय जन भागीदारी' की शुरुआत की गई। यह पहल वर्षा जल संचयन, जलभृत पुनर्भरण, बोरवेल पुनर्भरण तथा पुनर्भरण शाफ्ट जैसे उपायों से भूजल पुनर्भरण सुधारने का प्रयास करती है।
- यह स्थानीय स्तर पर घटते भूजल स्तर से निपटने हेतु एक विस्तार योग्य एवं सतत मॉडल के रूप में डिजाइन की गई है तथा उन्नत निगरानी प्रणालियों को एकीकृत करती है जो भूजल पुनर्भरण का समर्थन करती है तथा जिम्मेदार भूजल प्रबंधन एवं सतत जल उपयोग को बढ़ावा देती है। जनवरी 2026 तक इसके अंतर्गत लगभग 40 लाख कृत्रिम पुनर्भरण और भंडारण संरचनाएं पूरी की जा चुकी हैं।
- जल संरक्षण को एक 'जन आंदोलन' में परिवर्तित करने हेतु सितंबर 2024 में 'जल संचय जन भागीदारी' की शुरुआत की गई। यह पहल वर्षा जल संचयन, जलभृत पुनर्भरण, बोरवेल पुनर्भरण तथा पुनर्भरण शाफ्ट जैसे उपायों से भूजल पुनर्भरण सुधारने का प्रयास करती है।
-
-

(4) मिशन अमृत सरोवर-
-
-
-
- 24 अप्रैल 2022 को शुरू किया गया 'मिशन अमृत सरोवर' के माध्यम से प्रत्येक जिले में जलाशयों का निर्माण किया जा रहा है, जो स्थानीय स्तर पर जल दिवालियापन के विरुद्ध एक प्रभावी सुरक्षा कवच (Buffer) के रूप में कार्य कर रहे हैं।
- 24 अप्रैल 2022 को शुरू किया गया 'मिशन अमृत सरोवर' के माध्यम से प्रत्येक जिले में जलाशयों का निर्माण किया जा रहा है, जो स्थानीय स्तर पर जल दिवालियापन के विरुद्ध एक प्रभावी सुरक्षा कवच (Buffer) के रूप में कार्य कर रहे हैं।
-
-
(5) अटल भूजल योजना (Atal Jal):
-
-
-
- ₹6,000 करोड़ के कुल परिव्यय वाली यह योजना दुनिया के सबसे बड़े सामुदायिक जल प्रबंधन कार्यक्रमों में से एक है। यह विशेष रूप से 7 राज्यों (गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और उत्तर प्रदेश) के सर्वाधिक जल-तनावग्रस्त क्षेत्रों पर केंद्रित है। इसका अभिनव पक्ष 'परिणाम-आधारित प्रोत्साहन' (Incentive-based Outcomes) है। इस योजना के अंतर्गत 30 दिसंबर 2025 तक 6,271 डिजिटल जल स्तर रिकॉर्डर (DWLR) और 8,201 वर्षा मापी केंद्र स्थापित किए गए हैं, जो 'डेटा-संचालित प्रबंधन' को धरातल पर उतारते हैं।
- ₹6,000 करोड़ के कुल परिव्यय वाली यह योजना दुनिया के सबसे बड़े सामुदायिक जल प्रबंधन कार्यक्रमों में से एक है। यह विशेष रूप से 7 राज्यों (गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और उत्तर प्रदेश) के सर्वाधिक जल-तनावग्रस्त क्षेत्रों पर केंद्रित है। इसका अभिनव पक्ष 'परिणाम-आधारित प्रोत्साहन' (Incentive-based Outcomes) है। इस योजना के अंतर्गत 30 दिसंबर 2025 तक 6,271 डिजिटल जल स्तर रिकॉर्डर (DWLR) और 8,201 वर्षा मापी केंद्र स्थापित किए गए हैं, जो 'डेटा-संचालित प्रबंधन' को धरातल पर उतारते हैं।
-
-
(6) वैज्ञानिक आधार: NAQUIM 2.0
देश में प्रभावी भूजल प्रबंधन के समर्थन हेतु राष्ट्रीय जलभृत मानचित्रण एवं प्रबंधन कार्यक्रम (NAQUIM 2012-2023) कार्यक्रम चलाया गया, जिसका उद्देश्य था:
-
