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Daily-current-affairs / 13 Aug 2026

भारत की 300 GW गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता: ऊर्जा संक्रमण से ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर

भारत की 300 GW गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता: ऊर्जा संक्रमण से ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर

संदर्भ:

भारत ने 31 जुलाई 2026 तक 300.50 GW गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित विद्युत क्षमता स्थापित कर एक महत्वपूर्ण पड़ाव हासिल किया है। इसमें 164.59 GW सौर, 58.14 GW पवन, 57.24 GW जलविद्युत, 11.75 GW बायो-पावर तथा 8.78 GW परमाणु ऊर्जा शामिल है। यह देश की लगभग 552 GW की कुल स्थापित विद्युत क्षमता का 54% से अधिक है। यह उपलब्धि भारत के 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता के लक्ष्य की दिशा में 60% से अधिक प्रगति को दर्शाती है।

उपलब्धि का व्यापक महत्व:

भारत की ऊर्जा यात्रा लंबे समय तक कोयला और अन्य जीवाश्म ईंधनों पर निर्भर रही है। तीव्र औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और बढ़ती आबादी के कारण आने वाले दशकों में विद्युत् की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि होना स्वाभाविक है। ऐसे में आर्थिक विकास और पर्यावरणीय स्थिरता के बीच संतुलन बनाना भारत के लिए एक बड़ी नीति चुनौती है।

300 GW गैर-जीवाश्म क्षमता की उपलब्धि इस संदर्भ में महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत के ऊर्जा सुरक्षा को केवल अधिक विद्युत् उत्पादन के रूप में नहीं, बल्कि स्वच्छ, विविधीकृत और दीर्घकालिक ऊर्जा प्रणाली के रूप में देख रहा है।

विशेष रूप से सौर ऊर्जा का विस्तार उल्लेखनीय है। 2014 में भारत की सौर स्थापित क्षमता लगभग 2.8 GW थी, जो जुलाई 2026 तक बढ़कर 164.59 GW हो गई। इसी अवधि में पवन ऊर्जा क्षमता लगभग 21 GW से बढ़कर 58.14 GW हो गई। वित्त वर्ष 2025-26 में अकेले 55.29 GW गैर-जीवाश्म क्षमता जोड़ी गई, जिसमें 44.6 GW सौर और लगभग 6 GW पवन क्षमता शामिल थी।

जलवायु प्रतिबद्धताओं की दिशा में प्रगति:

भारत ने COP26 में अपने पंचामृतलक्ष्यों के तहत 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म आधारित विद्युत क्षमता स्थापित करने और 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य घोषित किया था।

जून 2025 में ही भारत ने अपनी संचयी विद्युत स्थापित क्षमता का 50% गैर-जीवाश्म स्रोतों से हासिल कर लिया था, जो पेरिस समझौते के तहत निर्धारित 2030 के लक्ष्य से लगभग पांच वर्ष पहले की उपलब्धि थी।

इससे स्पष्ट होता है कि भारत ने जलवायु लक्ष्यों को केवल अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता के रूप में नहीं, बल्कि अपनी विकास रणनीति के एक हिस्से के रूप में अपनाया है। हालांकि, केवल स्थापित क्षमता बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक चुनौती इस क्षमता को नियमित और विश्वसनीय विद्युत आपूर्ति में बदलने की है।

क्षमता के साथ विश्वसनीय ऊर्जा आवश्यक:

सौर और पवन ऊर्जा की सबसे बड़ी चुनौती उनकी अंतरालशीलता (Intermittency) है। सूर्य हर समय उपलब्ध नहीं रहता और पवन की गति भी लगातार समान नहीं होती। इसलिए बड़े पैमाने पर नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार के साथ ऊर्जा भंडारण और ग्रिड प्रबंधन का महत्व बढ़ जाता है।

इस दिशा में भारत में पंप्ड स्टोरेज परियोजनाओं (PSP), बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली और स्मार्ट ग्रिड जैसी व्यवस्थाओं पर जोर दिया जा रहा है। फरवरी 2026 तक 11,870 MW क्षमता वाली 10 पंप्ड स्टोरेज परियोजनाएं निर्माणाधीन थीं।

अर्थात भारत के ऊर्जा संक्रमण का अगला चरण केवल कितनी विद्युत् बनाई जा सकती हैसे आगे बढ़कर विद्युत् को कब और कैसे उपलब्ध कराया जा सकता हैपर केंद्रित होना चाहिए।

ऊर्जा सुरक्षा और आयात निर्भरता:

भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के एक बड़े हिस्से के लिए आयातित तेल, गैस और कुछ हद तक कोयले पर निर्भर है। वैश्विक तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव, भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं।

नवीकरणीय ऊर्जा इस निर्भरता को कम करने का अवसर प्रदान करती है। सूर्य और हवा भारत के घरेलू संसाधन हैं। इसलिए सौर और पवन क्षमता का विस्तार ऊर्जा सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ता है।

इसके अतिरिक्त, भारत यदि सौर मॉड्यूल, सेल, बैटरी, इलेक्ट्रोलाइजर और अन्य स्वच्छ ऊर्जा उपकरणों का घरेलू उत्पादन बढ़ाता है, तो नवीकरणीय ऊर्जा केवल आयातित जीवाश्म ईंधनों का विकल्प नहीं रहेगी, बल्कि घरेलू विनिर्माण और रोजगार का भी आधार बनेगी।

आत्मनिर्भरता और विनिर्माण की चुनौती

भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में तेजी से विस्तार किया है, लेकिन सौर मॉड्यूल, उच्च दक्षता वाले सेल, बैटरी और महत्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भरता अभी भी चिंता का विषय है।

