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Daily-current-affairs / 02 Nov 2026

भारत में श्रम की बदलती प्रकृति: गिग अर्थव्यवस्था एवं घरेलू कार्यों की पहचान की आवश्यकता

भारत में श्रम की बदलती प्रकृति: गिग अर्थव्यवस्था एवं घरेलू कार्यों की पहचान की आवश्यकता

संदर्भ:

हाल ही में सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (Periodic Labour Force Survey-PLFS) में व्यापक बदलाव करने का प्रस्ताव दिया है। इसका उद्देश्य भारत में तेजी से बढ़ते गिग एवं प्लेटफॉर्म आधारित श्रमिकों तथा महिलाओं द्वारा किए जाने वाले अवैतनिक घरेलू और देखभाल संबंधी कार्यों को रोजगार के आंकड़ों में बेहतर ढंग से शामिल करना है। प्रस्तावित बदलाव जनवरी 2027 से लागू किए जाने हैं। इसके लिए मंत्रालय ने विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं और आम नागरिकों से सुझाव भी आमंत्रित किए हैं। यह पहल भारतीय श्रम बाजार की बदलती वास्तविकताओं को समझने और रोजगार की अधिक समावेशी परिभाषा विकसित करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम है।

भारत में रोजगार आकलन की वर्तमान व्यवस्था:

      • किसी भी देश की आर्थिक प्रगति का आकलन केवल सकल घरेलू उत्पाद (GDP) या औद्योगिक विकास के आधार पर नहीं किया जा सकता, बल्कि यह भी देखना आवश्यक है कि आर्थिक गतिविधियों में कितने लोग भाग ले रहे हैं और उन्हें किस प्रकार का रोजगार प्राप्त है। इसके लिए विश्वसनीय श्रम संबंधी आंकड़ों की आवश्यकता होती है।
      • भारत में रोजगार एवं बेरोजगारी से संबंधित आंकड़े एकत्र करने का प्रमुख माध्यम आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) है। इसकी शुरुआत वर्ष 2017-18 में राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा की गई थी। इसका उद्देश्य रोजगार, बेरोजगारी, श्रम बल भागीदारी दर और श्रमिक जनसंख्या अनुपात जैसे संकेतकों का आकलन करना है।
      • वर्तमान व्यवस्था में रोजगार के आंकड़े मुख्य रूप से वेतनभोगी, स्वरोजगार और आकस्मिक श्रम जैसी श्रेणियों पर आधारित होते हैं। हालांकि, बदलती अर्थव्यवस्था में रोजगार के नए स्वरूप उभर रहे हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर काम करने वाले श्रमिकों तथा घरों में किए जाने वाले अवैतनिक कार्यों को पारंपरिक रोजगार मापन व्यवस्था में पर्याप्त स्थान नहीं मिल पाया है। परिणामस्वरूप, श्रम बाजार की वास्तविक स्थिति का आकलन अधूरा रह जाता है।

गिग अर्थव्यवस्था का विस्तार और नए रोजगार संबंध:

      • डिजिटल तकनीक, इंटरनेट और स्मार्टफोन के विस्तार ने भारत में रोजगार के स्वरूप को तेजी से बदला है। अब बड़ी संख्या में लोग पारंपरिक कार्यालयों या नियमित कार्यस्थलों के बजाय डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। इस व्यवस्था को गिग अर्थव्यवस्था कहा जाता है।
      • गिग अर्थव्यवस्था के अंतर्गत ऐसे श्रमिक आते हैं जो स्थायी रोजगार के बजाय निश्चित अवधि, कार्य या परियोजना के आधार पर सेवाएं प्रदान करते हैं। इसमें टैक्सी चालक, खाद्य वितरण कर्मचारी, ऑनलाइन सेवा प्रदाता और स्वतंत्र पेशेवर शामिल हैं। ओला, उबर, जोमैटो, अमेजन और अर्बन कंपनी जैसे प्लेटफॉर्म इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
      • नीति आयोग की वर्ष 2022 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में वर्ष 2020-21 के दौरान लगभग 77 लाख गिग एवं प्लेटफॉर्म श्रमिक थे। वर्ष 2029-30 तक इनकी संख्या बढ़कर 2.35 करोड़ हो सकती है। यह वृद्धि भारतीय अर्थव्यवस्था में गिग क्षेत्र के बढ़ते महत्त्व को दर्शाती है।
      • हालांकि, इन श्रमिकों की वास्तविक संख्या और उनकी कार्य परिस्थितियों का सटीक आकलन करना चुनौतीपूर्ण रहा है। इसका प्रमुख कारण यह है कि गिग कार्य अक्सर अनियमित होता है और कई लोग इसे अपनी मुख्य नौकरी के अतिरिक्त करते हैं। ऐसे में पारंपरिक सर्वेक्षणों में इनकी पहचान छूट सकती है।

आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (Periodic Labour Force Survey-PLFS)

PLFS में प्रस्तावित प्रमुख बदलाव:

