होम > Daily-current-affairs

Daily-current-affairs / 26 Aug 2026

घासभूमियों और खुले प्राकृतिक पारितंत्रों के संरक्षण के प्रति भारत का बदलता दृष्टिकोण

घासभूमियों और खुले प्राकृतिक पारितंत्रों के संरक्षण के प्रति भारत का बदलता दृष्टिकोण

सन्दर्भ:

अगस्त 2026 में मंगोलिया की राजधानी उलानबटार में आयोजित संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम अभिसमय (UNCCD) के 17वें पक्षकारों के सम्मेलन (COP17) के दौरान भारत सरकार द्वारा भारत के घास के मैदान और खुले प्राकृतिक पारितंत्रों (ONEs) पर पहली व्यापक मार्गदर्शिका (Guidelines) जारी की गई। यह दस्तावेज़ भारत की पर्यावरण नीति में एक प्रतिमान विस्थापन (Paradigm Shift) को दर्शाता है।

      • दशकों से, भारत में नीतिगत स्तर पर केवल वनों` (Forests) को ही संरक्षण के योग्य माना जाता रहा, जबकि घासभूमियों, सवाना और मरुस्थलीय क्षेत्रों को औपनिवेशिक विरासत के तहत 'बंजर भूमि' (Wastelands) के रूप में वर्गीकृत किया गया। यह नई गाइडलाइंस न केवल इन 'खुले प्राकृतिक पारितंत्रों' (ONEs) को वैज्ञानिक पहचान प्रदान करती हैं, बल्कि इनके सामाजिक, आर्थिक और पारिस्थितिक महत्व को रेखांकित करते हुए एक व्यापक संरक्षण रोडमैप प्रस्तुत करती हैं।

खुले प्राकृतिक पारितंत्र (ONEs) और भारत में प्रसार:

      • खुले प्राकृतिक पारितंत्र (Open Natural Ecosystems - ONEs) उन भूभागों को संदर्भित करते हैं जहां पेड़ों का घनत्व बहुत कम (सामान्यतः 10% से कम) होता है और मुख्य रूप से घास, झाड़ियाँ और अल्पविकसित वनस्पतियाँ पाई जाती हैं। ये कोई नष्ट हुए वन (Degraded Forests) नहीं हैं, बल्कि हज़ारों वर्षों के विकासवादी अनुकूलन का परिणाम हैं।
      • बेंगलुरु स्थित शोध संस्थान 'अशोक ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकोलॉजी एंड द एनवायरनमेंट' (ATREE), इसरो (ISRO) और भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE) के सहयोग से तैयार की गई इस मार्गदर्शिका के अनुसार, भारत में खुले प्राकृतिक पारितंत्र के तहत निम्नलिखित क्षेत्र शामिल हैं:
      • 24 विशिष्ट पारिस्थितिक श्रेणियाँ: इसके अंतर्गत भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 10% (लगभग 3.2 लाख वर्ग किलोमीटर) हिस्सा आता है।

प्रमुख भौगोलिक क्षेत्र:

      • शीत मरुस्थल और अल्पाइन घासभूमियां: लद्दाख और उच्च हिमालयी क्षेत्र (बुग्याल)।
      • तराई की घासभूमियां: भारत-गंगा के मैदानों का दलदली घास क्षेत्र।
      • बन्नी और थार सवाना: गुजरात और राजस्थान के अत्यधिक शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्र।
      • दक्कन के पठार की अर्ध-शुष्क झाड़ीभूमियां: मध्य और दक्षिण भारत का शुष्क आंतरिक भाग।
      • चंबल के बीहड़ (Ravines): मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के विच्छेदित खड्ड क्षेत्र।
      • पश्चिमी घाट के चट्टानी पठार और 'शोला' घासभूमियां: उच्च ऊंचाई वाले अद्वितीय पारितंत्र।

खुले प्राकृतिक पारितंत्र (ONEs) का बहुआयामी महत्व:

इस व्यापक मार्गदर्शिका के माध्यम से भारत ने स्पष्ट किया है कि खुले प्राकृतिक पारितंत्र देश की पारिस्थितिकी और अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं।

      • पारिस्थितिक और जैव विविधता महत्व:
        • विशिष्ट प्रजातियों का आवास: खुले प्राकृतिक पारितंत्र (ONEs) कई ऐसी विशिष्ट प्रजातियों के घर हैं जो घने जंगलों में जीवित नहीं रह सकतीं। उदाहरण के लिए, अत्यंत लुप्तप्राय 'ग्रेट इंडियन बस्टर्ड' (सोनाचाँथ), लेसर फ्लोरिकन, भारतीय भेड़िया (Indian Wolf), ब्लैकबक (काला हिरण), चीतल और कैराकल (स्याहगोश)
        • जल विज्ञान चक्र (Hydrological Cycle): घासभूमियों की व्यापक जड़ प्रणालियाँ स्पंज की तरह कार्य करती हैं। ये मानसून के अत्यधिक पानी को अवशोषित कर भूजल (Groundwater) को पुनर्भरण (Recharge) करती हैं और मृदा अपरदन को रोकती हैं।
      • जलवायु परिवर्तन और कार्बन पृथक्करण:
        • भूमिगत कार्बन सिंक: जंगलों के विपरीत, घासभूमियाँ अपना अधिकांश कार्बन मिट्टी के नीचे (जड़ों और कार्बनिक पदार्थों के रूप में) संग्रहीत करती हैं।
        • स्थायित्व (Permanence): दावानल (Forest Fires) या सूखे की स्थिति में जंगलों का कार्बन तुरंत वायुमंडल में मुक्त हो जाता है, जबकि घासभूमियों का भूमिगत कार्बन आग से अप्रभावित रहता है, जिससे यह अधिक स्थायी कार्बन सिंक बनता है।
      • सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक महत्व:
        • पशुपालन और आजीविका: भारत में दुनिया की सबसे बड़ी पशुधन (Livestock) आबादी है। खुले प्राकृतिक पारितंत्र (ONEs) देश के करोड़ों चरवाहों, गडरियों और खानाबदोश समुदायों (जैसे राजस्थान के रबारी, महाराष्ट्र के धनगर, कर्नाटक के कुरुबा) के लिए चारे का प्राथमिक स्रोत हैं।
        • पारंपरिक संरक्षण प्रणालियाँ: भारत में 'ओरण' (Orans), 'गौचर' (Gauchars) और 'देवबनी' जैसे सामुदायिक और पवित्र उपवनों (Sacred Groves) के रूप में ONEs के संरक्षण का एक लंबा सांस्कृतिक इतिहास रहा है।

भारत में खुले प्राकृतिक पारितंत्र (ONEs) के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ:

मार्गदर्शिका को जारी करने की आवश्यकता इसलिए पड़ी क्योंकि ये पारितंत्र वर्तमान में अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं:

      • 'बंजर भूमि' का औपनिवेशिक वर्गीकरण: ब्रिटिश काल के 'वेस्टलैंड एटलस' के कारण इन क्षेत्रों को उत्पादकता विहीन माना गया। इसके परिणामस्वरूप सरकारों ने इन्हें उद्योग, सौर पार्क या पवन ऊर्जा परियोजनाओं के लिए आसानी से आवंटित कर दिया।
      • त्रुटिपूर्ण वनीकरण नीतियां (Misguided Afforestation): 'हरित भारत मिशन' (Green India Mission) या प्रतिपूरक वनीकरण (CAMPA) के तहत अक्सर घासभूमियों और सवाना क्षेत्रों में विदेशी प्रजातियों (जैसे, प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा या यूकेलिप्टस) के पेड़ लगा दिए जाते हैं। यह इन पारितंत्रों की जल तालिका को नष्ट करता है और स्थानीय जैव विविधता को समाप्त कर देता है।
      • अतिक्रमण और कृषि विस्तार: सिंचाई सुविधाओं (जैसे इंदिरा गांधी नहर) के विस्तार के कारण शुष्क ONEs को जबरन कृषि भूमि में परिवर्तित किया जा रहा है।
      • जलवायु परिवर्तन और मरुस्थलीकरण: वर्षा के बदलते पैटर्न और अत्यधिक चराई (Overgrazing) के कारण ये क्षेत्र तेजी से मरुस्थल में बदल रहे हैं, जिससे इनकी वहन क्षमता (Carrying Capacity) प्रभावित हो रही है।

