प्रस्तावना:
3 जनवरी 2026 को अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक ऐसे प्रतिमान विस्थापन (Paradigm Shift) दर्ज किया गया है, जिसने न केवल पश्चिमी गोलार्ध के शक्ति-संतुलन को बदला, बल्कि द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात निर्मित 'नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था' (Rules-Based International Order) की प्रासंगिकता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए। संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा संचालित 'ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिज़ॉल्व' (Operation Absolute Resolve) के अंतर्गत वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की हिरासत केवल एक संप्रभु राष्ट्र में सत्ता परिवर्तन की घटना नहीं थी बल्कि यह एक नई अमेरिकी विदेश नीति के उदय की उद्घोषणा थी। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से प्रतिपादित 'डोनरो सिद्धांत' (Donroe Doctrine) ने यह स्पष्ट कर दिया है कि 21वीं सदी की महाशक्ति राजनीति अब उदारवादी अंतरराष्ट्रीयवाद (Liberal Internationalism) के आवरण को त्यागकर यथार्थवाद (Realism) और प्रभाव-क्षेत्र (Spheres of Influence) की कठोर नीतियों की ओर लौट रही है।
ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिज़ॉल्व:
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- वेनेजुएला की राजधानी काराकास में की गई सैन्य कार्रवाई को अमेरिका ने 'राष्ट्रीय सुरक्षा अभियान' की संज्ञा दी। पिछले कई महीनों से कैरेबियन क्षेत्र में अमेरिकी नौसैनिक जमावड़ा और वेनेजुएला की समुद्री घेराबंदी इस बात का संकेत दे रही थी कि वाशिंगटन अब कूटनीतिक प्रतिबंधों से आगे बढ़कर प्रत्यक्ष हस्तक्षेप की ओर बढ़ रहा है।
- इस सैन्य हस्तक्षेप का प्राथमिक तर्क 'नार्को-टेररिस्ट शासन' का उन्मूलन था। ट्रंप प्रशासन के अनुसार, मादुरो शासन केवल एक तानाशाही नहीं थी, बल्कि एक ऐसा आपराधिक तंत्र था जो वैश्विक मादक पदार्थ तस्करी नेटवर्क का केंद्र बन चुका था। यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि अमेरिका ने इस बार 'लोकतंत्र की स्थापना' जैसे पारंपरिक उदारवादी नारों का उपयोग न करके 'अमेरिकी नागरिकों की सुरक्षा' को आधार बनाया, जो उसकी विदेश नीति में आए वैचारिक बदलाव को दर्शाता है।
- वेनेजुएला की राजधानी काराकास में की गई सैन्य कार्रवाई को अमेरिका ने 'राष्ट्रीय सुरक्षा अभियान' की संज्ञा दी। पिछले कई महीनों से कैरेबियन क्षेत्र में अमेरिकी नौसैनिक जमावड़ा और वेनेजुएला की समुद्री घेराबंदी इस बात का संकेत दे रही थी कि वाशिंगटन अब कूटनीतिक प्रतिबंधों से आगे बढ़कर प्रत्यक्ष हस्तक्षेप की ओर बढ़ रहा है।
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डोनरो सिद्धांत:
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- 'डोनरो सिद्धांत' (Donroe Doctrine) शब्द वर्ष 1823 के प्रसिद्ध 'मोनरो सिद्धांत' और डोनाल्ड ट्रंप की 'अमेरिका फर्स्ट' नीति का एक हाइब्रिड संकलन है। जहाँ मूल मोनरो सिद्धांत का उद्देश्य यूरोपीय शक्तियों को अमेरिकी महाद्वीप में हस्तक्षेप से रोकना था, वहीं 'डोनरो सिद्धांत' इसे एक कदम आगे ले जाता है।
- इसके मुख्य स्तंभ निम्नलिखित हैं:
- क्षेत्रीय आधिपत्य का पुनरुद्धार: अमेरिका पश्चिमी गोलार्ध को अपना अनन्य प्रभाव-क्षेत्र मानता है। इसमें चीन और रूस जैसे बाहरी प्रतिद्वंद्वियों की उपस्थिति को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सीधा खतरा माना गया है।
- हस्तक्षेप का सैन्यीकरण: कूटनीति और आर्थिक प्रतिबंधों के स्थान पर प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई को एक वैध साधन के रूप में स्वीकार करना।
