संदर्भ:
हाल ही में दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से हटकर पृथक रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच द्विपक्षीय बैठक हुई। बैठक के बाद भारत की ओर से कहा गया कि दोनों नेताओं ने आपसी चिंताओं, विशेष रूप से “संरचनात्मक व्यापार असंतुलन” और “आपूर्ति शृंखला से जुड़े मुद्दों” को दूर करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
यह मुद्दा भारत की आर्थिक रणनीति के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एक ओर भारत आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया और उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) जैसी पहलों के माध्यम से घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा दे रहा है, वहीं दूसरी ओर इलेक्ट्रॉनिक्स, दूरसंचार उपकरण, मशीनरी, सौर उपकरण और अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में चीन से आयातित मध्यवर्ती वस्तुओं तथा घटकों पर निर्भरता बनी हुई है।
इस प्रकार भारत के सामने एक महत्वपूर्ण विरोधाभास है कि भारत में उत्पादन बढ़ रहा है, लेकिन उस उत्पादन के लिए आवश्यक कई प्रमुख इनपुट अभी भी विदेशों, विशेषकर चीन से प्राप्त हो रहे हैं।
भारत-चीन व्यापार का बदलता स्वरूप:
भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय व्यापार में पिछले वर्षों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। वर्ष 2025 में दोनों देशों के बीच कुल व्यापार लगभग 167.6 अरब डॉलर रहा। हालांकि, इस व्यापार का स्वरूप अत्यधिक असंतुलित है। 2021 से 2025 के बीच चीन को भारत का निर्यात लगभग स्थिर रहा, जबकि चीन से भारत का आयात लगभग 87.5 अरब डॉलर से बढ़कर 149.5 अरब डॉलर हो गया। अर्थात इस अवधि में आयात में लगभग 71% की वृद्धि हुई।
यह स्थिति भारत के लगातार बढ़ते व्यापार घाटे को दर्शाती है। हालांकि व्यापार घाटा अपने आप में हमेशा नकारात्मक नहीं होता, लेकिन समस्या तब गंभीर हो जाती है जब आयात मुख्य रूप से उन उत्पादों और तकनीकी घटकों का हो जिनका घरेलू उत्पादन पर्याप्त मात्रा और गुणवत्ता में विकसित नहीं हो पाया है। इस संदर्भ में भारत-चीन व्यापार घाटा केवल उपभोक्ता वस्तुओं के आयात की समस्या नहीं है, बल्कि यह भारत की औद्योगिक क्षमता, तकनीकी आत्मनिर्भरता और वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में स्थिति से जुड़ा व्यापक मुद्दा है।
आयात की संरचना क्यों महत्वपूर्ण है?
चीन से भारत के लगभग 70% आयात मध्यवर्ती वस्तुओं और लगभग 22% पूंजीगत वस्तुओं के रूप में हैं। मध्यवर्ती वस्तुओं या सहायक सामग्री में वे वस्तुएं शामिल होती हैं जिनका उपयोग किसी अन्य उत्पाद के निर्माण में किया जाता है। उदाहरण के लिए इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट, मशीनरी के पुर्जे, रसायन, सर्किट और अन्य औद्योगिक इनपुट।
इसलिए चीन से होने वाला आयात केवल भारतीय बाजार में चीनी उत्पादों की बिक्री तक सीमित नहीं है। वास्तव में, भारतीय उद्योग का एक हिस्सा स्वयं चीनी इनपुट पर निर्भर उत्पादन प्रणाली के भीतर काम कर रहा है।
