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Daily-current-affairs / 11 Aug 2026

यूरेनियम से थोरियम तक: भारत की परमाणु ऊर्जा आत्मनिर्भरता की राह

यूरेनियम से थोरियम तक: भारत की परमाणु ऊर्जा आत्मनिर्भरता की राह

सन्दर्भ:

परमाणु ऊर्जा भारत के ऊर्जा संक्रमण का एक महत्वपूर्ण आधार बनकर उभर रही है। सरकार ने 2047 तक लगभग 100 GW परमाणु ऊर्जा क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा है। वर्तमान परमाणु क्षमता लगभग 8.8 GW है और इसे 2031-32 तक लगभग 22 GW तक बढ़ाने की योजना है। इस दीर्घकालिक विस्तार के केंद्र में केवल अधिक परमाणु रिएक्टर स्थापित करना नहीं, बल्कि परमाणु ईंधन की दीर्घकालिक उपलब्धता और स्वदेशी तकनीकी क्षमता विकसित करना भी है। हाल ही में एक संसदीय समिति ने सुझाव दिया है कि केंद्र सरकार को यूरेनियम खनन में खदान विकासकर्ता-सह- संचालक (एमडीओ) की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए एक नीतिगत रूपरेखा तैयार करनी चाहिए। यहीं से भारत के तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम और यूरेनियम-थोरियम रणनीति का महत्व सामने आता है।

क्यों महत्वपूर्ण है यूरेनियम?

परमाणु ऊर्जा उत्पादन में यूरेनियम सबसे महत्वपूर्ण ईंधनों में से एक है। प्राकृतिक यूरेनियम में मुख्यतः दो समस्थानिक यूरेनियम-238 और यूरेनियम-235 पाए जाते हैं। इनमें यूरेनियम-235 विखंडनीय (Fissile) होता है, जबकि यूरेनियम-238 मुख्यतः उर्वर (Fertile) पदार्थ है।

भारत ने अपने परमाणु कार्यक्रम के पहले चरण में प्रेशराइज़्ड हेवी वॉटर रिएक्टर (PHWRs) को अपनाया है। इन रिएक्टरों की विशेषता यह है कि वे प्राकृतिक यूरेनियम का उपयोग कर सकते हैं। इस कारण भारत को पहले चरण में महंगे यूरेनियम संवर्धन पर अपेक्षाकृत कम निर्भर रहना पड़ता है।

लेकिन समस्या यह है कि भारत के पास यूरेनियम की उपलब्धता थोरियम की तुलना में सीमित है। यही संसाधन-संबंधी वास्तविकता भारत के परमाणु कार्यक्रम की पूरी संरचना को प्रभावित करती है।

भारत का तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम:

भारत के परमाणु कार्यक्रम की सबसे बड़ी विशेषता इसकी दीर्घकालिक सोच है। डॉ. होमी जहांगीर भाभा ने ऐसी व्यवस्था की कल्पना की थी जिसमें सीमित यूरेनियम का अधिकतम उपयोग करके धीरे-धीरे भारत को अपने प्रचुर थोरियम संसाधनों पर आधारित परमाणु ऊर्जा व्यवस्था की ओर ले जाया जाए।

पहला चरण: PHWR और प्राकृतिक यूरेनियम

पहले चरण में प्रेशराइज़्ड हेवी वॉटर रिएक्टर (PHWRs) में प्राकृतिक यूरेनियम का उपयोग किया जाता है।

इस चरण में दो महत्वपूर्ण परिणाम प्राप्त होते हैं-

1.     विद्युत् उत्पादन।

2.     प्रयुक्त परमाणु ईंधन से प्लूटोनियम का उत्पादन।

यही प्लूटोनियम दूसरे चरण के लिए महत्वपूर्ण संसाधन बनता है।

इस प्रकार पहला चरण केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि आगे की परमाणु ईंधन श्रृंखला के लिए आधार तैयार करता है।

दूसरा चरण: फ़ास्ट ब्रीडर रिएक्टर

दूसरे चरण का केंद्र फ़ास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBR) है।

इसमें प्लूटोनियम आधारित ईंधन का उपयोग किया जाता है। इसका उद्देश्य केवल उपलब्ध ईंधन से ऊर्जा प्राप्त करना नहीं, बल्कि नए विखंडनीय पदार्थ का उत्पादन भी करना है।

यही कारण है कि FBR तकनीक भारत के लिए रणनीतिक महत्व रखती है। इसके माध्यम से यूरेनियम-238 जैसे उर्वर पदार्थ को अधिक उपयोगी विखंडनीय पदार्थ में परिवर्तित करने की क्षमता विकसित होती है।

2026 में प्रोटोटाइप फ़ास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) से जुड़ी महत्वपूर्ण प्रगति को भारत के तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम के दूसरे चरण की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना गया है। इससे परमाणु ईंधन के अधिक कुशल उपयोग और भविष्य में थोरियम के बड़े पैमाने पर उपयोग का मार्ग मजबूत होता है।

तीसरा चरण: थोरियम की ओर संक्रमण

भारत के परमाणु कार्यक्रम का अंतिम लक्ष्य थोरियम आधारित ऊर्जा व्यवस्था विकसित करना है।

भारत के पास विश्व के महत्वपूर्ण थोरियम संसाधनों में से एक बड़ा हिस्सा मौजूद है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना आवश्यक है- थोरियम स्वयं सीधे विखंडनीय ईंधन नहीं है।