- प्रतीकात्मक भू-राजनीति: मेक्सिको की खाड़ी को 'अमेरिका की खाड़ी' (Gulf of America) कहना केवल नामकरण नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संदेश है कि अमेरिका अपने निकटवर्ती समुद्री क्षेत्रों पर पूर्ण नियंत्रण चाहता है।
- क्षेत्रीय आधिपत्य का पुनरुद्धार: अमेरिका पश्चिमी गोलार्ध को अपना अनन्य प्रभाव-क्षेत्र मानता है। इसमें चीन और रूस जैसे बाहरी प्रतिद्वंद्वियों की उपस्थिति को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सीधा खतरा माना गया है।
- यह सिद्धांत बहुपक्षवाद (Multilateralism) के स्थान पर एकपक्षवाद (Unilateralism) को प्राथमिकता देता है, जो यह संकेत देता है कि अमेरिका अब नाटो या संयुक्त राष्ट्र जैसे संस्थानों की सहमति की प्रतीक्षा करने के बजाय अपने 'कोर' हितों के लिए स्वतंत्र रूप से कार्य करेगा।
- 'डोनरो सिद्धांत' (Donroe Doctrine) शब्द वर्ष 1823 के प्रसिद्ध 'मोनरो सिद्धांत' और डोनाल्ड ट्रंप की 'अमेरिका फर्स्ट' नीति का एक हाइब्रिड संकलन है। जहाँ मूल मोनरो सिद्धांत का उद्देश्य यूरोपीय शक्तियों को अमेरिकी महाद्वीप में हस्तक्षेप से रोकना था, वहीं 'डोनरो सिद्धांत' इसे एक कदम आगे ले जाता है।
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फेंटेनिल संकट: सुरक्षा का नया विमर्श और 'WMD' का विस्तार
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- इस संकट का सबसे प्रभावी विमर्श फेंटेनिल (Fentanyl) और सिंथेटिक ओपिओइड का बढ़ता प्रकोप है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, फेंटानिल एक शक्तिशाली सिंथेटिक ओपिओइड दवा है जिसका उपयोग दर्द निवारक और बेहोशी की दवा के रूप में किया जाता है। फेंटानिल की समस्या यह है कि यह हेरोइन या मॉर्फिन से 30 से 100 गुना अधिक शक्तिशाली हो सकती है और इसका असर बहुत तेजी से होता है, जिससे बड़ी संख्या में लोगों की मौत हो जाती है। अमेरिका में फेंटानिल से संबंधित ओवरडोज के कारण कुल ओवरडोज से होने वाली मौतों में से 69 प्रतिशत से अधिक मौतें हुई हैं।
- ट्रंप प्रशासन द्वारा फेंटेनिल और उसके रासायनिक घटकों को 'सामूहिक विनाश के हथियार' ('Weapons of Mass Destruction' -WMD) की श्रेणी में रखना अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विमर्श में एक बदलाव है। पारंपरिक रूप से WMD शब्द परमाणु, जैविक या रासायनिक हथियारों के लिए आरक्षित था। मादक पदार्थों को इस श्रेणी में लाकर अमेरिका ने किसी भी ऐसे देश के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई का द्वार खोल दिया है, जो इन पदार्थों के उत्पादन या तस्करी में लिप्त पाया जाता है। यह सुरक्षाकरण (Securitization) की वह प्रक्रिया है जहाँ एक जनस्वास्थ्य समस्या को अस्तित्वगत सैन्य खतरे में बदल दिया जाता है।
- इस संकट का सबसे प्रभावी विमर्श फेंटेनिल (Fentanyl) और सिंथेटिक ओपिओइड का बढ़ता प्रकोप है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, फेंटानिल एक शक्तिशाली सिंथेटिक ओपिओइड दवा है जिसका उपयोग दर्द निवारक और बेहोशी की दवा के रूप में किया जाता है। फेंटानिल की समस्या यह है कि यह हेरोइन या मॉर्फिन से 30 से 100 गुना अधिक शक्तिशाली हो सकती है और इसका असर बहुत तेजी से होता है, जिससे बड़ी संख्या में लोगों की मौत हो जाती है। अमेरिका में फेंटानिल से संबंधित ओवरडोज के कारण कुल ओवरडोज से होने वाली मौतों में से 69 प्रतिशत से अधिक मौतें हुई हैं।
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भू-राजनीति के केंद्र में ऊर्जा: तेल भंडार और आर्थिक वर्चस्व
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- वेनेजुएला के संकट के केंद्र में हमेशा से तेल रहा है। लगभग 300 अरब बैरल से अधिक के तेल भंडार के साथ वेनेजुएला विश्व में प्रथम स्थान पर है, जो सऊदी अरब से भी अधिक है। इसके बावजूद, मादुरो शासन के दौरान कुप्रबंधन और अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण उत्पादन मात्र 10 लाख बैरल प्रतिदिन तक सिमट गया था।