-
-
- हाइड्रोजियोलॉजिकल गुणों के आधार पर जलभृतों का विशेषीकरण।
- भूजल उपलब्धता एवं गुणवत्ता का आकलन।
- विस्तृत जलभृत मानचित्र तैयार करना।
- सतत भूजल प्रबंधन रणनीतियाँ विकसित करना।
- हाइड्रोजियोलॉजिकल गुणों के आधार पर जलभृतों का विशेषीकरण।
-
-
राष्ट्रीय एक्विफर मानचित्रण एवं प्रबंधन कार्यक्रम (NAQUIM 2.0) के दूसरे चरण के माध्यम से भारत अब पंचायत स्तर तक उच्च-रिज़ॉल्यूशन वाले मानचित्र उपलब्ध करा रहा है। यह कार्यक्रम न केवल जल की उपलब्धता का आकलन करता है, बल्कि तटीय क्षेत्रों में खारे पानी के प्रवेश (Saline Intrusion) और शहरी जलभराव जैसी स्थानीय समस्याओं के लिए विशिष्ट समाधान भी प्रदान करता है।
आगे की राह:
संयुक्त राष्ट्र की चेतावनी और भारत सरकार के सक्रिय प्रयास एक ही निष्कर्ष की ओर संकेत करते हैं: प्रबंधन अब एक विकल्प नहीं, बल्कि उत्तरजीविता की शर्त है। भारत को अपनी रणनीति को निम्नलिखित बिंदुओं पर केंद्रित करना होगा:
-
-
- हाइड्रोलॉजिकल ऑडिटिंग: प्रत्येक पंचायत और नगरपालिका स्तर पर वार्षिक जल बजट तैयार करना ताकि आय (पुनर्भरण) और व्यय (उपभोग) का वास्तविक हिसाब रखा जा सके।
- प्रौद्योगिकी एकीकरण: इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का उपयोग करके सूक्ष्म-सिंचाई और वास्तविक समय में जल रिसाव (Leakage) की निगरानी करना।
- पारिस्थितिक पुनर्वनीकरण: नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों और वेटलैंड्स का संरक्षण, जो प्राकृतिक स्पंज (Sponges) की तरह कार्य करते हैं और एक्विफर्स को रिचार्ज करने में सहायता करते हैं।
- वैश्विक सहयोग: जल दिवालियापन एक सीमाहीन समस्या है। भारत को दक्षिण एशियाई क्षेत्र में 'जल कूटनीति' (Water Diplomacy) का नेतृत्व करना चाहिए ताकि साझा एक्विफर्स का प्रबंधन वैज्ञानिक तरीके से हो सके।
- हाइड्रोलॉजिकल ऑडिटिंग: प्रत्येक पंचायत और नगरपालिका स्तर पर वार्षिक जल बजट तैयार करना ताकि आय (पुनर्भरण) और व्यय (उपभोग) का वास्तविक हिसाब रखा जा सके।
-
निष्कर्ष:
भूजल भारत की जल सुरक्षा का केंद्र है, जो कृषि, पेयजल आपूर्ति, पारिस्थितिक तंत्र एवं कृषि गतिविधियों को बनाए रखता है, किंतु अति-निकासी, गुणवत्ता ह्रास तथा जलवायु परिवर्तनशीलता से उत्पन्न बढ़ते दबावों ने सतत भूजल प्रबंधन को अनिवार्य बना दिया है। भारत अपनी नीतियों के माध्यम से भूजल को बनाये रखने का प्रयास कर रहा है किंतु अंतिम सफलता व्यवहार परिवर्तन पर निर्भर करेगी क्योंकि जल का सुरक्षित भविष्य ही भारत के उज्जवल भविष्य की आधारशिला है।
| UPSC/PCS मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न: भूजल भारत की जल सुरक्षा का केंद्र है। अत्यधिक दोहन, गुणवत्ता ह्रास और जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में भारत की भूजल निर्भरता की विवेचना कीजिए। जल सुरक्षा की दिशा में सरकार द्वारा की गई पहलों की प्रभावशीलता पर चर्चा कीजिए। |

