संदर्भ:
हाल ही में केंद्र सरकार ने भारत सेमीकंडक्टर मिशन (India Semiconductor Mission-ISM) के अंतर्गत दो नई सेमीकंडक्टर परियोजनाओं को मंजूरी दी है। इनमें गुजरात के धोलेरा में देश की पहली गैलियम नाइट्राइड (GaN) आधारित सेमीकंडक्टर एवं माइक्रो-एलईडी निर्माण इकाई तथा सूरत में एक नई सेमीकंडक्टर पैकेजिंग एवं परीक्षण सुविधा शामिल है। इन स्वीकृतियों के साथ भारत में सेमीकंडक्टर मिशन के अंतर्गत स्वीकृत परियोजनाओं की संख्या 12 तक पहुँच गई है। टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और डच कंपनी ASML के बीच भारत की पहली चिप फैब्रिकेशन इकाई के लिए तकनीकी सहयोग समझौता भी हुआ है। ये सभी घटनाक्रम दर्शाते हैं कि भारत अब केवल इलेक्ट्रॉनिक्स का उपभोक्ता बाजार नहीं रहना चाहता, बल्कि वैश्विक सेमीकंडक्टर मूल्य श्रृंखला में एक महत्वपूर्ण निर्माता और नवाचार केंद्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
नीति आयोग के 2035 रोडमैप :
हाल ही में जारी 10-वर्षीय रोडमैप भारत के सेमीकंडक्टर क्षेत्र के लिए एक दीर्घकालिक दृष्टि प्रस्तुत करता है। इसका लक्ष्य वर्ष 2035 तक 120–150 अरब डॉलर का सेमीकंडक्टर मूल्य श्रृंखला पारितंत्र विकसित करना है।
यह रोडमैप पाँच प्रमुख स्तंभों पर आधारित है-
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- उन्नत अनुसंधान एवं विकास तथा डिजाइन बौद्धिक संपदा (IP)
- दीर्घकालिक निवेश और वित्तीय समर्थन
- उन्नत पैकेजिंग एवं कंपाउंड सेमीकंडक्टर विनिर्माण
- कुशल मानव संसाधन और प्रतिभा विकास
- विश्वसनीय वैश्विक साझेदारी और आपूर्ति श्रृंखला सहयोग
- उन्नत अनुसंधान एवं विकास तथा डिजाइन बौद्धिक संपदा (IP)
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विशेष रूप से यह दस्तावेज भारत को उन्नत पैकेजिंग, आउटसोर्स्ड सेमीकंडक्टर असेंबली एवं परीक्षण (OSAT), वाइड-बैंडगैप सेमीकंडक्टर और डिजाइन नवाचार के वैश्विक केंद्र के रूप में विकसित करने पर बल देता है। यह दृष्टिकोण यथार्थवादी भी है क्योंकि वर्तमान वैश्विक बाजार में भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका विशाल डिजाइन प्रतिभा आधार है।
सेमीकंडक्टर की महत्ता:
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- सेमीकंडक्टर (अर्धचालक) मुख्य रूप से सिलिकॉन से बने होते हैं। सामान्य स्थिति में ये विद्युत् नहीं गुजारते, लेकिन अशुद्धियां मिलाने पर ये सुचालक बन जाते हैं। इसी गुण के कारण इनका उपयोग इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में करंट के प्रवाह को नियंत्रित करने (स्विचिंग और एम्प्लीफिकेशन) के लिए किया जाता है।
- स्मार्टफोन, लैपटॉप, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लाउड कंप्यूटिंग, 5जी नेटवर्क, इलेक्ट्रिक वाहन, ड्रोन, उपग्रह, रक्षा प्रणालियाँ और सुपरकंप्यूटर, इन सभी के केंद्र में सेमीकंडक्टर चिप्स हैं। इन्हें आधुनिक अर्थव्यवस्था का “नया तेल” भी कहा जाता है।
- कोविड-19 महामारी के दौरान वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में आई बाधाओं और उसके बाद उत्पन्न चिप संकट ने दुनिया को यह एहसास कराया कि सेमीकंडक्टर केवल औद्योगिक उत्पाद नहीं बल्कि रणनीतिक संपत्ति हैं। अमेरिका-चीन तकनीकी प्रतिस्पर्धा और ताइवान जलडमरूमध्य से जुड़े भू-राजनीतिक तनावों ने भी चिप निर्माण को राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे में बदल दिया है। यही कारण है कि आज लगभग सभी प्रमुख अर्थव्यवस्थाएँ अपनी घरेलू सेमीकंडक्टर क्षमता विकसित करने का प्रयास कर रही हैं।
