सन्दर्भ:
इक्कीसवीं सदी के बदलते सुरक्षा परिदृश्य में भारत की सैन्य नीति निरंतर परिवर्तनशील रही है। लंबे समय तक भारत ने “रणनीतिक संयम” (Strategic Restraint) की नीति अपनाई, जिसके अंतर्गत सीमा पार आतंकवाद के बावजूद व्यापक सैन्य प्रतिक्रिया से बचने का प्रयास किया जाता था। किंतु उरी सर्जिकल स्ट्राइक (2016), बालाकोट एयर स्ट्राइक (2019) और अंततः ऑपरेशन सिंदूर (2025) ने भारत की सैन्य सोच में निर्णायक बदलाव का संकेत दिया।
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- हाल ही में 7 मई को ऑपरेशन सिंदूर का एक वर्ष पूर्ण हुआ जो केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं था, बल्कि यह भारत की नई रणनीतिक मानसिकता का प्रतीक बनकर उभरा। इस अभियान ने यह स्पष्ट किया कि भारत अब आतंकवाद और सीमापार प्रॉक्सी युद्ध के विरुद्ध केवल रक्षात्मक नहीं रहेगा, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर सटीक, त्वरित और दंडात्मक कार्रवाई करने के लिए तैयार है।
- हाल ही में 7 मई को ऑपरेशन सिंदूर का एक वर्ष पूर्ण हुआ जो केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं था, बल्कि यह भारत की नई रणनीतिक मानसिकता का प्रतीक बनकर उभरा। इस अभियान ने यह स्पष्ट किया कि भारत अब आतंकवाद और सीमापार प्रॉक्सी युद्ध के विरुद्ध केवल रक्षात्मक नहीं रहेगा, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर सटीक, त्वरित और दंडात्मक कार्रवाई करने के लिए तैयार है।
ऑपरेशन सिंदूर : पृष्ठभूमि
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- अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले में 26 नागरिकों की मृत्यु के बाद भारत ने पाकिस्तान एवं पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में स्थित आतंकी ढाँचों पर लक्षित कार्रवाई की। इस अभियान में राफेल विमानों, स्कैल्प (SCALP) मिसाइलों, हैमर (HAMMER) बमों, ड्रोन तथा इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों का व्यापक उपयोग किया गया।
- इस अभियान की विशेषता यह थी कि भारत ने सीमित समय में उच्च-सटीकता (Precision Strike) आधारित कार्रवाई करते हुए सैन्य और राजनीतिक दोनों स्तरों पर स्पष्ट संदेश दिया कि आतंकवाद को “न्यूक्लियर ब्लैकमेल” की आड़ में संरक्षण नहीं दिया जा सकता।
- अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले में 26 नागरिकों की मृत्यु के बाद भारत ने पाकिस्तान एवं पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में स्थित आतंकी ढाँचों पर लक्षित कार्रवाई की। इस अभियान में राफेल विमानों, स्कैल्प (SCALP) मिसाइलों, हैमर (HAMMER) बमों, ड्रोन तथा इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों का व्यापक उपयोग किया गया।
भारत की सैन्य नीति में प्रमुख परिवर्तन:
1. “रणनीतिक संयम” से “दंडात्मक प्रतिरोधक क्षमता” की ओर (From Strategic Restraint to Punitive Deterrence)
पूर्व में भारत की नीति मुख्यतः संयम और कूटनीतिक दबाव पर आधारित थी। किंतु ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत ने यह संकेत दिया कि आतंकवादी हमलों का उत्तर केवल निंदा या कूटनीतिक विरोध तक सीमित नहीं रहेगा।
अब भारत की रणनीति दंडात्मक प्रतिरोधक (Punitive Deterrence) क्षमता पर आधारित दिखाई देती है, जिसमें शत्रु को दंडात्मक लागत (Cost Imposition) पहुँचाकर भविष्य की आक्रामकता रोकने का प्रयास किया जाता है।
यह परिवर्तन भारत की सुरक्षा सोच में “नया सामान्य” (New Normal) स्थापित करता है।
2. संघर्ष-वृद्धि पर प्रभुत्व (Escalation Dominance) की अवधारणा
ऐसी क्षमता जिसमें कोई देश संघर्ष को अपनी शर्तों पर बढ़ा, सीमित या नियंत्रित कर सके तथा विरोधी पर लगातार रणनीतिक बढ़त बनाए रखे। उदाहरण: ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने सीमित सैन्य कार्रवाई करते हुए “संघर्ष-वृद्धि पर प्रभुत्व” की क्षमता प्रदर्शित की। इसे ही संघर्ष-वृद्धि पर प्रभुत्व (Escalation Dominance) की अवधारणा कहा जाता है।
