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Daily-current-affairs / 05 Jan 2026

भारत की गिग और प्लेटफॉर्म अर्थव्यवस्था: असुरक्षा से कानूनी मान्यता की ओर

भारत की गिग और प्लेटफॉर्म अर्थव्यवस्था: असुरक्षा से कानूनी मान्यता की ओर

संदर्भ:

भारत की तेज़ी से बढ़ती गिग और प्लेटफॉर्म कार्यबल देश की डिजिटल और शहरी आर्थिक प्रणाली का एक महत्वपूर्ण चालक बनकर उभरी है। युवा जनसंख्या, व्यापक डिजिटल अपनाव और तीव्र शहरीकरण से सशक्त यह गिग कार्य जिसमें डिलीवरी, राइड-हेलिंग और अन्य ऐप-आधारित सेवाएँ शामिल हैं, लाखों लोगों के लिए आसान रोजगार के अवसर लेकर आया है। हालांकि, डिजिटल अर्थव्यवस्था की वृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान देने के बावजूद, ये श्रमिक लंबे समय से अनिश्चितता, कम वेतन और न्यूनतम सामाजिक सुरक्षा की परिस्थितियों में काम करते रहे हैं। क्रिसमस डे और नववर्ष की पूर्व संध्या 2025–26 पर डिलीवरी कर्मियों द्वारा किए गए हालिया हड़तालें जिनमें असुरक्षित 10-मिनट डिलीवरी मॉडल पर प्रतिबंध, उचित वेतन और कानूनी मान्यता की मांग की गई इस बात को रेखांकित करती हैं कि प्लेटफॉर्म कंपनियों के हितों और उनके कार्यबल के अधिकारों व कल्याण के बीच संतुलन स्थापित करने की तत्काल आवश्यकता है।

      • हड़ताल के पीछे प्रमुख संघ ने केंद्रीय श्रम मंत्री मनसुख मांडविया को लिखे एक पत्र में, इंडियन फेडरेशन ऑफ ऐप-बेस्ड ट्रांसपोर्ट वर्कर्स (आईएफएटी) ने असुरक्षित 10 मिनट की डिलीवरी मॉडल पर प्रतिबंध, उचित और पारदर्शी वेतन, हाल ही में अधिसूचित श्रम संहिता के तहत कंपनियों का विनियमन और संगठित होने और सामूहिक सौदेबाजी करने के अपने अधिकार की मान्यता सहित कई अन्य मांगों को उठाया है।

गिग अर्थव्यवस्था और उभरती चुनौतियाँ:

      • स्विगी, ज़ोमैटो, ब्लिंकिट, ज़ेप्टो, ओला और उबर जैसे प्लेटफॉर्मों से भारत की गिग अर्थव्यवस्था हाल के वर्षों में तेज़ी से बढ़ी है। ये प्लेटफॉर्म लचीले कार्य विकल्प प्रदान करते हैं, जिससे आर्थिक समावेशन को बढ़ावा मिलता है और विशेष रूप से युवाओं के लिए आजीविका के अवसर सृजित होते हैं। इस कार्यबल ने देश के शहरों में सुविधा-आधारित सेवाओं की बढ़ती मांग को पूरा करने में प्लेटफॉर्मों को सक्षम बनाया है।
      • हालांकि, इस वृद्धि के साथ-साथ कुछ संरचनात्मक चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। श्रमिकों की आय अनिश्चित रहती है और वे प्रायः परिवर्तनीय प्रोत्साहनों पर निर्भर होते हैं, जबकि मूल वेतन बढ़ती जीवन-यापन लागत को पूरा करने के लिए अपर्याप्त होता है। कार्य का नियंत्रण काफी हद तक अपारदर्शी एल्गोरिद्म द्वारा किया जाता है, जो कार्य आवंटन, डिलीवरी समय-सीमा और प्रोत्साहन तय करते हैं। परिणामस्वरूप, श्रमिक न्यूनतम पारिश्रमिक में प्रतिदिन सैकड़ों किलोमीटर तक यात्रा करने को मजबूर होते हैं। ब्लिंकिट, स्विगी और ज़ेप्टो जैसे प्लेटफॉर्मों द्वारा लागू किया गया 10-मिनट डिलीवरी मॉडल इस दबाव को और बढ़ाता है, जिससे श्रमिकों को अत्यंत कम समय-सीमा में डिलीवरी पूरी करनी पड़ती है, जो अक्सर उनके स्वास्थ्य और सुरक्षा से समझौता कराता है।
      • इसके अतिरिक्त, ये श्रमिक सामान्यतः वैधानिक श्रम संरक्षण से बाहर रहते हैं। उन्हें स्वास्थ्य बीमा, दुर्घटना कवर, पेंशन योजनाओं या मातृत्व लाभों तक पहुंच नहीं मिलती, जो असंगठित या अनौपचारिक क्षेत्र में उनकी स्थिति को दर्शाता है। 25 दिसंबर और 31 दिसंबर जैसी अधिक मांग वाले दिनों पर हड़तालें इन चुनौतियों को और अधिक उजागर करती हैं। क्रिसमस डे 2025 को लगभग 40,000 डिलीवरी कर्मियों ने हड़ताल में भाग लिया, जिससे दिल्ली, कर्नाटक, हैदराबाद और मुंबई जैसे प्रमुख शहरों में 50–60% ऑर्डर या तो विलंबित हुए या विवादित रहे। कंपनियों ने वैकल्पिक लोगों की तैनाती, अतिरिक्त प्रोत्साहनों की पेशकश और निष्क्रिय आईडी को पुनः सक्रिय कर परिचालन बनाए रखने का प्रयास किया। ये घटनाएँ प्लेटफॉर्म कंपनियों और श्रमिकों के बीच बढ़ते तनाव को दर्शाती हैं और अस्थिर रोजगार पर आधारित गिग अर्थव्यवस्था की सीमाओं को उजागर करती हैं।

India’s Gig and Platform Economy

सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के माध्यम से कानूनी मान्यता:

      • गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों की महत्वपूर्ण भूमिका को स्वीकार करते हुए, सामाजिक सुरक्षा संहिता (SS), 2020, भारत की हालिया श्रम सुधारों के तहत लागू चार प्रमुख श्रम संहिताओं में से एक, इन श्रमिकों को पहली बार कानूनी संरक्षण और सामाजिक सुरक्षा के दायरे में औपचारिक रूप से लाती है। इस सुधार से पहले, गिग श्रमिकों को अनौपचारिक या असंगठित क्षेत्र का हिस्सा माना जाता था और वे वेतन भुगतान अधिनियम (1936), न्यूनतम मजदूरी अधिनियम (1948), कर्मचारी भविष्य निधि अधिनियम और कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम जैसे पारंपरिक श्रम कानूनों के दायरे से बाहर थे।
      • सामाजिक सुरक्षा संहिता औपचारिक कानूनी मान्यता प्रदान करता है और प्रमुख शब्दों को परिभाषित करता है:
        • एग्रीगेटर: एक डिजिटल मध्यस्थ जो खरीदारों और सेवा प्रदाताओं को जोड़ता है।
        • गिग श्रमिक : पारंपरिक नियोक्ता-कर्मचारी संबंध से बाहर पारिश्रमिक के लिए कार्य करने वाला व्यक्ति।
        • प्लेटफॉर्म श्रमिक : गैर-पारंपरिक रोजगार व्यवस्था के तहत ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से कार्य करने वाला व्यक्ति।
        • प्लेटफॉर्म कार्य : भुगतान के बदले विशिष्ट समस्याओं के समाधान या सेवाएँ प्रदान करने हेतु ऑनलाइन प्लेटफॉर्म द्वारा सुगम की गई कार्य व्यवस्था।
      • यह मान्यता एक लंबे समय से मौजूद अंतर को भरती है, जिससे गिग श्रमिक वैधानिक अधिकारों और लाभों का दावा कर सकते हैं तथा पहले से अनुपस्थित संरक्षणों का संस्थानीकरण होता है। कानूनी मान्यता यह भी सुनिश्चित करती है कि इन श्रमिकों को राष्ट्रीय श्रम आँकड़ों में शामिल किया जाए, जिससे बेहतर नीति निर्माण और कल्याण वितरण संभव हो सके।