- सेमीकंडक्टर (अर्धचालक) मुख्य रूप से सिलिकॉन से बने होते हैं। सामान्य स्थिति में ये विद्युत् नहीं गुजारते, लेकिन अशुद्धियां मिलाने पर ये सुचालक बन जाते हैं। इसी गुण के कारण इनका उपयोग इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में करंट के प्रवाह को नियंत्रित करने (स्विचिंग और एम्प्लीफिकेशन) के लिए किया जाता है।
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भारत सेमीकंडक्टर मिशन : एक व्यापक दृष्टि
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- भारत सरकार ने वर्ष 2021 में ₹76,000 करोड़ के परिव्यय के साथ भारत सेमीकंडक्टर मिशन की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य केवल चिप निर्माण संयंत्र स्थापित करना नहीं, बल्कि डिजाइन, निर्माण, परीक्षण, पैकेजिंग, डिस्प्ले निर्माण और अनुसंधान को शामिल करते हुए एक संपूर्ण सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना है।
- मिशन के अंतर्गत सरकार सेमीकंडक्टर फैब, डिस्प्ले फैब, कंपाउंड सेमीकंडक्टर, पैकेजिंग एवं परीक्षण इकाइयों तथा डिजाइन कंपनियों को वित्तीय सहायता प्रदान कर रही है। वर्तमान में गुजरात, असम, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, पंजाब और आंध्र प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों में कई परियोजनाएँ स्वीकृत की जा चुकी हैं। टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स, माइक्रोन, सीजी पावर, फॉक्सकॉन, एचसीएल और अन्य घरेलू एवं वैश्विक कंपनियाँ इस मिशन का हिस्सा हैं।
- भारत सरकार ने वर्ष 2021 में ₹76,000 करोड़ के परिव्यय के साथ भारत सेमीकंडक्टर मिशन की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य केवल चिप निर्माण संयंत्र स्थापित करना नहीं, बल्कि डिजाइन, निर्माण, परीक्षण, पैकेजिंग, डिस्प्ले निर्माण और अनुसंधान को शामिल करते हुए एक संपूर्ण सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना है।
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भारत सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) 2.0 :
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- भारत सरकार ने हाल ही में बजट 2026 में भारत सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 की घोषणा की है। इसका उद्देश्य केवल विनिर्माण इकाइयों तक सीमित नहीं है बल्कि सेमीकंडक्टर उपकरण, विशेष रसायन, कच्चे माल, अनुसंधान, बौद्धिक संपदा, डिजाइन नवाचार और कौशल विकास को भी प्रोत्साहित किया जाएगा।
- यदि भारत चिप डिजाइन में अपनी मौजूदा ताकत को विनिर्माण क्षमता के साथ जोड़ने में सफल हो जाता है, तो वह वैश्विक सेमीकंडक्टर मूल्य श्रृंखला में एक प्रमुख शक्ति बन सकता है।
- भारत सरकार ने हाल ही में बजट 2026 में भारत सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 की घोषणा की है। इसका उद्देश्य केवल विनिर्माण इकाइयों तक सीमित नहीं है बल्कि सेमीकंडक्टर उपकरण, विशेष रसायन, कच्चे माल, अनुसंधान, बौद्धिक संपदा, डिजाइन नवाचार और कौशल विकास को भी प्रोत्साहित किया जाएगा।
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धोलेरा : भारत का उभरता ‘सिलिकॉन वैली ऑफ चिप्स’:
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- गुजरात का धोलेरा विशेष निवेश क्षेत्र (Dholera Special Investment Region) भारत के सेमीकंडक्टर मिशन का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभर रहा है। यहीं पर टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और ताइवान की पावरचिप सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कॉरपोरेशन (PSMC) के सहयोग से भारत की पहली व्यावसायिक सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन इकाई स्थापित की जा रही है।
- लगभग ₹91,000 करोड़ के निवेश वाली यह परियोजना 28 नैनोमीटर से लेकर 110 नैनोमीटर तक की चिप्स का उत्पादन करेगी, जिनका उपयोग ऑटोमोबाइल, दूरसंचार, उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स, कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा रक्षा क्षेत्र में किया जाएगा। इसके अतिरिक्त हाल ही में स्वीकृत गैलियम नाइट्राइड (GaN) आधारित संयंत्र भी धोलेरा में स्थापित होगा, जिससे यह क्षेत्र भारत के सेमीकंडक्टर विनिर्माण का प्रमुख केंद्र बन जाएगा।
- गुजरात का धोलेरा विशेष निवेश क्षेत्र (Dholera Special Investment Region) भारत के सेमीकंडक्टर मिशन का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभर रहा है। यहीं पर टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और ताइवान की पावरचिप सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कॉरपोरेशन (PSMC) के सहयोग से भारत की पहली व्यावसायिक सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन इकाई स्थापित की जा रही है।
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ईयूवी लिथोग्राफी (EUV Lithography): चिप उद्योग की सबसे उन्नत तकनीक
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- सेमीकंडक्टर निर्माण में सबसे जटिल और महत्वपूर्ण प्रक्रिया लिथोग्राफी होती है। इसी प्रक्रिया के माध्यम से सिलिकॉन वेफर पर अरबों ट्रांजिस्टरों के सूक्ष्म पैटर्न अंकित किए जाते हैं।
- वर्तमान समय में अत्याधुनिक चिप्स के निर्माण के लिए एक्स्ट्रीम अल्ट्रावायलेट (Extreme Ultraviolet-EUV) लिथोग्राफी तकनीक का उपयोग किया जाता है। यह 13.5 नैनोमीटर तरंगदैर्घ्य वाली प्रकाश किरणों के माध्यम से अत्यंत छोटे आकार की चिप्स बनाने में सक्षम है। 5 नैनोमीटर, 3 नैनोमीटर और भविष्य की 2 नैनोमीटर तकनीक वाली चिप्स के निर्माण में EUV तकनीक की केंद्रीय भूमिका है।
- इस क्षेत्र में डच कंपनी ASML का लगभग एकाधिकार है। विश्व की सबसे उन्नत EUV मशीनें केवल यही कंपनी बनाती है। भारत की पहली चिप फैब के लिए ASML और टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स के बीच सहयोग समझौता इस दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत को वैश्विक सेमीकंडक्टर प्रौद्योगिकी के उच्चतम स्तर तक पहुँचाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
- सेमीकंडक्टर निर्माण में सबसे जटिल और महत्वपूर्ण प्रक्रिया लिथोग्राफी होती है। इसी प्रक्रिया के माध्यम से सिलिकॉन वेफर पर अरबों ट्रांजिस्टरों के सूक्ष्म पैटर्न अंकित किए जाते हैं।
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कंपाउंड सेमीकंडक्टर: गैलियम नाइट्राइड (GaN):
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- पारंपरिक चिप निर्माण मुख्यतः सिलिकॉन पर आधारित रहा है, लेकिन नई पीढ़ी की तकनीकों के लिए कंपाउंड सेमीकंडक्टर्स का महत्व तेजी से बढ़ रहा है। गैलियम नाइट्राइड (GaN) ऐसा ही एक उन्नत पदार्थ है जो उच्च तापमान, उच्च वोल्टेज और उच्च आवृत्ति पर सिलिकॉन की तुलना में बेहतर प्रदर्शन करता है।
