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Daily-current-affairs / 20 Jun 2026

घरेलू श्रम का मूल्यांकन और लैंगिक न्याय की ओर एक महत्वपूर्ण कदम

घरेलू श्रम का मूल्यांकन और लैंगिक न्याय की ओर एक महत्वपूर्ण कदम

संदर्भ:

हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए गृहिणियों (Homemakers) को "राष्ट्र-निर्माता" की संज्ञा प्रदान की और मोटर दुर्घटना मुआवज़ा मामलों में उनके अवैतनिक घरेलू श्रम के आर्थिक मूल्यांकन के लिए उनकी काल्पनिक मासिक आय ₹30,000 निर्धारित करने का निर्देश दिया। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने स्पष्ट किया कि परिवार की देखभाल, बच्चों के पालन-पोषण और सामाजिक मूल्यों के निर्माण में गृहिणियों की भूमिका को केवल भावनात्मक दृष्टि से नहीं, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी मान्यता दी जानी चाहिए।

यह निर्णय भारतीय न्यायशास्त्र में महत्वपूर्ण उदाहरण है क्योंकि:

      • लंबे समय से अदृश्य और अवैतनिक घरेलू श्रम को सम्मान तथा कानूनी मान्यता प्रदान करता है।
      • घरेलू कार्य, बच्चों की देखभाल, बुजुर्गों की सेवा तथा भावनात्मक सहयोग को आर्थिक दृष्टि से मूल्यवान माना जाना चाहिए।
      • घरेलू देखभाल की क्षति (Loss of Domestic Care) को मुआवजे की एक पृथक श्रेणी के रूप में मान्यता दी गई।
      • मोटर दुर्घटना दावों में गृहिणी के योगदान का न्यूनतम मूल्य ₹30,000 प्रति माह माना जाएगा।

सर्वोच्च न्यायालय का अवलोकन:

      • सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि गृहिणियों का योगदान अमूल्य है और उसे केवल इसलिए कमतर नहीं आँका जा सकता क्योंकि इसके बदले कोई वेतन नहीं दिया जाता। न्यायालय ने टिप्पणी की कि गृहिणियाँ समाज की आधारशिला हैं और आने वाली पीढ़ियों के निर्माण में उनकी केंद्रीय भूमिका होती है। इसलिए उन्हें "राष्ट्र-निर्माता" कहना अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि सामाजिक यथार्थ की स्वीकृति है।
      • मोटर दुर्घटना दावों में अब तक गृहिणियों की आय का निर्धारण अक्सर बहुत कम राशि के आधार पर किया जाता था, जिससे उनके परिवारों को पर्याप्त मुआवज़ा नहीं मिल पाता था। न्यायालय द्वारा ₹30,000 प्रतिमाह की आय निर्धारित करना इस विसंगति को दूर करने का प्रयास है।

घरेलू श्रम: देखभाल अर्थव्यवस्था का अदृश्य आधार

      • भारत सहित विश्व के अधिकांश देशों में घरेलू कार्यों को पारंपरिक रूप से महिलाओं की स्वाभाविक जिम्मेदारी माना गया है। भोजन बनाना, बच्चों की देखभाल करना, बुजुर्गों की सेवा करना, घर की सफाई, परिवार के सदस्यों की भावनात्मक आवश्यकताओं का ध्यान रखना तथा घरेलू प्रबंधन जैसे कार्यों का कोई प्रत्यक्ष आर्थिक प्रतिफल नहीं मिलता। परिणामस्वरूप इन कार्यों को राष्ट्रीय आय और उत्पादक श्रम की औपचारिक गणना में शामिल नहीं किया जाता।
      • हालाँकि, यदि इन सेवाओं का बाजार मूल्य निर्धारित किया जाए, तो यह स्पष्ट होगा कि गृहिणियाँ अनेक पेशेवर भूमिकाएँ एक साथ निभाती हैं, वे रसोइया, शिक्षिका, परिचारिका, प्रबंधक, परामर्शदाता और देखभालकर्ता की भूमिका निभाती हैं। उनके श्रम के बिना परिवार और समाज की आर्थिक संरचना सुचारु रूप से कार्य नहीं कर सकती। भारत सरकार के राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा जारी टाइम यूज़ सर्वे के अनुसार:
        • 15-59 वर्ष की महिलाएँ प्रतिदिन औसतन 315 मिनट (लगभग 5.25 घंटे) अवैतनिक घरेलू सेवाओं में व्यतीत करती हैं।
        • इसके विपरीत, पुरुष इन कार्यों में केवल 88 मिनट (लगभग 1.5 घंटे) प्रतिदिन देते हैं।
      • यह दर्शाता है कि भारत में महिलाएँ घरेलू कार्यों पर पुरुषों की तुलना में लगभग 3.5 गुना अधिक समय खर्च करती हैं।

मुआवज़ा निर्धारण में परिवर्तन:

      • मोटर वाहन अधिनियम के अंतर्गत दुर्घटना पीड़ितों को मुआवज़ा प्रदान करते समय मृतक अथवा घायल व्यक्ति की आय को ध्यान में रखा जाता है। यदि व्यक्ति वेतनभोगी या व्यवसायी हो, तो उसकी आय का आकलन अपेक्षाकृत सरल होता है। किंतु गृहिणियों के मामले में यह चुनौतीपूर्ण रहा है।
      • इस निर्णय के पश्चात् न्यायाधिकरणों को यह स्वीकार करना होगा कि गृहिणी की सेवाओं का वास्तविक आर्थिक मूल्य है। इससे मुआवज़ा निर्धारण अधिक न्यायसंगत और यथार्थवादी होगा। यह दृष्टिकोण केवल कानूनी तकनीक का परिवर्तन नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