अर्थात भारत अब इस स्थिति में पहुँचना चाहता है जहाँ वह संघर्ष को अपनी शर्तों पर आरंभ, नियंत्रित और समाप्त कर सके। यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत को दो परमाणु-संपन्न पड़ोसियों, चीन और पाकिस्तान का सामना करना पड़ता है।
यह नीति पाकिस्तान की उस पारंपरिक रणनीति को चुनौती देती है जिसमें वह परमाणु हथियारों की आड़ लेकर सीमापार आतंकवाद को बढ़ावा देता रहा है।
3. गैर-संपर्क युद्ध (Non-Contact Warfare) और तकनीकी युद्ध का उदय
ऑपरेशन सिंदूर को दक्षिण एशिया का पहला गैर-संपर्क युद्ध (Non-Contact War) भी कहा गया, जिसमें प्रत्यक्ष भू-आक्रमण के बजाय ड्रोन, मिसाइल, साइबर एवं इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के माध्यम से कार्रवाई की गई।
आधुनिक युद्ध में निम्नलिखित तकनीकें निर्णायक बन रही हैं-
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- ड्रोन एवं लोइटरिंग मुनिशन्स (Loitering Munitions)
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी
- साइबर युद्ध
- सैटेलाइट आधारित ISR (खुफिया, निगरानी और टोही (Intelligence, Surveillance & Reconnaissance))
- इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली
- लंबी दूरी की सटीक मिसाइलें
- ड्रोन एवं लोइटरिंग मुनिशन्स (Loitering Munitions)
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भारत ने इस अभियान के माध्यम से यह दिखाया कि भविष्य के युद्ध केवल सैनिकों की संख्या से नहीं, बल्कि तकनीकी श्रेष्ठता से तय होंगे।
4. संयुक्त सैन्य संचालन (Jointness) पर बल
ऑपरेशन सिंदूर में थल सेना, वायु सेना और नौसेना के बीच उच्च स्तर का समन्वय देखने को मिला। इससे थिएटर कमांड एवं एकीकृत सैन्य ढाँचे की आवश्यकता और अधिक स्पष्ट हुई।
भारत अब “एकीकृत थिएटर कमांड” (Integrated Theatre Commands) की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है, जिससे तीनों सेनाओं की संसाधन क्षमता और प्रतिक्रिया समय में सुधार होगा।
5. आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन को बढ़ावा
ऑपरेशन सिंदूर ने यह भी स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा में रक्षा आत्मनिर्भरता अत्यंत महत्वपूर्ण है।
ब्रह्मोस, आकाश मिसाइल प्रणाली, स्वदेशी रडार, ड्रोन तथा इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों के प्रभावी उपयोग ने “आत्मनिर्भर भारत” की रक्षा नीति को नई विश्वसनीयता प्रदान की।
भारत अब रक्षा आयातक से रक्षा निर्यातक बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। भारत का रक्षा निर्यात वर्ष 2024-25 में 23,622 करोड़ रुपये था, जो वर्ष 2025-26 में बढ़कर रिकॉर्ड 38,424 करोड़ रुपये तक पहुँच गया। यह एक वर्ष में लगभग 62.66% की वृद्धि को दर्शाता है। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, भारत अब 80 से अधिक देशों को रक्षा उपकरण निर्यात कर रहा है। इन निर्यातों में ब्रह्मोस मिसाइल, आकाश वायु रक्षा प्रणाली, रडार, गोला-बारूद, बख्तरबंद वाहन, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली, ड्रोन तथा नौसैनिक प्लेटफॉर्म शामिल हैं।
भारत की नई रणनीतिक मुद्रा के व्यापक प्रभाव:
1. दक्षिण एशिया की सुरक्षा संरचना में बदलाव:
ऑपरेशन सिंदूर के बाद दक्षिण एशिया की शक्ति-संतुलन राजनीति में परिवर्तन दिखाई देता है। भारत ने यह संदेश दिया कि वह केवल प्रतिक्रियात्मक शक्ति नहीं, बल्कि सक्रिय सुरक्षा प्रदाता (Net Security Provider) बनना चाहता है।
2. चीन-पाकिस्तान धुरी के संदर्भ में महत्व
भारत की नई सैन्य नीति केवल पाकिस्तान-केंद्रित नहीं है। पूर्वी लद्दाख संकट के अनुभवों के बाद भारत दो-मोर्चीय युद्ध (Two-Front Challenge) की संभावना को ध्यान में रखकर सैन्य आधुनिकीकरण कर रहा है।
3. सूचना युद्ध और नैरेटिव नियंत्रण
आधुनिक संघर्ष केवल युद्धक्षेत्र तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया, साइबर प्रचार और दुष्प्रचार (Disinformation) भी युद्ध का हिस्सा बन चुके हैं। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने सूचना युद्ध में भी सक्रिय भूमिका निभाई और पाकिस्तान के दुष्प्रचार का प्रतिकार किया।