सामाजिक सुरक्षा, कल्याण और सुगमता का लाभ:

      • यह संहिता गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा लाभों को कई तंत्रों के माध्यम से संस्थागत बनाती है। एक समर्पित सामाजिक सुरक्षा कोष की स्थापना की गई है, जिसके तहत अमेज़न, फ्लिपकार्ट, स्विगी और ज़ोमैटो जैसे एग्रीगेटरों को अपने वार्षिक टर्नओवर का 1–2% योगदान देना होगा, जो श्रमिकों का देय भुगतानों के 5% तक सीमित होगा। यह कोष स्वास्थ्य, दुर्घटना, मातृत्व लाभ और पेंशन को शामिल करने वाली कल्याणकारी योजनाओं का वित्तपोषण करता है, जिससे जिम्मेदारी व्यक्तिगत श्रमिकों से हटकर एक संरचित, वैधानिक ढांचे में स्थानांतरित होती है।
      • सबसे महत्वपूर्ण सुधारों में से एक लाभों की पोर्टेबिलिटी है। ई-श्रम पोर्टल पर पंजीकृत श्रमिकों को एक विशिष्ट आधार-लिंक्ड आईडी मिलती है, जिससे वे प्लेटफॉर्म या नौकरियाँ बदलने पर भी लाभों की निरंतरता बनाए रख सकते हैं। पहले, नौकरी बदलने पर श्रमिक अपने अधिकार खो देते थे, जिससे असुरक्षा और निरंतरता की कमी होती थी। अब, चाहे कोई श्रमिक कई प्लेटफॉर्मों पर काम करे या रोजगार बदले, उसके लाभ सुरक्षित रहते हैं, जिससे अन्यथा अस्थिर रोजगार क्षेत्र में स्थिरता आती है।
      • ई-श्रम के माध्यम से निर्मित राष्ट्रीय डेटाबेस लक्षित कल्याण वितरण को सक्षम बनाता है, कौशल विकास का समर्थन करता है और नीति-निर्माण में सहायता करता है। इसके अतिरिक्त, सामाजिक सुरक्षा संहिता (एस एस कोड) शिकायत निवारण तंत्र, जैसे- टोल-फ्री हेल्पलाइन या सुविधा केंद्र का प्रावधान करता है, जो वेतन शोषण, असुरक्षित कार्य परिस्थितियों या लाभों से वंचित किए जाने जैसी शिकायतों का समाधान करता है। ये उपाय एक अनियंत्रित गिग अर्थव्यवस्था से एक अधिक संरचित और श्रमिक-केंद्रित व्यवस्था की ओर बदलाव को दर्शाते हैं।

अनौपचारिक से संरक्षण की ओर गिग अर्थव्यवस्था का रूपांतरण:

      • सामाजिक सुरक्षा संहिता (एस एस कोड) के अंतर्गत सुधारात्मक उपाय भारत की गिग अर्थव्यवस्था में एक बदलाव का संकेत देते हैं। जो गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिक कभी लगभग अदृश्य और असुरक्षित थे, अब उन्हें कानूनी मान्यता, सामाजिक सुरक्षा लाभ और कल्याणकारी योजनाओं तक पहुंच मिल रही है जो औपचारिकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। पोर्टेबल लाभ, समर्पित कल्याण कोष और राष्ट्रीय पंजीकरण ढांचे के माध्यम से यह संहिता सुनिश्चित करती है कि ये श्रमिक अब केवल प्लेटफॉर्म एल्गोरिद्म या कॉर्पोरेट विवेक पर निर्भर न रहें।
      • हालांकि, केवल कानूनी मान्यता पर्याप्त नहीं है। नए साल की पूर्व संध्या 2025–26 की हड़तालें श्रम प्रावधानों के प्रभावी प्रवर्तन, असुरक्षित डिलीवरी मॉडलों के नियमन और एल्गोरिद्मिक प्रबंधन की निगरानी की तत्काल आवश्यकता को उजागर करती हैं। प्लेटफॉर्म कंपनियों को पारदर्शी और न्यायसंगत वेतन निर्धारण अपनाना चाहिए, श्रमिकों के संगठन के अधिकारों का सम्मान करना चाहिए और सुरक्षा व कल्याण को परिचालन ढाँचों में अंतर्निहित करना चाहिए। साथ ही, नीति-निर्माताओं को सामाजिक सुरक्षा उपायों के प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित करना, एग्रीगेटरों के अनुपालन की निगरानी करना और नए प्रकार के प्लेटफॉर्म कार्य को शामिल करने हेतु कवरेज का विस्तार करना चाहिए।
      • गिग अर्थव्यवस्था भारत के शहरीकृत और डिजिटल परिदृश्य में कार्य के भविष्य का प्रतिनिधित्व करती है। इस क्षेत्र का निष्पक्ष, सुरक्षित और समावेशी रूप से विकसित होना न केवल श्रमिक कल्याण के लिए बल्कि आर्थिक वृद्धि, शहरी सेवाओं और उपभोक्ता विश्वास को बनाए रखने के लिए भी अत्यंत आवश्यक है। सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020, कानूनी आधार प्रदान करती है; अब प्रभावी प्रवर्तन, कॉर्पोरेट जिम्मेदारी और श्रमिक सशक्तिकरण यह तय करेंगे कि भारत एक लचीली, औपचारिक और न्यायसंगत गिग पारिस्थितिकी तंत्र किस हद तक प्राप्त कर पाता है।

निष्कर्ष:

भारत की गिग और प्लेटफॉर्म कार्यबल देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था का एक अभिन्न अंग है, जो जल्दी रोजगार प्रदान करता है और आर्थिक गतिविधियों को गति देता है। फिर भी, लंबे समय से चली आ रहीचुनौतियाँ, जैसे- कम वेतन, असुरक्षित कार्य परिस्थितियाँ और सामाजिक सुरक्षा का अभाव लाखों श्रमिकों को असुरक्षित छोड़ती रही हैं। सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020, जिसमें कानूनी मान्यता, सामाजिक सुरक्षा लाभ, कल्याण कोष, पोर्टेबल अधिकार और शिकायत निवारण के प्रावधान शामिल हैं, इस क्षेत्र के रूपांतरण की दिशा में एक ऐतिहासिक सुधार है। हाल में हुई हड़तालें इस बात को रेखांकित करती हैं कि कानूनी प्रावधानों को व्यवहार में उतारना, असुरक्षित कार्य मॉडलों का नियमन करना और उचित पारिश्रमिक सुनिश्चित करना कितना आवश्यक है। भारत के लिए चुनौती यह है कि प्लेटफॉर्म-आधारित कार्य को श्रमिकों के अधिकारों, संरक्षण और गरिमा के साथ संतुलित किया जाए। गिग अर्थव्यवस्था का औपचारिकीकरण और उसके कार्यबल का संरक्षण करके, भारत न केवल लाखों लोगों की आजीविका सुरक्षित कर सकता है, बल्कि एक भविष्य-तैयार, समावेशी और सुदृढ़ आर्थिक पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण भी कर सकता है।

 

UPSC/PCS मुख्य प्रश्न: भारत की गिग और प्लेटफॉर्म अर्थव्यवस्था ने रोजगार के नए अवसर सृजित किए हैं, लेकिन इससे जुड़े श्रमिकों के समक्ष गंभीर चुनौतियाँ भी उभरी हैं। इस कथन के आलोक में, गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स की समस्याओं के समाधान में सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 की भूमिका का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।