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Daily-current-affairs / 19 Oct 2026

विश्व के वनों की स्थिति रिपोर्ट 2026: वन पुनर्स्थापन से जलवायु सुरक्षा और सतत विकास की ओर

विश्व के वनों की स्थिति रिपोर्ट 2026: वन पुनर्स्थापन से जलवायु सुरक्षा और सतत विकास की ओर

संदर्भ:

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) ने हाल ही में अपनी द्विवार्षिक रिपोर्ट ‘विश्व के वनों की स्थिति 2026’ (The State of the World's Forests 2026) जारी की। इस वर्ष रिपोर्ट का विषय ‘वनों और भू-दृश्यों का पुनर्स्थापन: सतत भविष्य की दिशा में आगे का मार्ग’ (Restoring Forests and Landscapes: The Way Forward for a Sustainable Future) है। यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है जब विश्व जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता के क्षरण, भूमि निम्नीकरण और खाद्य असुरक्षा जैसी परस्पर जुड़ी चुनौतियों का सामना कर रहा है। रिपोर्ट का केंद्रीय संदेश है कि वनों का पुनर्स्थापन केवल पर्यावरण संरक्षण का उपाय नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण विकास में दीर्घकालिक निवेश भी है।

वैश्विक वन संसाधनों की स्थिति:

      • खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) की विश्व के वनों की स्थिति रिपोर्ट 2026 वैश्विक वन संसाधनों की वर्तमान स्थिति और वन पुनर्स्थापन की प्रगति के बीच अंतर को उजागर करती है। रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष निम्नलिखित हैं:
        • वैश्विक वन क्षेत्र: विश्व में लगभग 4.14 अरब हेक्टेयर वन क्षेत्र है, जो पृथ्वी के कुल स्थलीय क्षेत्र का लगभग 32% है।
        • कार्बन भंडारण: विश्व के वन लगभग 714 गीगाटन कार्बन का भंडारण करते हैं, जिससे वे जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
        • जैव विविधता का संरक्षण: वन स्थलीय जैव विविधता के एक बड़े हिस्से को आश्रय प्रदान करते हैं और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में सहायक हैं।
        • वन पुनर्स्थापन: रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 20.65 करोड़ हेक्टेयर वन क्षेत्र पुनर्स्थापन के अंतर्गत है।
        • वनों का विनाश: वर्ष 1990 से विश्व में 48.9 करोड़ हेक्टेयर से अधिक वन क्षेत्र का नुकसान हुआ है।
        • पुनर्स्थापन की प्रतिबद्धताएँ: विभिन्न वैश्विक पहलों के माध्यम से एक अरब हेक्टेयर से अधिक भूमि के पुनर्स्थापन की प्रतिबद्धताएँ व्यक्त की गई हैं, लेकिन इनके प्रभावी क्रियान्वयन की दिशा में अभी भी चुनौतियाँ मौजूद हैं।
      • ये आँकड़े स्पष्ट करते हैं कि वन संरक्षण और पुनर्स्थापन के लिए केवल अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताएँ पर्याप्त नहीं हैं। इनके प्रभावी क्रियान्वयन, पर्याप्त वित्तपोषण, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और वैज्ञानिक निगरानी पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है।

State of the World’s Forests Report 2026

वन पुनर्स्थापन की आवश्यकता: 

