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Daily-current-affairs / 19 Jan 2026

तकनीक और रणनीतिक स्वायत्तता: भारत के पनडुब्बी कार्यक्रम का विश्लेषण

तकनीक और रणनीतिक स्वायत्तता: भारत के पनडुब्बी कार्यक्रम का विश्लेषण

सन्दर्भ:

पिछले दशक से हिंद-प्रशांत क्षेत्र (Indo-Pacific) वैश्विक भू-राजनीति का केंद्र बिंदु बन गया है। इस बदलती समुद्री विस्तार नीति में भारत की स्थिति न केवल भौगोलिक रूप से महत्वपूर्ण है, बल्कि सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील भी है। हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) की बदलती सुरक्षा वास्तुकला में भारतीय नौसेना अपनी पारंपरिक क्षमताओं को आधुनिकतम मानकों के अनुरूप ढाल रही है। भारतीय नौसेना की दीर्घकालिक क्षमताओं को सुदृढ़ करने की दिशा में 'प्रोजेक्ट-75I' (P-75I) सबसे महत्वपूर्ण और महत्वाकांक्षी स्तंभ है। लगभग 8 बिलियन डॉलर (60,000 करोड़ रुपये से अधिक) की अनुमानित लागत वाली यह परियोजना केवल सैन्य बेड़े के विस्तार का माध्यम नहीं है, बल्कि यह चीन की 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' और पाकिस्तान की बढ़ती नौसैनिक आक्रामकता के विरुद्ध भारत का एक व्यापक रणनीतिक प्रतिक्रिया भी है।

        • इसी सन्दर्भ में जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ की हालिया भारत यात्रा में रक्षा और सुरक्षा सहयोग एक प्रमुख मुद्दा बनकर उभरा। दोनों देशों ने द्विपक्षीय रक्षा औद्योगिक सहयोग को मजबूत करने के उद्देश्य से एक घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए, जो रणनीतिक संबंधों के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है। जर्मनी ने हाल के वर्षों में अपने रक्षा निर्यात मानदंडों में बदलाव किया है, जिससे भारतीय खरीद के लिए मंजूरी प्रक्रिया सरल हो गई है। वर्षों से लंबित आवेदनों पर अब तेजी से कार्रवाई की जा रही है, जिससे रक्षा व्यापार के लिए अधिक अनुकूल वातावरण बन रहा है।

India’s Submarine Programme

प्रोजेक्ट P-75I और AIP प्रणाली:

        • प्रोजेक्ट P-75I के तहत छह अत्याधुनिक पारंपरिक पनडुब्बियों का निर्माण किया जाना है। इस परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी घटक 'एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन' (AIP) प्रणाली है।
        • पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों की सबसे बड़ी कमजोरी उनकी 'स्टेल्थ' (अदृश्य रहने की क्षमता) की सीमा है। उन्हें अपनी बैटरियों को चार्ज करने के लिए बार-बार सतह पर आना पड़ता है या 'स्नोर्कल' करना पड़ता है, जिससे वे रडार और उपग्रहों की पकड़ में आ जाती हैं। AIP तकनीक से लैस होने के बाद, ये पनडुब्बियां दो से तीन सप्ताह तक लगातार पानी के भीतर रह सकती हैं। यह क्षमता उन्हें परमाणु पनडुब्बियों के करीब ले जाती है, लेकिन कम शोर के कारण ये शांत और अधिक घातक होती हैं। भारत के लिए यह तकनीक इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के उथले पानी में ये पनडुब्बियां दुश्मन के विमानवाहक पोतों के लिए अदृश्य खतरा पैदा करती हैं।

प्रोजेक्ट-75I पनडुब्बी कार्यक्रम

प्रोजेक्ट-75I भारत के पिछले प्रोजेक्ट-75 की अगली पहल है, जिसके तहत मज़गांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL) में छह स्कॉर्पीन-क्लास पनडुब्बियां बनाई गई थीं।

प्रोजेक्ट-75 के विपरीत, प्रोजेक्ट-75I में बाद में रेट्रोफिटिंग करने के बजाय, निर्माण के चरण में ही अत्याधुनिक AIP तकनीक पेश की गई है।