- 'ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिज़ॉल्व' के बाद अमेरिकी तेल कंपनियों की वेनेजुएला में वापसी की घोषणा और तेल बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण का प्रस्ताव इराक युद्ध के बाद की ऊर्जा कूटनीति की याद दिलाता है। ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि वेनेजुएला के तेल संसाधनों का उपयोग उसी देश के बुनियादी ढांचे को ठीक करने के लिए किया जाएगा, लेकिन इसके गहरे भू-राजनीतिक निहितार्थ हैं:
- चीन और रूस का निष्कासन: वेनेजुएला का तेल क्षेत्र चीनी और रूसी ऋणों के लिए गिरवी था। वेनेजुएला ने पिछले दशकों में चीन और रूस से भारी मात्रा में ऋण लिया था। इस कर्ज की अदायगी के लिए वेनेजुएला ने अपने तेल भंडार (दुनिया के सबसे बड़े प्रमाणित भंडार) को गारंटी के तौर पर रखा था। वेनेजुएला पर चीन का लगभग $60 बिलियन का बकाया है, जिसे तेल निर्यात के माध्यम से चुकाया जाना था। रूसी कंपनी 'रोजनेफ्ट' (Rosneft) ने वेनेजुएला के तेल क्षेत्रों में बड़ा निवेश किया था और कर्ज के बदले तेल निकालने के अधिकार प्राप्त किए थे। अमेरिकी नियंत्रण इन प्रतिद्वंद्वियों को ऊर्जा सुरक्षा के मोर्चे पर बड़ा झटका देता है।
- वैश्विक तेल मूल्य नियंत्रण: वेनेजुएला के उत्पादन में वृद्धि वैश्विक तेल बाजार में ओपेक (OPEC) और विशेष रूप से रूस (OPEC+) के प्रभाव को कम कर सकती है।
- चीन और रूस का निष्कासन: वेनेजुएला का तेल क्षेत्र चीनी और रूसी ऋणों के लिए गिरवी था। वेनेजुएला ने पिछले दशकों में चीन और रूस से भारी मात्रा में ऋण लिया था। इस कर्ज की अदायगी के लिए वेनेजुएला ने अपने तेल भंडार (दुनिया के सबसे बड़े प्रमाणित भंडार) को गारंटी के तौर पर रखा था। वेनेजुएला पर चीन का लगभग $60 बिलियन का बकाया है, जिसे तेल निर्यात के माध्यम से चुकाया जाना था। रूसी कंपनी 'रोजनेफ्ट' (Rosneft) ने वेनेजुएला के तेल क्षेत्रों में बड़ा निवेश किया था और कर्ज के बदले तेल निकालने के अधिकार प्राप्त किए थे। अमेरिकी नियंत्रण इन प्रतिद्वंद्वियों को ऊर्जा सुरक्षा के मोर्चे पर बड़ा झटका देता है।
- वेनेजुएला के संकट के केंद्र में हमेशा से तेल रहा है। लगभग 300 अरब बैरल से अधिक के तेल भंडार के साथ वेनेजुएला विश्व में प्रथम स्थान पर है, जो सऊदी अरब से भी अधिक है। इसके बावजूद, मादुरो शासन के दौरान कुप्रबंधन और अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण उत्पादन मात्र 10 लाख बैरल प्रतिदिन तक सिमट गया था।
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अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र की प्रासंगिकता:
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- 3 जनवरी की घटना ने अंतरराष्ट्रीय कानून के बुनियादी सिद्धांतों, संप्रभुता और गैर-हस्तक्षेप पर गंभीर प्रहार किया है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(4) स्पष्ट रूप से किसी भी देश की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के विरुद्ध बल प्रयोग को निषिद्ध करता है।
- मादुरो की हिरासत के विरुद्ध वैश्विक प्रतिक्रिया अलग अलग है जहाँ चीन, रूस, ईरान और क्यूबा ने आक्रामकता और अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया और नियम-आधारित व्यवस्था का अंत है। वहीँ पश्चिमी सहयोगियों ने इसे एक 'अपवाद' के रूप में देखा है, जिसे सुरक्षा के आधार पर उचित ठहराया गया है।
- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की विफलता यहाँ स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। अमेरिका की वीटो शक्ति उसे किसी भी दंडात्मक कार्रवाई से बचाती है। यह स्थिति 19वीं सदी की 'शक्ति ही अधिकार है' (Might is Right) वाली राजनीति की ओर वापसी का संकेत देती है, जहाँ अंतरराष्ट्रीय कानून केवल छोटी शक्तियों पर लागू होता है, जबकि महाशक्तियां अपनी सुरक्षा परिभाषाओं के आधार पर कानून का निर्माण करती हैं।
- 3 जनवरी की घटना ने अंतरराष्ट्रीय कानून के बुनियादी सिद्धांतों, संप्रभुता और गैर-हस्तक्षेप पर गंभीर प्रहार किया है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(4) स्पष्ट रूप से किसी भी देश की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के विरुद्ध बल प्रयोग को निषिद्ध करता है।
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भारत के सन्दर्भ में रणनीतिक और नैतिक चुनौतियां:
भारत के लिए वेनेजुएला संकट एक जटिल कूटनीतिक पहेली है। भारत की विदेश नीति पारंपरिक रूप से 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) और 'गुटनिरपेक्षता' के आदर्शों पर आधारित रही है।
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- नैतिक दुविधा: भारत हमेशा से किसी देश के आंतरिक मामलों में बाहरी सैन्य हस्तक्षेप का विरोधी रहा है। यदि भारत इस कार्रवाई का समर्थन करता तो वह अपनी दीर्घकालिक सैद्धांतिक स्थिति को कमजोर करेगा। यदि विरोध करता, तो अमेरिका के साथ उसके प्रगाढ़ होते रक्षा और तकनीकी संबंधों (जैसे iCET और इंडो-पैसिफिक साझेदारी) में तनाव आ सकता है।
- ऊर्जा सुरक्षा: भारत की रिलायंस और नायरा जैसी रिफाइनरियां वेनेजुएला के भारी कच्चे तेल (Heavy Crude) को संसाधित करने में सक्षम हैं। यदि अमेरिकी नियंत्रण के तहत उत्पादन बढ़ता है, तो भारत को रूसी तेल पर निर्भरता कम करने और ऊर्जा स्रोतों के विविधीकरण का एक नया विकल्प मिल सकता है।
- वैश्विक व्यवस्था का भविष्य: भारत एक 'बहु-ध्रुवीय विश्व' का पक्षधर है। डोनरो सिद्धांत के तहत अमेरिका का एकपक्षीय व्यवहार भारत के उस दृष्टिकोण के लिए चुनौती है, जहाँ अंतरराष्ट्रीय नियम सर्वोपरि होने चाहिए।
- नैतिक दुविधा: भारत हमेशा से किसी देश के आंतरिक मामलों में बाहरी सैन्य हस्तक्षेप का विरोधी रहा है। यदि भारत इस कार्रवाई का समर्थन करता तो वह अपनी दीर्घकालिक सैद्धांतिक स्थिति को कमजोर करेगा। यदि विरोध करता, तो अमेरिका के साथ उसके प्रगाढ़ होते रक्षा और तकनीकी संबंधों (जैसे iCET और इंडो-पैसिफिक साझेदारी) में तनाव आ सकता है।
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भारत की संभावित प्रतिक्रिया 'संयमित मौन' और 'सक्रिय कूटनीति' का मिश्रण है। भारत संभवतः इस मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र में किसी भी पक्ष की ओर झुकने के बजाय 'हिंसा की समाप्ति' और 'क्षेत्रीय स्थिरता' की अपील करेगा, जबकि पर्दे के पीछे वह नई वेनेजुएला व्यवस्था के साथ अपने ऊर्जा हितों को सुरक्षित करने का प्रयास करेगा।
निष्कर्ष:
वेनेजुएला में निकोलस मादुरो की हिरासत वैश्विक उदारवादी सहमति का अंत है जिसने शीत युद्ध के बाद के तीन दशकों तक विश्व राजनीति को निर्देशित किया था। साथ ही यह संकट वैश्विक समुदाय को चेतावनी देता है कि यदि अंतरराष्ट्रीय संस्थान (जैसे UN) स्वयं में सुधार नहीं करते और वैश्विक शक्तियों के कार्यों को नियंत्रित करने में विफल रहते हैं, तो विश्व पुनः 'प्रभाव-क्षेत्रों' के संघर्ष में डूब जाएगा। भविष्य की विश्व राजनीति अब संप्रभुता की रक्षा और सुरक्षा की अनिवार्यता के बीच एक निरंतर तनाव का क्षेत्र होगी।
UPSC/PCS मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न- संप्रभुता और गैर-हस्तक्षेप के सिद्धांतों के संदर्भ में अमेरिका–वेनेजुएला संकट की वैधता का परीक्षण कीजिए। क्या यह हस्तक्षेप अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप ठहराया जा सकता है?