      • जलवायु परिवर्तन का शमन: वन प्राकृतिक कार्बन सिंक के रूप में कार्य करते हैं। वे वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करके वैश्विक तापमान वृद्धि को सीमित करने में सहायता करते हैं। स्वस्थ वन पारिस्थितिकी तंत्र वर्षा चक्र, स्थानीय तापमान और जल संतुलन को भी नियंत्रित करते हैं। हालाँकि, केवल वृक्षारोपण को जलवायु समाधान मानना पर्याप्त नहीं है। प्राकृतिक वनों का संरक्षण, क्षतिग्रस्त पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली और दीर्घकालिक वन प्रबंधन अधिक महत्त्वपूर्ण हैं।
      • जैव विविधता का संरक्षण: वन असंख्य वनस्पतियों, जीव-जंतुओं और सूक्ष्मजीवों के प्राकृतिक आवास हैं। वनों का विखंडन प्रजातियों के आवागमन, प्रजनन और आनुवंशिक विविधता को प्रभावित करता है। वन पुनर्स्थापन से वन्यजीव गलियारों की निरंतरता, पारिस्थितिक संतुलन और संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण को बढ़ावा मिल सकता है।
      • खाद्य एवं जल सुरक्षा: वन मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने, भूजल पुनर्भरण और जलग्रहण क्षेत्रों के संरक्षण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कृषि वानिकी, स्थानीय वृक्ष प्रजातियों और टिकाऊ भूमि प्रबंधन को प्रोत्साहन देकर खाद्य उत्पादन को जलवायु जोखिमों के प्रति अधिक अनुकूल बनाया जा सकता है। इस प्रकार वन संरक्षण और कृषि विकास परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक लक्ष्य हैं।
      • ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आजीविका: वन आधारित आजीविका विशेष रूप से आदिवासी और ग्रामीण समुदायों के लिए महत्त्वपूर्ण है। लघु वनोपज, औषधीय पौधे, शहद, बाँस और अन्य वन उत्पाद आय एवं रोजगार उपलब्ध कराते हैं। समुदाय आधारित पुनर्स्थापन से पर्यावरणीय लाभों के साथ स्थानीय आर्थिक सशक्तीकरण भी संभव है।

वन पुनर्स्थापन का आर्थिक महत्त्व:

      • खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के अनुसार, एक अरब हेक्टेयर से अधिक क्षतिग्रस्त भूमि का पुनर्स्थापन प्रतिवर्ष लगभग 1.8 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के लाभ उत्पन्न कर सकता है। अनुकूल परिस्थितियों में पुनर्स्थापन पर निवेश किए गए प्रत्येक एक डॉलर से 30 डॉलर तक का प्रतिफल संभव है।
      • इससे स्पष्ट है कि पर्यावरण संरक्षण को आर्थिक विकास पर बोझ समझने की अपेक्षा प्राकृतिक पूँजी में निवेश के रूप में देखना चाहिए। हालाँकि, ये संभावित लाभ हैं; वास्तविक परिणाम स्थानीय परिस्थितियों, वित्तपोषण और प्रभावी प्रबंधन पर निर्भर करेंगे।

भारत के लिए प्रासंगिकता:

      • भारत में वन संरक्षण का संबंध पर्यावरणीय सुरक्षा के साथ आजीविका, आदिवासी अधिकारों और जलवायु प्रतिबद्धताओं से भी जुड़ा है।
      • भारतीय वन सर्वेक्षण की भारत वन स्थिति रिपोर्ट 2023 के अनुसार, देश का कुल वन एवं वृक्ष आवरण लगभग 25.17 प्रतिशत है। लेकिन केवल वन आवरण में वृद्धि को पारिस्थितिक सुधार का पूर्ण प्रमाण नहीं माना जा सकता। प्राकृतिक वनों की गुणवत्ता, प्रजातीय विविधता और पारिस्थितिक सेवाओं का मूल्यांकन भी आवश्यक है।
      • भारत ने हरित भारत मिशन, CAMPA, संयुक्त वन प्रबंधन तथा कृषि वानिकी जैसी पहलों के माध्यम से वन संरक्षण को बढ़ावा दिया है। इसके अतिरिक्त, वन अधिकार अधिनियम, 2006 सामुदायिक भागीदारी और वन संसाधनों पर परंपरागत अधिकारों को मान्यता देने का महत्त्वपूर्ण आधार प्रदान करता है।
      • फिर भी हिमालय, पश्चिमी घाट, मध्य भारतीय वन क्षेत्रों और शुष्क पारिस्थितिकी तंत्रों में विकास परियोजनाओं, खनन, वनाग्नि तथा भूमि उपयोग परिवर्तन से उत्पन्न दबाव गंभीर चुनौती बने हुए हैं।