      • मंत्रालय द्वारा प्रस्तावित बदलावों के अंतर्गत डिजिटल प्लेटफॉर्म श्रमिकों की पहचान के लिए एक अलग द्वितीय चरण स्तरीकरण (Second Stage Stratum-SSS) विकसित किया जाएगा। इसके लिए ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के परिवारों से पूछा जाएगा कि क्या पिछले 365 दिनों में परिवार का कोई सदस्य किसी डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से कार्य कर रहा था।
      • इसके अतिरिक्त, श्रमिकों से उनके द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं, एक से अधिक प्लेटफॉर्म पर काम करने, इस प्रकार के रोजगार को चुनने के कारणों तथा कार्य के दौरान आने वाली समस्याओं के बारे में जानकारी एकत्र की जाएगी।
      • इन समस्याओं में लंबे कार्य घंटे, अत्यधिक गर्मी और बारिश जैसी प्रतिकूल परिस्थितियां, अनिश्चित आय, दुर्घटनाओं से सुरक्षा का अभाव और सामाजिक सुरक्षा सुविधाओं की कमी शामिल हैं।
      • इस प्रकार, प्रस्तावित बदलाव केवल गिग श्रमिकों की संख्या का आकलन करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनके रोजगार की गुणवत्ता और कार्य परिस्थितियों को समझने में भी सहायता करेंगे।

अवैतनिक घरेलू कार्यों को आर्थिक पहचान देने की आवश्यकता:

      • प्रस्तावित सुधारों का दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष महिलाओं द्वारा किए जाने वाले अवैतनिक घरेलू एवं देखभाल संबंधी कार्यों को बेहतर ढंग से दर्ज करना है।
      • भारतीय समाज में खाना बनाना, सफाई करना, बच्चों की देखभाल, बुजुर्गों की सहायता और परिवार के अन्य सदस्यों की जरूरतों को पूरा करने जैसे कार्य मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा किए जाते हैं। इन कार्यों में पर्याप्त समय और श्रम लगता है, लेकिन इनके बदले प्रत्यक्ष आर्थिक भुगतान नहीं किया जाता। इसलिए पारंपरिक रोजगार सर्वेक्षणों में इन्हें अक्सर रोजगार के रूप में दर्ज नहीं किया जाता।
      • सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के वर्ष 2024 के समय उपयोग सर्वेक्षण (Time Use Survey) के अनुसार, छह वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं ने प्रतिदिन औसतन साढ़े चार घंटे से अधिक समय अवैतनिक घरेलू एवं देखभाल संबंधी सेवाओं में व्यतीत किया। इसके विपरीत, पुरुषों के लिए यह समय केवल 37 मिनट था। यह अंतर भारतीय समाज में घरेलू जिम्मेदारियों के असमान वितरण को दर्शाता है।
      • प्रस्तावित बदलावों के अंतर्गत 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के व्यक्तियों से स्वयं के उपभोग के लिए वस्तुओं के उत्पादन, अवैतनिक घरेलू कार्यों, देखभाल संबंधी गतिविधियों, स्वयंसेवी कार्यों और अवैतनिक प्रशिक्षण के संबंध में जानकारी एकत्र की जाएगी। इससे अर्थव्यवस्था में योगदान देने वाली उन गतिविधियों की पहचान संभव होगी जिन्हें अब तक पर्याप्त महत्त्व नहीं दिया गया है।

प्रस्तावित सुधारों का आर्थिक एवं सामाजिक महत्त्व: 

      • रोजगार के आंकड़ों की व्यापकता: गिग श्रमिकों और अवैतनिक गतिविधियों को बेहतर तरीके से दर्ज करने से श्रम बाजार की अधिक वास्तविक तस्वीर सामने आएगी। इससे रोजगार के पारंपरिक और नए स्वरूपों के बीच अंतर समझने में सहायता मिलेगी।
      • महिला सशक्तीकरण: घरेलू कार्यों में महिलाओं के योगदान का आकलन करने से लैंगिक असमानता, समय के असमान बंटवारे और महिलाओं की आर्थिक भागीदारी से जुड़ी समस्याओं को बेहतर ढंग से समझा जा सकेगा।
      • सामाजिक सुरक्षा का विस्तार: गिग श्रमिकों की संख्या, कार्य परिस्थितियों और समस्याओं से संबंधित विश्वसनीय आंकड़े उनके लिए बीमा, पेंशन, स्वास्थ्य सुविधाओं और अन्य सामाजिक सुरक्षा उपायों को प्रभावी बनाने में उपयोगी होंगे।
      • समावेशी विकास: ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में रोजगार के विविध स्वरूपों की पहचान से सरकार को क्षेत्र विशेष की आवश्यकताओं के अनुसार योजनाएं तैयार करने में सहायता मिलेगी।
      • नीतिगत निर्णयों में सुधार: विश्वसनीय श्रम आंकड़े कौशल विकास, रोजगार सृजन, महिला श्रम बल भागीदारी और श्रम सुधारों से संबंधित नीतियों को अधिक प्रभावी बना सकते हैं।