भारत की वैश्विक प्रतिबद्धताएँ:

मंगोलिया के उलानबातर में इस गाइड को जारी करना भारत की वैश्विक पर्यावरण कूटनीति के लिए अत्यधिक रणनीतिक है:

      • भूमि क्षरण तटस्थता (LDN): भारत ने 2030 तक 26 मिलियन हेक्टेयर क्षरण भूमि को बहाल करने का संकल्प लिया है। ONEs का वैज्ञानिक प्रबंधन इस लक्ष्य को प्राप्त करने की कुंजी है।
      • कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता ढांचा (GBF): इसके तहत 2030 तक 30% पृथ्वी और महासागरों को संरक्षित करने का लक्ष्य (30x30 Target) है। भारत अपने ONEs को 'अन्य प्रभावी क्षेत्र-आधारित संरक्षण उपायों' (OECMs) के रूप में वर्गीकृत कर इस लक्ष्य में योगदान दे रहा है।

आगे की राह:

घास के मैदान और खुले प्राकृतिक पारितंत्रों के उद्देश्यों को धरातल पर उतारने के लिए निम्नलिखित सुधारात्मक कदमों की आवश्यकता है:

      • 'वेस्टलैंड एटलस' का पुनरीक्षण: भारत सरकार को अपने भूमि उपयोग वर्गीकरण (Land Use Classification) से 'बंजर भूमि' शब्द को हटाना चाहिए या इसे वैज्ञानिक रूप से पुनर्गठित करना चाहिए ताकि ONEs को कानूनी सुरक्षा मिल सके।
      • पारिस्थितिकी-केंद्रित बहाली (Eco-centric Restoration): वनीकरण (Tree Planting) की जगह 'घासभूमि बहाली' (Grassland Restoration) को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। जहाँ केवल स्थानीय घासों और झाड़ियों को ही उगाया जाए।
      • चरवाहा समुदायों का अधिकार-संपन्न बनाना: वन अधिकार अधिनियम, 2006 (FRA) के तहत चरवाहों के सामुदायिक वन संसाधनों (CFR) पर पारंपरिक अधिकारों को मान्यता दी जानी चाहिए, ताकि वे 'ओरण' और 'गौचर' का प्रबंधन स्वयं कर सकें।
      • हरित ऊर्जा अवसंरचना का नियमन: सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाओं को संवेदनशील ONEs से दूर, वास्तविक रूप से निम्नीकृत और औद्योगिक बंजर भूमियों पर स्थानांतरित किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष:

मंगोलिया में भारत द्वारा जारी की गई यह मार्गदर्शिका इस बात की स्वीकारोक्ति है कि 'हरित आवरण' (Green Cover) का अर्थ केवल 'वृक्ष आवरण' (Tree Cover) नहीं होता। घासभूमियाँ, सवाना और बीहड़ प्रकृति के अनमोल उपहार हैं, जो न केवल कार्बन सोखते हैं बल्कि भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और वन्यजीवों को जीवन प्रदान करते हैं। यह दस्तावेज़ भारत के पर्यावरण एजेंडे को अधिक समावेशी, वैज्ञानिक और टिकाऊ बनाने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम साबित होगा।

Aliganj Gomti Nagar Prayagraj