विश्व के वनों की स्थिति रिपोर्ट 2026

वन पुनर्स्थापन के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ:

      • वित्तीय संसाधनों की कमी: पुनर्स्थापन परियोजनाओं के लिए दीर्घकालिक निवेश आवश्यक है, जबकि अनेक कार्यक्रम अल्पकालिक बजट और वृक्षारोपण लक्ष्यों पर केंद्रित रहते हैं।
      • पारिस्थितिक गुणवत्ता की उपेक्षा: एकल प्रजाति के वृक्षारोपण से हरित आवरण बढ़ सकता है, लेकिन प्राकृतिक वनों जैसी जैव विविधता विकसित होना आवश्यक नहीं है।
      • स्थानीय समुदायों की सीमित भागीदारी: भूमि अधिकारों की अस्पष्टता और निर्णय प्रक्रिया से समुदायों का बहिष्कार परियोजनाओं की स्थिरता को प्रभावित करता है।
      • विकास और संरक्षण के बीच टकराव: अवसंरचना, औद्योगीकरण और खनन परियोजनाओं से प्राकृतिक आवासों का विखंडन बढ़ सकता है।
      • निगरानी की कमजोरी: केवल लगाए गए पौधों की संख्या के बजाय उनकी उत्तरजीविता, कार्बन भंडारण और जैव विविधता की बहाली को मापना आवश्यक है।

आगे की राह:

      • FAO की रिपोर्ट वन पुनर्स्थापन को व्यापक स्तर पर लागू करने के लिए चार परस्पर पूरक रणनीतियाँ प्रस्तुत करती है:
        • समुदायों का सशक्तीकरण: आदिवासी एवं स्थानीय समुदायों के अधिकार, पारंपरिक ज्ञान और निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
        • भू-दृश्य आधारित पुनर्स्थापन: वन, कृषि भूमि, जलस्रोत और जैव विविधता को एकीकृत दृष्टिकोण से पुनर्स्थापित किया जाए।
        • दीर्घकालिक हरित वित्तपोषण: सार्वजनिक निवेश, निजी पूँजी, पारिस्थितिकी सेवाओं के भुगतान और उत्तरदायी कार्बन वित्त का उपयोग बढ़ाया जाए।
        • नीतिगत एवं संस्थागत समन्वय: वन, कृषि, जल, ग्रामीण विकास और जलवायु नीतियों के बीच तालमेल स्थापित किया जाए।
      • भारत को इन रणनीतियों के अनुरूप क्षेत्र-विशिष्ट पुनर्स्थापन योजनाएँ विकसित करनी चाहिए। साथ ही उपग्रह आधारित निगरानी, वैज्ञानिक मूल्यांकन और ग्राम सभाओं की भागीदारी को प्राथमिकता देनी होगी।

निष्कर्ष:

विश्व के वनों की स्थिति रिपोर्ट 2026 यह स्पष्ट करती है कि मानव विकास और पर्यावरण संरक्षण को अलग-अलग लक्ष्यों के रूप में नहीं देखा जा सकता। वन पुनर्स्थापन जलवायु परिवर्तन से निपटने, खाद्य सुरक्षा मजबूत करने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को टिकाऊ बनाने का साझा अवसर प्रदान करता है।

भारत सहित विश्व के देशों के लिए अब प्राथमिकता केवल वृक्षारोपण के आँकड़े बढ़ाना नहीं, बल्कि स्वस्थ, जैव विविधता से समृद्ध और समुदायों के लिए उपयोगी पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना होनी चाहिए।

वास्तविक सतत विकास वही है, जिसमें वन संरक्षण, आर्थिक समृद्धि और सामाजिक न्याय एक-दूसरे के पूरक बनें।

 

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