संदर्भ:
मई 2026 में प्रधानमंत्री मोदी की संयुक्त अरब अमीरात, नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली की पाँच देशों की हालिया यात्रा ने भारत की विदेश नीति को एक नए रणनीतिक आयाम के रूप में प्रस्तुत किया है। इस दौरे के केंद्र में भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा, हरित संक्रमण (Green Transition), तकनीकी आत्मनिर्भरता और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में भारत की भूमिका को मजबूत करना था।
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- भारत, विश्व की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार आने वाले दशक में वैश्विक ऊर्जा मांग वृद्धि का सबसे बड़ा हिस्सा भारत से आने वाला है। भारत वर्तमान में अपनी कुल कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत और गैस आवश्यकता का लगभग 50 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में ऊर्जा सुरक्षा केवल आर्थिक आवश्यकता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता का प्रश्न बन चुकी है। प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा इसी व्यापक भू-राजनीतिक और आर्थिक संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इन देशों के साथ हुए समझौतों के कारण स्वच्छ ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिजों और सतत विकास के क्षेत्रों में भारत की उपस्थिति को बढ़ावा मिलेगा।
- भारत, विश्व की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार आने वाले दशक में वैश्विक ऊर्जा मांग वृद्धि का सबसे बड़ा हिस्सा भारत से आने वाला है। भारत वर्तमान में अपनी कुल कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत और गैस आवश्यकता का लगभग 50 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में ऊर्जा सुरक्षा केवल आर्थिक आवश्यकता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता का प्रश्न बन चुकी है। प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा इसी व्यापक भू-राजनीतिक और आर्थिक संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इन देशों के साथ हुए समझौतों के कारण स्वच्छ ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिजों और सतत विकास के क्षेत्रों में भारत की उपस्थिति को बढ़ावा मिलेगा।
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ऊर्जा सुरक्षा : भारत की सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती
रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में तनाव, लाल सागर संकट और वैश्विक तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ऊर्जा आपूर्ति में बाधा किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है।
भारत जैसे विकासशील और ऊर्जा-निर्भर देश के लिए यह चुनौती और अधिक गंभीर है क्योंकि:
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- भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता है।
- देश में ऊर्जा मांग तेजी से बढ़ रही है।
- विनिर्माण, डिजिटल अर्थव्यवस्था और शहरीकरण ऊर्जा आवश्यकता को और बढ़ा रहे हैं।
- भारत 2070 तक नेट-ज़ीरो लक्ष्य प्राप्त करने के लिए प्रतिबद्ध है।
- भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता है।
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ऐसे में भारत को एक साथ तीन लक्ष्यों को संतुलित करना पड़ रहा है-
1. सस्ती ऊर्जा उपलब्ध कराना
2. ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित बनाना
3. हरित एवं स्वच्छ ऊर्जा की ओर संक्रमण करना
प्रधानमंत्री मोदी की पाँच देशों की यात्रा इसी “ऊर्जा त्रिकोण” (Energy Trilemma) के समाधान की दिशा में एक रणनीतिक पहल के रूप में देखी जा रही है।
यूएई : भारत की ऊर्जा कूटनीति का केंद्रीय स्तंभ
संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) भारत की ऊर्जा रणनीति में अत्यंत महत्वपूर्ण साझेदार बन चुका है। भारत और यूएई के बीच संबंध अब केवल तेल व्यापार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि रणनीतिक निवेश, पेट्रोलियम भंडारण, नवीकरणीय ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा तक विस्तारित हो चुके हैं।
इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच निम्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर बल दिया गया-
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- दीर्घकालिक तेल एवं गैस आपूर्ति
- रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारण
- हरित हाइड्रोजन
- ऊर्जा अवसंरचना निवेश
- पेट्रोकेमिकल सहयोग
- दीर्घकालिक तेल एवं गैस आपूर्ति
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भारत तेल खरीदने की नीति से आगे बढ़कर “ऊर्जा साझेदारी” की दिशा में काम कर रहा है। अब लक्ष्य यह है कि विदेशी ऊर्जा उत्पादक देश भारत के ऊर्जा क्षेत्र में निवेश भी करें।
विशेष रूप से अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी (ADNOC) द्वारा भारत में रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारण में भागीदारी भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करती है। इससे वैश्विक संकट की स्थिति में भारत के पास आपूर्ति सुरक्षा सुनिश्चित करने का विकल्प उपलब्ध रहेगा।
यूरोप और नॉर्डिक देश : हरित ऊर्जा और प्रौद्योगिकी सहयोग
प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा का दूसरा महत्वपूर्ण आयाम यूरोप और नॉर्डिक देशों के साथ तकनीकी एवं हरित ऊर्जा सहयोग रहा।
1. नीदरलैंड: सेमीकंडक्टर और हरित प्रौद्योगिकी