प्रोजेक्ट-75I पनडुब्बी की मुख्य बातें:

        • 6 उन्नत डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों का निर्माण
        • एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) से लैस
        • लंबे समय तक पानी के अंदर ऑपरेशन के लिए डिज़ाइन की गई
        • स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप (SP) मॉडल के तहत निर्मित
        • स्वदेशीकरण और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर ज़ोर

प्रोजेक्ट-75I पनडुब्बी कार्यक्रम का महत्व:

प्रोजेक्ट-75I भारत की सैन्य क्षमता को मजबूत करता है:

        • IOR में चीनी पनडुब्बियों की गतिविधियों पर नज़र रखना
        • महत्वपूर्ण समुद्री संचार मार्गों (SLOCs) को सुरक्षित करना
        • लंबे समय तक गुप्त गश्त करना
        • बिना उकसावे के विश्वसनीय प्रतिरोध का संकेत देना

एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP)

पारंपरिक पनडुब्बियां आमतौर पर बैटरी पर निर्भर करती हैं जिन्हें रिचार्ज करने के लिए समय-समय पर सतह पर आना पड़ता है या स्नोर्कलिंग करनी पड़ती है, जिससे उनके पकड़े जाने का खतरा रहता है। AIP तकनीक इस समीकरण को पूरी तरह से बदल देती है।

AIP पनडुब्बियों के रणनीतिक लाभ:

        • पनडुब्बियों को हफ्तों तक पानी के अंदर रहने की अनुमति देता है
        • ध्वनिक, रडार और इन्फ्रारेड सिग्नेचर को काफी कम करता है
        • स्टील्थ, जीवित रहने की क्षमता और सहनशक्ति को बढ़ाता है
        • गुप्त निगरानी और समुद्री नियंत्रण मिशन के लिए आदर्श
        • कम लागत पर लगभग परमाणु पनडुब्बी जैसी स्टील्थ क्षमता प्रदान करता है

भारत के लिए, AIP पारंपरिक और परमाणु पनडुब्बियों के बीच परिचालन अंतर को पाटता है - बिना लागत या राजनीतिक जोखिम बढ़ाए। यह कार्यक्रम एक स्पष्ट संदेश देता है: भारत अपने प्राथमिक समुद्री क्षेत्र में पानी के नीचे प्रभुत्व नहीं छोड़ेगा।

 

Air-Independent Propulsion (AIP)

क्षेत्रीय शक्ति संतुलन:

भारत के रक्षा योजनाकारों के सामने वर्तमान में 'टू-फ्रंट वॉर' (दो मोर्चों पर युद्ध) की स्थिति समुद्र में भी आकार ले रही है।

        • चीन का प्रभाव: पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी (PLAN) दुनिया की सबसे बड़ी नौसेना बन चुकी है। जिबूती में आधार और ग्वादर में निवेश के माध्यम से चीन हिंद महासागर में अपनी उपस्थिति को स्थायी बना रहा है।
        • पाकिस्तान का आधुनिकीकरण: पाकिस्तान ने चीन से आठ 'हंगोर-क्लास' (Type 039B) पनडुब्बियां खरीदने का समझौता किया है, जो AIP तकनीक से लैस हैं।

यदि भारत अपने बेड़े का समय पर आधुनिकीकरण नहीं करता, तो एक समय ऐसा आ सकता है जब पाकिस्तान की पनडुब्बी मारक क्षमता भारत के बराबर या उससे अधिक हो जाए। P-75I इस तकनीकी अंतर को पाटने का कार्य करता है। यह सुनिश्चित करता है कि भारत के पास न केवल 'क्षेत्रीय रक्षा' की क्षमता हो, बल्कि वह दुश्मन के समुद्री संचार मार्ग (SLOCs) को बाधित करने की 'क्षेत्रीय पहुंच' (Power Projection) भी रखे।

रणनीतिक साझेदारी मॉडल और आत्मनिर्भर भारत:

