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Daily-current-affairs / 15 May 2026

भारत का जल भविष्य: चुनौतियाँ, शासन और स्थिरता

भारत का जल भविष्य: चुनौतियाँ, शासन और स्थिरता

भारत का जल भविष्य: चुनौतियाँ, शासन और स्थिरता

संदर्भ:

भारत आज विश्व की लगभग 18% आबादी का पोषण करता है, जबकि उसके पास वैश्विक मीठे जल संसाधनों का केवल लगभग 4% हिस्सा है। बढ़ती जनसंख्या, अनियोजित शहरीकरण, जलवायु परिवर्तन, भूजल के अत्यधिक दोहन तथा प्रदूषण ने देश को जल संकट के एक गंभीर मोड़ पर ला खड़ा किया है। यह संकट केवल जल की कमीका नहीं, बल्कि जल प्रबंधन और शासनका भी संकट है। इसलिए आज आवश्यकता केवल नए बांधों और नहरों के निर्माण की नहीं, बल्कि जल संसाधनों के वैज्ञानिक, सहभागी और सतत प्रबंधन की है।

भारत में जल संकट की वास्तविकता

भारत विश्व का सबसे बड़ा भूजल उपयोगकर्ता देश है। देश में कृषि, उद्योग और घरेलू उपयोग का बड़ा हिस्सा भूजल पर निर्भर है। हरित क्रांति के बाद पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रों में ट्यूबवेल आधारित सिंचाई ने कृषि उत्पादन बढ़ाया, लेकिन इससे भूजल स्तर में तीव्र गिरावट आई।

नीति आयोग कीसमग्र जल प्रबंधन सूचकांक (Composite Water Management Index) रिपोर्ट के अनुसार भारत के कई बड़े शहर भविष्य में डे जीरोजैसी स्थिति का सामना कर सकते हैं, जहां नलों में पानी ही समाप्त हो जाएगा।

इसके अतिरिक्त-

    • लगभग 70% सतही जल किसी न किसी रूप में प्रदूषित है।
    • देश की अनेक नदियाँ औद्योगिक अपशिष्ट और सीवेज से प्रभावित हैं।
    • जलवायु परिवर्तन के कारण अनियमित मानसून, सूखा और बाढ़ की घटनाएँ बढ़ रही हैं।
    • प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता लगातार घट रही है, जो जल तनाव (Water Stress) की स्थिति को दर्शाती है।

स्पष्ट है कि भारत का जल संकट बहुआयामी और संरचनात्मक है।

जल शासन (Water Governance):

      • जल शासन केवल जल वितरण का प्रशासनिक ढाँचा नहीं है। इसमें नीति निर्माण, संस्थागत समन्वय, सामुदायिक भागीदारी, जल संरक्षण, जल गुणवत्ता, न्यायसंगत वितरण और पर्यावरणीय संतुलन जैसे पहलू शामिल होते हैं।
      • भारत में जल संविधान की राज्य सूची का विषय है, लेकिन अंतर्राज्यीय नदियों, बांधों और राष्ट्रीय जल नीति में केंद्र की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। यही कारण है कि जल प्रबंधन में अक्सर अधिकारों का टकराव और समन्वय की कमी दिखाई देती है।
      • कावेरी, कृष्णा और सतलुज-यमुना लिंक (SYL) जैसे नदी विवाद यह दर्शाते हैं कि जल केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि राजनीतिक और संघीय चुनौती भी बन चुका है।

India’s Water Future: Challenges, Governance and Sustainability

पारंपरिक मॉडल की सीमाएँ:

स्वतंत्रता के बाद भारत ने बड़े बांधों, नहरों और केंद्रीकृत जल परियोजनाओं पर आधारित मॉडल अपनाया। इसे विकास और खाद्य सुरक्षा का आधार माना गया। भाखड़ा-नंगल, हीराकुंड और सरदार सरोवर जैसी परियोजनाओं ने कृषि और बिजली उत्पादन में योगदान दिया।

किन्तु समय के साथ इस मॉडल से कई चुनौतियाँ आई-

    • बड़े बांधों से विस्थापन और पर्यावरणीय क्षति बढ़ी।
    • जल वितरण में क्षेत्रीय असमानता उत्पन्न हुई।
    • भूजल प्रबंधन की उपेक्षा हुई।
    • जल संरक्षण की पारंपरिक प्रणालियाँ कमजोर पड़ीं।

अब वर्तमान में यह समझ विकसित हो रही है कि केवल इंजीनियरिंग आधारित समाधान पर्याप्त नहीं हैं। जल संकट का समाधान सामाजिक, आर्थिक और पारिस्थितिक दृष्टिकोणों के समन्वय में निहित है।

भारत में जल शासन के लिए नई पहल:

1. जल शक्ति मंत्रालय का गठन-

2019 में केंद्र सरकार ने विभिन्न जल संबंधी विभागों को मिलाकर जल शक्ति मंत्रालय का गठन किया। इसका उद्देश्य जल प्रबंधन में समन्वय और एकीकृत दृष्टिकोण विकसित करना था।