Valuing Domestic Labour- Supreme Court's Gender Justice Step

अवैतनिक देखभाल कार्य और लैंगिक असमानता:

      • संयुक्त राष्ट्र तथा अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की अनेक रिपोर्टें दर्शाती हैं कि महिलाएँ पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक समय अवैतनिक देखभाल कार्यों में व्यतीत करती हैं। संयुक्त राष्ट्र महिला (UN Women) के अनुसार विश्व स्तर पर महिलाएँ पुरुषों की तुलना में 2.5 गुना अधिक समय अवैतनिक देखभाल कार्यों में लगाती हैं।
      • इसके बावजूद यह श्रम आर्थिक आँकड़ों में अदृश्य बना रहता है। परिणामस्वरूप महिलाओं की उत्पादकता को कम आँका जाता है तथा नीति-निर्माण में उनके योगदान की पर्याप्त पहचान नहीं हो पाती। सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय इस अदृश्यता को चुनौती देता है और लैंगिक समानता की दिशा में न्यायपालिका की संवेदनशीलता को दर्शाता है।

अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य:

      • विश्व स्तर पर भी घरेलू श्रम के आर्थिक मूल्यांकन की आवश्यकता पर बल दिया गया है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) और महिला सशक्तीकरण से संबंधित विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों ने देखभाल अर्थव्यवस्था (Care Economy) को सतत विकास का आधार माना है।
      • कुछ देशों ने सामाजिक सुरक्षा योजनाओं, पेंशन व्यवस्था तथा देखभाल सेवाओं के माध्यम से घरेलू कार्य करने वाली महिलाओं को अप्रत्यक्ष आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने का प्रयास किया है। भारत में भी समय-समय पर घरेलू कार्यों के आर्थिक मूल्यांकन और गृहिणियों के लिए सामाजिक सुरक्षा उपायों पर बहस होती रही है।

निर्णय का व्यापक महत्व:

      • यह निर्णय कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। यह महिलाओं के अवैतनिक श्रम की गरिमा को स्वीकार करता है। लंबे समय से यह धारणा रही है कि आय अर्जित करने वाला कार्य ही उत्पादक होता है। न्यायालय ने इस संकीर्ण दृष्टिकोण को चुनौती दी है। यह मुआवज़ा न्यायशास्त्र को अधिक मानवीय और संवेदनशील बनाता है। दुर्घटना पीड़ित परिवारों को अब अधिक यथार्थवादी आर्थिक सहायता प्राप्त हो सकेगी।
      • यह नीति-निर्माताओं को देखभाल अर्थव्यवस्था की ओर गंभीरता से ध्यान देने के लिए प्रेरित कर सकता है। महिलाओं के लिए सामाजिक सुरक्षा, पेंशन, बीमा तथा घरेलू श्रम की औपचारिक मान्यता से जुड़े मुद्दों पर नई बहस प्रारंभ हो सकती है।
      • यह निर्णय समाज में व्याप्त लैंगिक रूढ़ियों को चुनौती देता है और यह संदेश देता है कि घर के भीतर किया जाने वाला श्रम भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना घर के बाहर किया जाने वाला वेतनभोगी कार्य।

चुनौतियाँ:

      • यद्यपि यह निर्णय ऐतिहासिक है, फिर भी कुछ चुनौतियाँ बनी रहेंगी। गृहिणियों के श्रम का वास्तविक आर्थिक मूल्य विभिन्न सामाजिक और भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में घरेलू कार्यों की प्रकृति तथा लागत में अंतर होता है। अतः भविष्य में इस प्रकार के मूल्यांकन के लिए अधिक वैज्ञानिक और मानकीकृत पद्धतियों की आवश्यकता होगी।
      • इसके अतिरिक्त, केवल न्यायिक मान्यता पर्याप्त नहीं है। आवश्यक है कि नीति-निर्माण की प्रक्रिया में भी देखभाल कार्यों को समुचित स्थान दिया जाए। समय उपयोग सर्वेक्षणों का नियमित संचालन, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का विस्तार और महिलाओं की आर्थिक भागीदारी को प्रोत्साहित करने वाले उपाय इस दिशा में महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकते हैं।

निष्कर्ष:

सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय भारतीय समाज में गृहिणियों की भूमिका के प्रति दृष्टिकोण में परिवर्तन का संकेत देता है। यह स्वीकार करता है कि राष्ट्र निर्माण केवल कार्यालयों, कारखानों और बाजारों में नहीं होता, बल्कि घरों के भीतर भी होता है, जहाँ महिलाएँ प्रतिदिन अपने श्रम, समय और संवेदनशीलता के माध्यम से परिवारों और भविष्य की पीढ़ियों का निर्माण करती हैं।

गृहिणियों को "राष्ट्र-निर्माता" के रूप में मान्यता देना केवल एक न्यायिक टिप्पणी नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का आह्वान है। जो याद दिलाता है कि आर्थिक विकास की वास्तविक नींव उन अदृश्य हाथों पर टिकी है, जिनका योगदान लंबे समय तक अनदेखा किया गया। यह निर्णय भारतीय समाज में गृहिणियों को सम्मान, पहचान और न्याय प्रदान करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है।

 

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