इसे “असेंबली ट्रैप” के रूप में समझा जा सकता है। भारत किसी उत्पाद की अंतिम असेंबली देश के भीतर करता है, लेकिन उसके महत्वपूर्ण और उच्च-मूल्य वाले घटक बाहर से आयात करता है। परिणामस्वरूप उत्पादन और निर्यात के आंकड़े बढ़ सकते हैं, लेकिन वास्तविक घरेलू मूल्य संवर्धन सीमित रह सकता है।
इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र: आत्मनिर्भरता का प्रमुख उदाहरण
भारत ने मोबाइल फोन निर्माण और इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबली में उल्लेखनीय प्रगति की है। भारत अब वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण चुनौती सामने आती है। मोबाइल फोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों की असेंबली भारत में बढ़ने के बावजूद उनके लिए आवश्यक कई महत्वपूर्ण घटकों का आयात अभी भी जारी है।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, मोबाइल फोन निर्माण में उपयोग होने वाले आयातित पुर्जों और घटकों की हिस्सेदारी 2022 में 3.3% से बढ़कर 2025 में 10.1% हो गई।
यह स्थिति बताती है कि भारत ने असेंबली क्षमता विकसित करने में तेजी दिखाई है, लेकिन सेमीकंडक्टर, डिस्प्ले, सेंसर, प्रिसीजन कंपोनेंट और अन्य उच्च-तकनीकी उत्पादों के घरेलू पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण में अभी लंबी दूरी तय करनी है।
यही कारण है कि केवल “भारत में बना” उत्पाद और वास्तविक अर्थों में “भारत द्वारा निर्मित” उत्पाद के बीच अंतर करना आवश्यक है।
भारत के लिए प्रमुख चुनौतियां:
1. उच्च तकनीकी निर्भरता
सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट, मशीन टूल्स और अन्य उच्च-तकनीकी क्षेत्रों में भारत की घरेलू क्षमता अभी सीमित है। इन क्षेत्रों में चीन सहित कुछ चुनिंदा देशों पर अधिक निर्भरता आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में जोखिम बढ़ा सकती है।
2. घरेलू कंपोनेंट इकोसिस्टम का अभाव
किसी मजबूत विनिर्माण अर्थव्यवस्था के लिए केवल बड़ी कंपनियां पर्याप्त नहीं होतीं। उनके आसपास एमएसएमई, आपूर्तिकर्ता, डिजाइन कंपनियां, अनुसंधान संस्थान, लॉजिस्टिक्स नेटवर्क और कुशल श्रम का व्यापक नेटवर्क आवश्यक होता है। भारत में इस तरह के गहरे सप्लायर नेटवर्क का विकास अभी कई क्षेत्रों में अपेक्षाकृत कमजोर है।
3. अनुसंधान एवं विकास की कमी
उच्च-मूल्य वाले विनिर्माण के लिए अनुसंधान, डिजाइन और तकनीकी नवाचार महत्वपूर्ण हैं। यदि भारतीय कंपनियां केवल विदेशी तकनीक और डिजाइन पर निर्भर रहती हैं, तो घरेलू मूल्य संवर्धन सीमित रहेगा।
4. लागत प्रतिस्पर्धा
चीनी उद्योग ने बड़े पैमाने की अर्थव्यवस्था, विकसित सप्लायर नेटवर्क, बुनियादी ढांचे और तकनीकी विशेषज्ञता के कारण कई क्षेत्रों में लागत प्रतिस्पर्धा विकसित की है। भारतीय उद्योग के लिए इस स्तर की प्रतिस्पर्धात्मकता हासिल करना एक चुनौती है।
क्या आयात पर प्रतिबंध समाधान है?