        • प्रोजेक्ट-75I भारत के 'रणनीतिक साझेदारी' (Strategic Partnership - SP) मॉडल के तहत पहली बड़ी परियोजना है। इस मॉडल का उद्देश्य रक्षा उत्पादन में निजी क्षेत्र को शामिल करना और विदेशी मूल उपकरण निर्माताओं (OEMs) के साथ दीर्घकालिक सहयोग स्थापित करना है।
        • जर्मनी की 'थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स' (TKMS) और भारत की 'मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स' (MDL) के बीच बढ़ते सहयोग ने इस परियोजना को नई गति दी है। यहाँ मुख्य बिंदु 'प्रौद्योगिकी हस्तांतरण' (ToT) है। भारत अब केवल एक खरीदार बनकर नहीं रहना चाहता। इस परियोजना की शर्त ही यह है कि पनडुब्बियों का निर्माण भारतीय यार्डों में हो और उनमें स्वदेशी सामग्री का प्रतिशत उच्च हो। यह दीर्घकाल में भारत को एक 'पनडुब्बी निर्माण हब' के रूप में स्थापित करने की क्षमता रखता है।

Indain navy bases and commands

आर्थिक और औद्योगिक प्रभाव:

8 बिलियन डॉलर का निवेश केवल सैन्य शक्ति तक सीमित नहीं है। ऐसे बड़े रक्षा प्रोजेक्ट्स के 'मल्टीप्लायर इफेक्ट' होते है।

        • एमएसएमई पारिस्थितिकी तंत्र: इन पनडुब्बियों के हजारों छोटे पुर्जों और सेंसरों के लिए देश भर के छोटे और मध्यम उद्योगों को काम मिलता है।
        • कौशल विकास: उच्च-तकनीकी वेल्डिंग, स्टील्थ सामग्री का विज्ञान और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स में भारतीय इंजीनियरों और श्रमिकों का कौशल स्तर वैश्विक मानकों तक पहुँचता है।
        • अनुसंधान एवं विकास (R&D): डीआरडीओ (DRDO) द्वारा विकसित स्वदेशी AIP मॉड्यूल को इन पनडुब्बियों में एकीकृत करने की योजना, भारत की स्वदेशी वैज्ञानिक क्षमता की परीक्षा भी है।

चुनौतियां:

P-75I की प्रक्रिया में अत्यधिक देरी हुई है। मूल योजना के दशक भर बीत जाने के बाद भी निर्माण कार्य शुरू होना बाकी है। जटिल निविदा प्रक्रिया, कड़ी तकनीकी शर्तें और विदेशी कंपनियों की 'प्रौद्योगिकी साझा' करने में विलंब ने इसे धीमा किया है। इस बीच, भारतीय नौसेना की पुरानी पनडुब्बियों का रिटायर होना एक 'क्षमता अंतराल' (Capability Gap) पैदा कर रहा है। सरकार द्वारा  इसे 'मिशन मोड' में आगे बढ़ाने की आवश्यकता है, अन्यथा जब तक ये पनडुब्बियां सेवा में आएंगी, तब तक समुद्री तकनीक के मानक और भी बदल चुके होंगे।

निष्कर्ष:

प्रोजेक्ट-75I भारत की समुद्री संप्रभुता का भविष्य है। एक शक्तिशाली और आधुनिक पनडुब्बी बेड़ा यह सुनिश्चित करता है कि हिंद महासागर में शक्ति का संतुलन बना रहे। भारत की 'सागर' (SAGAR - Security and Growth for All in the Region) नीति की सफलता के लिए P-75I का सफल क्रियान्वयन अपरिहार्य है। यदि भारत इस परियोजना को समयबद्ध तरीके से पूरा करता है, तो यह न केवल दक्षिण एशिया में, बल्कि पूरे विश्व में भारत के रक्षा क्षेत्र में 'महान शक्ति' (Great Power) बनने के दावे को मजबूत करेगा।

 

UPSC/PCS मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न: हिंदप्रशांत क्षेत्र के उभरते भू-राजनीतिक परिदृश्य के संदर्भ में, प्रोजेक्ट-75I भारत की समुद्री रणनीति को किस प्रकार पुनर्परिभाषित करता है? विश्लेषण कीजिए।