इसलिए ऊर्जा संक्रमण को आत्मनिर्भर ऊर्जा संक्रमणबनाना आवश्यक है। इसके लिए उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI), घरेलू विनिर्माण क्षमता, अनुसंधान एवं विकास, कौशल विकास और महत्वपूर्ण खनिजों की सुरक्षित आपूर्ति पर समान रूप से ध्यान देना होगा।

भारत के लिए यह अवसर है कि वह केवल नवीकरणीय ऊर्जा का बड़ा बाजार बनने के बजाय सौर उपकरण, बैटरी, ग्रीन हाइड्रोजन और ऊर्जा भंडारण तकनीकों का वैश्विक विनिर्माण केंद्र बने।

विकेंद्रीकृत ऊर्जा और समावेशी विकास

भारत के ऊर्जा संक्रमण का एक महत्वपूर्ण पहलू विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा होना चाहिए। बड़े सौर पार्कों के साथ-साथ रूफटॉप सोलर, सौर पंप, मिनी-ग्रिड और ग्रामीण ऊर्जा प्रणालियां दूरदराज के क्षेत्रों में ऊर्जा पहुंच को बेहतर बना सकती हैं।

PM-KUSUM जैसी योजनाएं कृषि क्षेत्र में सौर ऊर्जा को बढ़ावा देकर किसानों की सिंचाई लागत कम करने और डीजल पर निर्भरता घटाने में मदद कर सकती हैं। वहीं पीएम सूर्य घर योजना घरेलू स्तर पर रूफटॉप सोलर को बढ़ावा दे रही है।

इससे ऊर्जा उपभोक्ताधीरे-धीरे ऊर्जा उत्पादक’ (Prosumer) भी बन सकता है। यह ऊर्जा लोकतंत्रीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा।

प्रमुख चुनौतियां:

300 GW की उपलब्धि महत्वपूर्ण है लेकिन 2030 के 500 GW लक्ष्य तक पहुंचने के लिए कई चुनौतियों का समाधान आवश्यक है-

·        भूमि अधिग्रहण और पर्यावरणीय स्वीकृतियों को तेज करते हुए स्थानीय समुदायों के हितों की रक्षा करनी होगी।

·        नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं को ग्रिड से जोड़ने के लिए ट्रांसमिशन नेटवर्क का पर्याप्त विस्तार करना होगा।

·        ऊर्जा भंडारण की लागत कम करनी होगी।

·        डिस्कॉम की वित्तीय स्थिति सुधारना आवश्यक है, क्योंकि कमजोर वितरण कंपनियां बिजली क्षेत्र में निवेश और नवीकरणीय ऊर्जा की खरीद दोनों को प्रभावित करती हैं।

·        बड़े सौर एवं पवन प्रोजेक्टों के कारण जैव विविधता, भूमि उपयोग और स्थानीय आजीविका पर पड़ने वाले प्रभावों को वैज्ञानिक तरीके से संबोधित करना होगा।

आगे की राह:

भारत को अब क्षमता निर्माणसे ऊर्जा प्रणाली के पुनर्गठनकी ओर बढ़ना होगा। इसके लिए पांच आयामों पर विशेष ध्यान दिया जा सकता है-

 नवीकरणीय ऊर्जा और भंडारण: सौर और पवन ऊर्जा के साथ बड़े पैमाने पर बैटरी भंडारण तथा पंप्ड स्टोरेज परियोजनाओं का विकास करना, ताकि ऊर्जा आपूर्ति अधिक स्थिर और विश्वसनीय बन सके।

 ग्रीन ग्रिड: अंतरराज्यीय ट्रांसमिशन नेटवर्क को सुदृढ़ और आधुनिक बनाना, जिससे नवीकरणीय ऊर्जा का कुशल और निर्बाध वितरण सुनिश्चित हो सके।

 घरेलू विनिर्माण: सौर सेल, मॉड्यूल, बैटरी और अन्य स्वच्छ ऊर्जा उपकरणों की संपूर्ण घरेलू आपूर्ति श्रृंखला विकसित करना, जिससे आयात निर्भरता कम हो और आत्मनिर्भरता बढ़े।

 ग्रीन हाइड्रोजन: इस्पात, उर्वरक और भारी परिवहन जैसे कठिन-से-डीकार्बोनाइज क्षेत्रों में स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देना। राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन इस दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।

 न्यायसंगत संक्रमण: कोयला-आधारित अर्थव्यवस्थाओं और उनसे जुड़े श्रमिकों के लिए वैकल्पिक रोजगार के अवसर और कौशल विकास सुनिश्चित करना, ताकि ऊर्जा परिवर्तन समावेशी और सामाजिक रूप से संतुलित हो सके।

निष्कर्ष:

भारत का 300 GW गैर-जीवाश्म विद्युत क्षमता का आंकड़ा केवल एक सांख्यिकीय उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह देश की विकास रणनीति में हो रहे संरचनात्मक परिवर्तन का संकेत है। सौर ऊर्जा की तेज वृद्धि, पवन क्षमता का विस्तार और जलविद्युत तथा परमाणु ऊर्जा की भूमिका मिलकर भारत के ऊर्जा मिश्रण को अधिक विविध और स्वच्छ बना रही है। फिर भी 300 GW मंजिल नहीं, बल्कि 500 GW लक्ष्य की ओर एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी जब भारत सस्ती, विश्वसनीय, स्वच्छ और सभी के लिए सुलभ ऊर्जा उपलब्ध कराने के साथ-साथ अपने विनिर्माण आधार और ऊर्जा सुरक्षा को भी मजबूत कर सके।

 

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