चुनौतियाँ और सीमाएँ:
1. परमाणु जोखिम
यद्यपि भारत संघर्ष-वृद्धि पर प्रभुत्व (Escalation Dominance) की क्षमता विकसित कर रहा है, किंतु दक्षिण एशिया का परमाणु वातावरण अत्यंत संवेदनशील है। सीमित संघर्ष भी अनियंत्रित विस्तार का जोखिम पैदा कर सकता है।
2. आर्थिक बोझ
उच्च-तकनीकी सैन्य आधुनिकीकरण अत्यंत महँगा है। रक्षा बजट में निरंतर वृद्धि का प्रभाव सामाजिक एवं विकासात्मक व्यय पर पड़ सकता है।
3. साइबर सुरक्षा की चुनौती
डिजिटल युद्ध के विस्तार के साथ भारत की महत्वपूर्ण अवसंरचनाएँ साइबर हमलों के प्रति अधिक संवेदनशील होती जा रही हैं। इसलिए साइबर सुरक्षा एवं डेटा सुरक्षा में निवेश आवश्यक है।
4. थिएटर कमांड सुधारों की जटिलता
संयुक्त सैन्य कमांड व्यवस्था लागू करना प्रशासनिक, संगठनात्मक एवं अंतर-सेवा समन्वय की दृष्टि से चुनौतीपूर्ण है।
आगे की राह:
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- भविष्य की जटिल सुरक्षा चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए भारत को अपनी सैन्य एवं रणनीतिक क्षमताओं का व्यापक आधुनिकीकरण करना होगा। इसके अंतर्गत कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), साइबर युद्ध तथा इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताओं का विस्तार अत्यंत आवश्यक होगा, क्योंकि आधुनिक युद्ध तेजी से तकनीक-आधारित होते जा रहे हैं। साथ ही, तीनों सेनाओं के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित करने हेतु एकीकृत थिएटर कमांड के गठन की प्रक्रिया को शीघ्र पूरा करना आवश्यक है।
- भारत को रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए स्वदेशी अनुसंधान एवं रक्षा प्रौद्योगिकी विकास को भी प्रोत्साहित करना होगा, जिससे विदेशी निर्भरता कम हो सके और रणनीतिक स्वायत्तता मजबूत हो। इसके अतिरिक्त, अंतरिक्ष आधारित निगरानी एवं खुफिया प्रणालियों के विकास पर विशेष ध्यान देना आवश्यक होगा, क्योंकि भविष्य के युद्धों में सैटेलाइट आधारित सूचना और निगरानी निर्णायक भूमिका निभाएँगे।
- क्षेत्रीय एवं वैश्विक स्तर पर अपनी सामरिक स्थिति को मजबूत करने के लिए भारत को क्वाड तथा इंडो-पैसिफिक साझेदारियों को और सुदृढ़ करना होगा। साथ ही, सीमा प्रबंधन, आतंकवाद-रोधी तंत्र तथा आंतरिक सुरक्षा में तकनीकी समन्वय बढ़ाकर बहुआयामी सुरक्षा चुनौतियों के प्रति अधिक सक्षम एवं त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र विकसित करना समय की आवश्यकता है।
- भविष्य की जटिल सुरक्षा चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए भारत को अपनी सैन्य एवं रणनीतिक क्षमताओं का व्यापक आधुनिकीकरण करना होगा। इसके अंतर्गत कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), साइबर युद्ध तथा इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताओं का विस्तार अत्यंत आवश्यक होगा, क्योंकि आधुनिक युद्ध तेजी से तकनीक-आधारित होते जा रहे हैं। साथ ही, तीनों सेनाओं के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित करने हेतु एकीकृत थिएटर कमांड के गठन की प्रक्रिया को शीघ्र पूरा करना आवश्यक है।
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निष्कर्ष:
ऑपरेशन सिंदूर भारत की सैन्य एवं रणनीतिक सोच में एक निर्णायक मोड़ का प्रतीक है। इसने यह स्पष्ट किया कि भारत अब केवल “रणनीतिक संयम” की नीति तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि वह सटीक, तकनीक-आधारित और नियंत्रित सैन्य शक्ति के माध्यम से प्रतिरोधक क्षमता स्थापित करना चाहता है।
भारत की नई सैन्य नीति “दंडात्मक प्रतिरोध”, “तकनीकी श्रेष्ठता”, “संयुक्त सैन्य संचालन” और “आत्मनिर्भर रक्षा” पर आधारित दिखाई देती है। हालांकि इसके साथ परमाणु जोखिम, आर्थिक बोझ और साइबर चुनौतियाँ भी जुड़ी हुई हैं, फिर भी यह परिवर्तन भारत को एक अधिक सक्षम, आत्मविश्वासी और निर्णायक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में स्थापित करता है।