2. जल जीवन मिशन

इस मिशन का उद्देश्य प्रत्येक ग्रामीण परिवार को नल से जल उपलब्ध कराना है। इससे पेयजल पहुंच में सुधार हुआ है तथा महिलाओं के श्रम भार में कमी आई है।

3. अटल भूजल योजना

यह योजना सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से भूजल संरक्षण और जल बजटिंग को बढ़ावा देती है। इसमें स्थानीय स्तर पर जल उपयोग के प्रति जागरूकता बढ़ाने का प्रयास किया गया है।

4. कैच द रेन अभियान

वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देने के लिए यह अभियान चलाया गया, जिसका उद्देश्य जहाँ भी बारिश हो, जब भी बारिश होके सिद्धांत पर जल संग्रहण करना है।

5. डिजिटल जल डेटा और तकनीकी हस्तक्षेप

रिमोट सेंसिंग, GIS आधारित जल मानचित्रण और स्मार्ट मीटरिंग जैसी तकनीकों का उपयोग जल प्रबंधन को अधिक वैज्ञानिक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

जल शासन में प्रमुख चुनौतियाँ:

कृषि क्षेत्र में अत्यधिक जल उपयोग:

भारत में लगभग 80% मीठे जल का उपयोग कृषि में होता है। धान और गन्ने जैसी जल-गहन फसलें उन क्षेत्रों में उगाई जा रही हैं जहाँ जल संकट पहले से मौजूद है। मुफ्त बिजली और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) जैसी नीतियाँ भी भूजल दोहन को बढ़ावा देती हैं।

शहरी जल संकट:

तेजी से बढ़ते शहरों में जल आपूर्ति और सीवेज प्रबंधन की स्थिति कमजोर है। कई शहर भूजल पर अत्यधिक निर्भर हैं, जिससे जल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है।

जल प्रदूषण:

औद्योगिक अपशिष्ट, कृषि रसायन और अनुपचारित सीवेज नदियों और झीलों को प्रदूषित कर रहे हैं। इससे पेयजल गुणवत्ता और सार्वजनिक स्वास्थ्य दोनों प्रभावित हो रहे हैं।

संस्थागत विखंडन:

जल प्रबंधन से जुड़े अनेक विभाग अलग-अलग कार्य करते हैं, जिससे नीति निर्माण और क्रियान्वयन में समन्वय की कमी बनी रहती है।

जलवायु परिवर्तन:

अनियमित वर्षा, ग्लेशियरों का पिघलना और चरम मौसमी घटनाएँ भविष्य में जल उपलब्धता को और अधिक अनिश्चित बना सकती हैं।

आगे की राह:

भारत को जल संकट से निपटने के लिए सप्लाई आधारितदृष्टिकोण से आगे बढ़कर डिमांड मैनेजमेंटआधारित नीति अपनानी होगी।

1. एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन (IWRM)

नदियों, भूजल, वर्षा जल और पारिस्थितिकी को एक समग्र इकाई के रूप में देखकर नीति बनानी होगी।

2. फसल विविधीकरण

धान और गन्ने जैसी जल-गहन फसलों के स्थान पर कम जल उपयोग वाली फसलों को बढ़ावा देना आवश्यक है।

3. सामुदायिक भागीदारी

राजस्थान के जोहड़, महाराष्ट्र के पानी पंचायत और दक्षिण भारत की पारंपरिक टैंक प्रणाली यह दर्शाती हैं कि स्थानीय समुदाय जल संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

4. जल का पुनर्चक्रण और पुनः उपयोग

शहरी क्षेत्रों में अपशिष्ट जल के उपचार और पुनः उपयोग को बढ़ावा देना होगा।

5. जल को सार्वजनिक ट्रस्टके रूप में देखना

जल को केवल आर्थिक वस्तु नहीं, बल्कि साझा प्राकृतिक संपदा और मानव अधिकार के रूप में स्वीकार करना आवश्यक है।

निष्कर्ष:

भारत का भविष्य उसके जल संसाधनों के सतत प्रबंधन पर निर्भर करेगा। जल संकट केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि आर्थिक विकास, खाद्य सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक स्थिरता से जुड़ा राष्ट्रीय मुद्दा है।

यदि भारत को विकसित भारतके लक्ष्य की ओर बढ़ना है, तो उसे जल शासन में संरचनात्मक सुधार, वैज्ञानिक नीति निर्माण और सामुदायिक भागीदारी को प्राथमिकता देनी होगी।

आज आवश्यकता इस बात की है कि जल को असीमित संसाधन नहीं, बल्कि सीमित और साझा प्राकृतिक धरोहर के रूप में देखा जाए क्योंकि आने वाले समय में जल सुरक्षाही वास्तविक राष्ट्रीय सुरक्षा का आधार बनने वाली है।

मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न:

भारत में जल संकट केवल संसाधनों की कमी का नहीं, बल्कि जल शासन (Water Governance) की संरचनात्मक कमजोरियों का भी परिणाम है। भारत की जल शासन प्रणाली की प्रमुख चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए तथा सतत जल प्रबंधन हेतु आवश्यक सुधारों पर चर्चा कीजिए।

 

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