भारत-चीन व्यापार असंतुलन के समाधान के लिए केवल आयात प्रतिबंध या अत्यधिक टैरिफ लगाना पर्याप्त नहीं होगा। भारत को यह ध्यान रखना होगा कि कई चीनी आयात स्वयं भारतीय उद्योग के लिए उत्पादन के आवश्यक इनपुट हैं। यदि इन पर अचानक व्यापक प्रतिबंध लगाए जाते हैं, तो भारतीय कंपनियों की उत्पादन लागत बढ़ सकती है और उनकी वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित हो सकती है। इसलिए नीति का उद्देश्य “आयात को रोकना” नहीं, बल्कि “आयात पर रणनीतिक निर्भरता को कम करना” होना चाहिए।
जहां घरेलू क्षमता विकसित की जा सकती है, वहां चरणबद्ध और लक्षित टैरिफ के माध्यम से घरेलू उद्योग को अवसर दिया जा सकता है। वहीं जिन क्षेत्रों में भारत के पास अभी पर्याप्त क्षमता नहीं है, वहां वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं से जुड़ाव बनाए रखना आवश्यक होगा।
आत्मनिर्भरता का सही अर्थ है कि आत्मनिर्भरता का अर्थ दुनिया से अलग होकर उत्पादन करना नहीं है। आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था में पूर्ण आत्मनिर्भरता न तो व्यावहारिक है और न ही आवश्यक।
वास्तविक आत्मनिर्भरता का अर्थ है कि “महत्वपूर्ण क्षेत्रों में घरेलू क्षमता विकसित करना और साथ ही वैश्विक बाजार तथा आपूर्ति शृंखलाओं से रणनीतिक रूप से जुड़ा रहना।”
भारत को अपनी रणनीति को असेंबली-लेड मैन्युफैक्चरिंग से आगे बढ़कर कंपोनेंट-लेड और टेक्नोलॉजी-लेड मैन्युफैक्चरिंग की ओर ले जाना होगा।
इसके लिए निम्नलिखित कदम महत्वपूर्ण हो सकते हैं-
1. कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग पर जोर: PLI जैसी योजनाओं का विस्तार केवल अंतिम उत्पादों तक सीमित न रहकर इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट, सेमीकंडक्टर, सेंसर, मशीन टूल्स और अन्य महत्वपूर्ण इनपुट तक किया जाना चाहिए।
2. R&D और नवाचार को बढ़ावा: विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों और उद्योगों के बीच सहयोग बढ़ाकर घरेलू तकनीकी क्षमता विकसित करनी होगी।
3. एमएसएमई सप्लायर नेटवर्क का विकास: बड़ी कंपनियों के आसपास स्थानीय और क्षेत्रीय आपूर्तिकर्ताओं का मजबूत नेटवर्क तैयार करना आवश्यक है। इससे घरेलू मूल्य संवर्धन और रोजगार दोनों बढ़ेंगे।
4. वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में गहरी भागीदारी: भारत को चीन से निर्भरता कम करते हुए केवल घरेलू उत्पादन पर निर्भर नहीं होना चाहिए। जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान, यूरोप, अमेरिका और आसियान देशों सहित विभिन्न साझेदारों के साथ आपूर्ति शृंखला सहयोग को बढ़ाना उपयोगी होगा।
5. व्यापार नीति में संतुलन: टैरिफ नीति ऐसी होनी चाहिए जो घरेलू उद्योग को संरक्षण देने के साथ-साथ उसे वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार भी करे। अत्यधिक संरक्षण से उद्योग प्रतिस्पर्धात्मकता खो सकता है।
निष्कर्ष
भारत-चीन व्यापार संबंधों में मौजूद असंतुलन केवल व्यापार घाटे का प्रश्न नहीं है। यह भारत के विनिर्माण मॉडल, तकनीकी क्षमता और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में उसकी स्थिति से जुड़ा व्यापक आर्थिक मुद्दा है। भारत ने मोबाइल फोन असेंबली, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य विनिर्माण क्षेत्रों में महत्वपूर्ण प्रगति की है, लेकिन अगला चरण केवल अधिक उत्पादन का नहीं, बल्कि अधिक घरेलू मूल्य संवर्धन का होना चाहिए।
आत्मनिर्भर भारत की सफलता का वास्तविक पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि अंतिम उत्पाद भारत में असेंबल हुआ या नहीं, बल्कि यह होना चाहिए कि उस उत्पाद के डिजाइन, तकनीक, प्रमुख घटक, अनुसंधान और आपूर्ति शृंखला में भारत का योगदान कितना है। अतः भारत को चीन से दूरी नहीं, बल्कि “अत्यधिक निर्भरता से रणनीतिक विविधीकरण की नीति अपनानी चाहिए। घरेलू तकनीकी क्षमता और वैश्विक एकीकरण के बीच संतुलन स्थापित करके ही भारत ऐसी विनिर्माण अर्थव्यवस्था विकसित कर सकता है जो आत्मनिर्भर भी हो और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी भी।