सुधारों के समक्ष प्रमुख चुनौतियां:

      • सबसे मुख्य चुनौती गिग श्रमिकों की सटीक पहचान है। कई श्रमिक एक साथ अनेक प्लेटफॉर्म पर कार्य करते हैं या इसे अपनी नियमित नौकरी के अतिरिक्त करते हैं। ऐसे में सर्वेक्षण के दौरान उनके कार्य का छूट जाना संभव है।
      • पिछले 365 दिनों में किए गए अनियमित कार्यों की जानकारी याद रखना प्रत्येक व्यक्ति के लिए आसान नहीं होगा। इससे सर्वेक्षण में त्रुटियां उत्पन्न हो सकती हैं।
      • अवैतनिक घरेलू कार्यों का आर्थिक मूल्यांकन भी एक चुनौती है। केवल यह जानना पर्याप्त नहीं है कि कोई व्यक्ति घरेलू कार्य करता है, बल्कि यह समझना भी आवश्यक है कि वह इन गतिविधियों में कितना समय व्यतीत करता है। इसके लिए समय उपयोग सर्वेक्षण और PLFS के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है।
      • सर्वेक्षण की पद्धति और रोजगार की श्रेणियों में बदलाव होने से पुराने तथा नए आंकड़ों के बीच सीधी तुलना कठिन हो सकती है। इसलिए तुलनात्मक आंकड़ों और संशोधित कार्यप्रणाली का स्पष्ट विवरण उपलब्ध कराना आवश्यक होगा।
      • इसके अतिरिक्त, गिग श्रमिकों की बदलती कार्य परिस्थितियों, प्लेटफॉर्म कंपनियों की जवाबदेही तथा श्रमिकों के सामाजिक सुरक्षा अधिकारों को भी नीति निर्माण में पर्याप्त स्थान देना होगा।

आगे की राह:

      • भारत को श्रम बाजार की बदलती वास्तविकताओं के अनुरूप रोजगार मापन की व्यवस्था को आधुनिक बनाना होगा। इसके लिए सबसे पहले PLFS में प्रस्तावित बदलावों को वैज्ञानिक और व्यावहारिक तरीके से लागू किया जाना चाहिए। सर्वेक्षण की प्रश्नावली को सरल बनाने के साथ-साथ सर्वेक्षणकर्ताओं को उचित प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।
      • डिजिटल प्लेटफॉर्म कंपनियों, श्रम मंत्रालय और सांख्यिकी मंत्रालय के बीच समन्वय बढ़ाना आवश्यक है, ताकि गिग श्रमिकों से संबंधित आंकड़ों की विश्वसनीयता सुनिश्चित हो सके। ई-श्रम पोर्टल जैसे मौजूदा तंत्रों के साथ आंकड़ों के बेहतर समन्वय से श्रमिकों तक सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ पहुंचाने में मदद मिल सकती है।
      • अवैतनिक घरेलू कार्यों के मूल्यांकन के लिए समय उपयोग सर्वेक्षण को नियमित अंतराल पर आयोजित किया जाना चाहिए। साथ ही, महिलाओं के घरेलू कार्यभार को कम करने के लिए सार्वजनिक बाल देखभाल केंद्र, वृद्ध देखभाल सेवाएं, स्वच्छ ईंधन और पेयजल जैसी सुविधाओं का विस्तार करना चाहिए।
      • रोजगार की गुणवत्ता को भी रोजगार की संख्या के समान महत्त्व दिया जाना चाहिए। गिग श्रमिकों के लिए न्यूनतम आय सुरक्षा, दुर्घटना बीमा, स्वास्थ्य सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा के प्रभावी प्रावधान सुनिश्चित करना आवश्यक है।

निष्कर्ष:

      • भारत में रोजगार की बदलती प्रकृति के अनुरूप श्रम संबंधी आंकड़ों का आधुनिकीकरण समय की आवश्यकता है। गिग अर्थव्यवस्था और अवैतनिक घरेलू कार्यों को बेहतर ढंग से दर्ज करने का प्रस्ताव केवल सांख्यिकीय सुधार नहीं, बल्कि आर्थिक एवं सामाजिक न्याय की दिशा में भी महत्त्वपूर्ण पहल है।
      • किसी भी अर्थव्यवस्था में वही योगदान प्रभावी नीतियों का आधार बन सकता है जिसे सही ढंग से पहचाना और मापा जाए। इसलिए भारत को ऐसी श्रम मापन व्यवस्था विकसित करनी होगी जो न केवल वेतन पाने वाले श्रमिकों, बल्कि डिजिटल अर्थव्यवस्था में कार्यरत लोगों और परिवार तथा समाज के कल्याण में योगदान देने वाले अवैतनिक श्रमिकों के श्रम को भी उचित पहचान दे। यही समावेशी, न्यायसंगत और संवेदनशील विकास की आधारशिला बन सकता है।

 

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