- GaN आधारित उपकरणों का उपयोग 5जी और भविष्य की 6जी संचार प्रणालियों, रडार, रक्षा उपकरणों, उपग्रह संचार, इलेक्ट्रिक वाहनों और उच्च दक्षता वाले फास्ट चार्जर्स में किया जाता है। यही कारण है कि भारत का पहला GaN फैब केवल औद्योगिक परियोजना नहीं बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- पारंपरिक चिप निर्माण मुख्यतः सिलिकॉन पर आधारित रहा है, लेकिन नई पीढ़ी की तकनीकों के लिए कंपाउंड सेमीकंडक्टर्स का महत्व तेजी से बढ़ रहा है। गैलियम नाइट्राइड (GaN) ऐसा ही एक उन्नत पदार्थ है जो उच्च तापमान, उच्च वोल्टेज और उच्च आवृत्ति पर सिलिकॉन की तुलना में बेहतर प्रदर्शन करता है।
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Micro-LED और डिस्प्ले प्रौद्योगिकी में अवसर:
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- हाल ही में स्वीकृत परियोजनाओं का एक महत्वपूर्ण पहलू माइक्रो-एलईडी डिस्प्ले निर्माण है। जिसे अगली पीढ़ी की डिस्प्ले तकनीक माना जा रहा है।
- यह तकनीक अधिक चमक, कम ऊर्जा खपत, लंबी और बेहतर दृश्य गुणवत्ता प्रदान करती है। भविष्य में संवर्धित वास्तविकता (AR), आभासी वास्तविकता (VR), स्मार्टवॉच, स्मार्ट ग्लास और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में इसका व्यापक उपयोग होने की संभावना है।
- हाल ही में स्वीकृत परियोजनाओं का एक महत्वपूर्ण पहलू माइक्रो-एलईडी डिस्प्ले निर्माण है। जिसे अगली पीढ़ी की डिस्प्ले तकनीक माना जा रहा है।
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भारत के सामने प्रमुख चुनौतियाँ:
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- सबसे बड़ी चुनौती अत्यधिक पूंजी निवेश की है। एक आधुनिक सेमीकंडक्टर फैब स्थापित करने में अरबों डॉलर का निवेश आवश्यक होता है। इसके अतिरिक्त सेमीकंडक्टर उद्योग को विशाल मात्रा में शुद्ध जल, निरंतर विद्युत आपूर्ति और अत्यधिक कुशल मानव संसाधन की आवश्यकता होती है।
- तकनीकी दृष्टि से भी भारत अभी शुरुआती चरण में है। ताइवान, दक्षिण कोरिया और अमेरिका ने दशकों के निवेश और अनुसंधान के बाद अपनी वर्तमान स्थिति प्राप्त की है।
भारत को डिजाइन, सामग्री विज्ञान, उपकरण निर्माण, अनुसंधान एवं विकास तथा आपूर्ति श्रृंखला के क्षेत्रों में भी समानांतर रूप से क्षमता निर्माण करना होगा।
- सबसे बड़ी चुनौती अत्यधिक पूंजी निवेश की है। एक आधुनिक सेमीकंडक्टर फैब स्थापित करने में अरबों डॉलर का निवेश आवश्यक होता है। इसके अतिरिक्त सेमीकंडक्टर उद्योग को विशाल मात्रा में शुद्ध जल, निरंतर विद्युत आपूर्ति और अत्यधिक कुशल मानव संसाधन की आवश्यकता होती है।
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निष्कर्ष:
भारत का सेमीकंडक्टर मिशन केवल औद्योगिक विकास कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह तकनीकी आत्मनिर्भरता, राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक प्रतिस्पर्धात्मकता और वैश्विक रणनीतिक प्रभाव से जुड़ा हुआ एक व्यापक राष्ट्रीय मिशन है। नीति आयोग का 2035 रोडमैप, भारत सेमीकंडक्टर मिशन की प्रगति, धोलेरा में स्थापित हो रही पहली फैब, GaN और SiC जैसी उन्नत तकनीकों में निवेश तथा वैश्विक कंपनियों के साथ बढ़ती साझेदारियाँ इस बात का संकेत हैं कि भारत सेमीकंडक्टर क्षेत्र में दीर्घकालिक नेतृत्व की तैयारी कर रहा है। यदि देश अनुसंधान, कौशल विकास, निवेश और वैश्विक सहयोग के बीच संतुलन स्थापित करने में सफल रहता है, तो आने वाले दशक में भारत केवल चिप्स का उपभोक्ता नहीं, बल्कि वैश्विक सेमीकंडक्टर शक्ति के रूप में उभर सकता है।