नीदरलैंड, वैश्विक सेमीकंडक्टर उपकरण निर्माण और जल प्रबंधन तकनीक का प्रमुख केंद्र है। भारत का उद्देश्य चीन-केंद्रित वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के विकल्प के रूप में स्वयं को स्थापित करना है।
भारत और नीदरलैंड के बीच सहयोग निम्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण है-
· सेमीकंडक्टर विनिर्माण
· चिप डिजाइन
· स्वच्छ ऊर्जा तकनीक
· बंदरगाह एवं लॉजिस्टिक्स
· जल प्रबंधन
भारत का “सेमीकंडक्टर मिशन” तभी सफल हो सकता है जब उसे अत्याधुनिक तकनीक और वैश्विक निवेश प्राप्त हो।
2. स्वीडन और नॉर्वे: ग्रीन ट्रांजिशन मॉडल
स्वीडन और नॉर्वे विश्व के सबसे उन्नत हरित अर्थव्यवस्था मॉडल प्रस्तुत करते हैं। ये देश स्वच्छ ऊर्जा, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, कार्बन न्यूट्रल तकनीक और सस्टेनेबल औद्योगिक विकास में अग्रणी हैं।
भारत के लिए इन देशों के साथ सहयोग कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है-
· ग्रीन हाइड्रोजन
· बैटरी स्टोरेज तकनीक
· इलेक्ट्रिक मोबिलिटी
· कार्बन कैप्चर तकनीक
· अपशिष्ट प्रबंधन
· आर्कटिक रिसर्च
भारत अब “ब्राउन इकोनॉमी” से “ग्रीन इकोनॉमी” की ओर संक्रमण कर रहा है। इसके लिए केवल पूंजी ही नहीं, बल्कि उन्नत तकनीक और अनुसंधान सहयोग भी आवश्यक है।
इटली के साथ विशेष रणनीतिक साझेदारी:
इटली के साथ भारत के संबंधों को “विशेष रणनीतिक साझेदारी” तक उन्नत किया जाना इस यात्रा की सबसे बड़ी कूटनीतिक उपलब्धियों में से एक माना जा रहा है।
इटली यूरोप का एक प्रमुख औद्योगिक और विनिर्माण केंद्र है। दोनों देशों के बीच सहयोग निम्न क्षेत्रों में बढ़ाया जा रहा है-
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- रक्षा विनिर्माण
- ऊर्जा संक्रमण
- हरित उद्योग
- उन्नत मशीनरी
- समुद्री सुरक्षा
- महत्वपूर्ण खनिज (Critical Minerals)
- रक्षा विनिर्माण
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विशेष रूप से महत्वपूर्ण खनिज (Critical Minerals) आज वैश्विक राजनीति का नया केंद्र बनते जा रहे हैं। लिथियम, कोबाल्ट, निकेल और रेयर अर्थ तत्व इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी और सेमीकंडक्टर उद्योग के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
चीन का इन खनिजों पर प्रभुत्व विश्व के लिए एक बड़ी रणनीतिक चुनौती है। भारत अब वैकल्पिक आपूर्ति श्रृंखलाएँ विकसित करने की दिशा में कार्य कर रहा है।
ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी भारत की व्यापक रणनीति:
प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा भारत की बहु-आयामी ऊर्जा रणनीति को स्पष्ट करती है। भारत अब केवल आयात-आधारित ऊर्जा मॉडल पर निर्भर नहीं रहना चाहता।
भारत की प्रमुख रणनीतियाँ:
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- ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण: भारत रूस, पश्चिम एशिया, अमेरिका और अफ्रीका सहित अनेक क्षेत्रों से ऊर्जा आयात बढ़ा रहा है ताकि किसी एक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता न रहे।
- हरित ऊर्जा विस्तार: भारत ने 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य निर्धारित किया है।
- ग्रीन हाइड्रोजन मिशन: राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन भारत को स्वच्छ ईंधन निर्यातक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
- रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारण: भारत वैश्विक संकट के समय ऊर्जा आपूर्ति बनाए रखने हेतु पेट्रोलियम भंडारण क्षमता बढ़ा रहा है।
- तकनीकी आत्मनिर्भरता: सेमीकंडक्टर, बैटरी और स्वच्छ ऊर्जा उपकरणों में घरेलू विनिर्माण बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।
- ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण: भारत रूस, पश्चिम एशिया, अमेरिका और अफ्रीका सहित अनेक क्षेत्रों से ऊर्जा आयात बढ़ा रहा है ताकि किसी एक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता न रहे।
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चुनौतियाँ:
हालाँकि भारत की रणनीति महत्वाकांक्षी है, लेकिन कई चुनौतियाँ भी मौजूद हैं-
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- अत्यधिक आयात निर्भरता
- स्वच्छ ऊर्जा तकनीक की ऊँची लागत
- चीन पर क्रिटिकल मिनरल निर्भरता
- वैश्विक भू-राजनीतिक अस्थिरता
- घरेलू ऊर्जा अवसंरचना की सीमाएँ
- अत्यधिक आयात निर्भरता
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इसके अतिरिक्त, हरित ऊर्जा संक्रमण के दौरान कोयला आधारित अर्थव्यवस्था से जुड़े रोजगार और सामाजिक प्रभाव भी महत्वपूर्ण चुनौती बने रहेंगे।
निष्कर्ष:
प्रधानमंत्री मोदी की पाँच देशों की यात्रा ने यह स्पष्ट किया है कि भारत की विदेश नीति अब “मल्टी-अलाइनमेंट” मॉडल पर आधारित है। भारत अमेरिका, यूरोप, रूस और पश्चिम एशिया, सभी के साथ संतुलित संबंध बनाए रखते हुए अपने राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ा रहा है। भारत हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी रणनीतिक स्थिति का उपयोग करते हुए वैश्विक ऊर्जा और व्यापार नेटवर्क का महत्वपूर्ण केंद्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। भारत की विदेश नीति अब केवल कूटनीतिक संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी आत्मनिर्भरता, हरित संक्रमण और वैश्विक आर्थिक शक्ति बनने की व्यापक रणनीति का हिस्सा बन चुकी है। यदि भारत ऊर्जा सुरक्षा, हरित विकास और तकनीकी आत्मनिर्भरता के बीच संतुलन स्थापित करने में सफल रहता है, तो आने वाले दशक में वह केवल विश्व की सबसे बड़ी जनसंख्या वाला देश ही नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक और रणनीतिक व्यवस्था का प्रमुख शक्ति केंद्र भी बन सकता है।