थोरियम-232 एक उर्वर (Fertile) पदार्थ है, जो न्यूट्रॉन के अवशोषण के बाद यूरेनियम-233 में परिवर्तित हो सकता है। इसे रिएक्टर में न्यूट्रॉन अवशोषण की प्रक्रिया के माध्यम से यूरेनियम-233 में परिवर्तित किया जा सकता है। यूरेनियम-233 एक विखंडनीय पदार्थ है और इसका उपयोग परमाणु ऊर्जा उत्पादन में किया जा सकता है।

इसी उद्देश्य से भारत ने एडवांस्ड हैवी वॉटर रिएक्टर (AHWR) जैसी तकनीकों पर काम किया है।

इस प्रकार भारत की परमाणु यात्रा को सरल रूप में इस प्रकार समझा जा सकता है-

यूरेनियम प्लूटोनियम थोरियम यूरेनियम-233

यही भारत की तीन-चरणीय परमाणु रणनीति का मूल दर्शन है।

फिर यूरेनियम की आवश्यकता क्यों?

यही भारत की परमाणु रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण विरोधाभास है। थोरियम की उपलब्धता अधिक होने के बावजूद भारत तत्काल थोरियम आधारित परमाणु अर्थव्यवस्था स्थापित नहीं कर सकता। इसके लिए विशेष रिएक्टर, ईंधन चक्र, पुनर्संसाधन तकनीक और यूरेनियम-233 से जुड़ी जटिल तकनीकी क्षमताओं की आवश्यकता है।

इसलिए आने वाले वर्षों में भारत को यूरेनियम की आवश्यकता बनी रहेगी।

यही कारण है कि घरेलू यूरेनियम उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ भारत विभिन्न देशों से दीर्घकालिक आपूर्ति समझौते कर रहा है। ऑस्ट्रेलिया के साथ जुलाई 2026 में हुआ नागरिक परमाणु सहयोग समझौता भी इसी व्यापक ऊर्जा सुरक्षा रणनीति से जुड़ा है, जिसके तहत शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम की दीर्घकालिक आपूर्ति का मार्ग मजबूत हुआ है।

प्रमुख चुनौतियाँ:

1. उच्च प्रारंभिक लागत

परमाणु संयंत्रों की स्थापना में भारी पूंजी निवेश की आवश्यकता होती है। परियोजनाओं में देरी होने पर लागत और बढ़ जाती है।

2. परमाणु सुरक्षा

परमाणु ऊर्जा में सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। रिएक्टर डिजाइन, आपातकालीन प्रतिक्रिया, रेडियोधर्मी पदार्थों के प्रबंधन और स्वतंत्र नियमन को लगातार मजबूत करना होगा।

3. रेडियोधर्मी अपशिष्ट

परमाणु अपशिष्ट का सुरक्षित, दीर्घकालिक प्रबंधन एक महत्वपूर्ण तकनीकी और सामाजिक चुनौती है।

4. मानव संसाधन

100 GW की क्षमता के लिए वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, तकनीशियनों और प्रशिक्षित नियामकीय मानव संसाधन की बड़ी संख्या में आवश्यकता होगी।

5. सामाजिक स्वीकार्यता

परमाणु परियोजनाओं के लिए स्थानीय समुदायों का विश्वास हासिल करना आवश्यक है। पारदर्शिता, पर्यावरणीय प्रभाव आकलन और पुनर्वास की गुणवत्ता इस विश्वास को निर्धारित करेगी।

आगे की राह:

भारत को परमाणु ऊर्जा विस्तार के लिए एक समेकित परमाणु रणनीति अपनानी होगी-

·        घरेलू यूरेनियम खनन और खोज को तेज करना होगा।

·        परमाणु ईंधन चक्र में आत्मनिर्भरता बढ़ानी होगी।

·        PHWR के साथ FBR और SMR जैसी नई तकनीकों को समानांतर रूप से विकसित करना होगा।

·        थोरियम आधारित तीसरे चरण के अनुसंधान को निरंतर वित्तीय और संस्थागत समर्थन देना होगा।

·        परमाणु ऊर्जा को सौर, पवन, जलविद्युत, बैटरी स्टोरेज और ग्रीन हाइड्रोजन के साथ एकीकृत ऊर्जा रणनीति का हिस्सा बनाना होगा।

·        परमाणु सुरक्षा और नियामकीय स्वतंत्रता को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी।

निष्कर्ष:

भारत का परमाणु कार्यक्रम केवल विद्युत् उत्पादन की परियोजना नहीं है; यह दीर्घकालिक ऊर्जा आत्मनिर्भरता और रणनीतिक स्वायत्तता की परियोजना है।

भारत के सामने एक ओर सीमित यूरेनियम संसाधन हैं, तो दूसरी ओर विशाल थोरियम क्षमता। तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम इसी विरोधाभास को अवसर में बदलने का प्रयास है। पहले चरण में यूरेनियम, दूसरे चरण में प्लूटोनियम और तीसरे चरण में थोरियम-आधारित यूरेनियम-233 चक्र की परिकल्पना भारत को दीर्घकालिक ईंधन आत्मनिर्भरता की दिशा में ले जाती है।

2047 तक 100 GW परमाणु क्षमता का लक्ष्य तभी सफल होगा जब भारत ईंधन सुरक्षा, तकनीकी आत्मनिर्भरता, सुरक्षित रिएक्टर तकनीक, आर्थिक व्यवहार्यता और सामाजिक स्वीकार्यता, इन सभी को एक साथ साध सके।

 

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