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Daily-current-affairs / 18 Aug 2026

गोबरधन (GOBARdhan): अपशिष्ट प्रबंधन से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा

गोबरधन (GOBARdhan): अपशिष्ट प्रबंधन से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा

संदर्भ:

हाल ही में, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने गोबरधन (GOBARdhan- Galvanising Organic Bio-Agro Resources Dhan) राष्ट्रीय सर्कुलर बायोएनर्जी योजना को मंजूरी दी। इसके लिए वित्त वर्ष 2026-36 तक 10 वर्षों के लिए ₹23,731 करोड़ का प्रावधान किया गया है। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय (MoPNG) द्वारा कार्यान्वित की जाने वाली इस योजना का उद्देश्य घरेलू कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) उत्पादन को लगभग दस गुना बढ़ाना और बड़े पैमाने पर निजी निवेश आकर्षित करना है। इसका लक्ष्य उन प्रमुख चुनौतियों का समाधान करना है, जिन्होंने कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) के व्यावसायिक विकास को सीमित किया है, जिनमें अनिश्चित मांग, उच्च पूंजी लागत, कमजोर फीडस्टॉक आपूर्ति श्रृंखला और अपर्याप्त बुनियादी ढाँचा शामिल हैं।

गोबरधन (GOBARdhan): अपशिष्ट प्रबंधन से ऊर्जा सुरक्षा:

      • गोबरधन (GOBARdhan) को मूल रूप से 2018 में स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के तहत ग्रामीण अपशिष्ट प्रबंधन पहल के रूप में शुरू किया गया था। इसका प्रारंभिक उद्देश्य पशुओं के गोबर और जैविक कचरे का वैज्ञानिक प्रबंधन करना तथा उन्हें बायोगैस और खाद जैसे उपयोगी उत्पादों में परिवर्तित करना था।
      • समय के साथ इस कार्यक्रम का महत्व काफी व्यापक हो गया। कृषि अवशेष, पशुओं का गोबर, प्रेसमड, खाद्य अपशिष्ट और अन्य जैविक पदार्थों को केवल कचरे के रूप में नहीं, बल्कि अक्षय ऊर्जा और कृषि उपयोगी संसाधनों के संभावित स्रोत के रूप में देखा जाने लगा।
      • नवीनतम योजना इस विकास के अगले चरण का प्रतिनिधित्व करती है। इसका उद्देश्य अपशिष्ट प्रबंधन को ऊर्जा सुरक्षा, ग्रामीण आय, स्वच्छ ईंधन उत्पादन और सर्कुलर अर्थव्यवस्था के साथ एकीकृत करना है।

कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) बायोगैस कैसे अलग है?

      • बायोगैस तब उत्पन्न होती है जब जैविक पदार्थ ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में विघटित होते हैं। इसमें सामान्यतः लगभग 55-65% मीथेन होती है, साथ ही कार्बन डाइऑक्साइड और हाइड्रोजन सल्फाइड, नाइट्रोजन तथा अमोनिया जैसी अन्य गैसों की थोड़ी मात्रा होती है। अपने कच्चे रूप में बायोगैस का उपयोग खाना पकाने, प्रकाश व्यवस्था, बिजली उत्पादन और कुछ यांत्रिक कार्यों के लिए किया जा सकता है।
      • हालाँकि, जब बायोगैस को शुद्ध और अपग्रेड करके उसमें मीथेन की मात्रा को काफी बढ़ाया जाता है तथा फिर उच्च दबाव पर संपीड़ित किया जाता है, तो यह कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) बन जाती है। CBG के गुण और ऊर्जा क्षमता कंप्रेस्ड नेचुरल गैस (CNG) के समान होते हैं। इससे इसका उपयोग परिवहन, उद्योग और वाणिज्यिक क्षेत्रों में किया जा सकता है तथा इसे मौजूदा गैस बुनियादी ढाँचे में भी शामिल किया जा सकता है।
      • बायोगैस कच्चा उत्पाद है, जबकि CBG शुद्ध और संपीड़ित बायोगैस है, जिसे व्यापक वाणिज्यिक ईंधन उपयोग के लिए तैयार किया जाता है।

GOBARdhan Scheme 2026

CBG संयंत्र की क्रियाविधि:

      • CBG संयंत्र का आधार अवायवीय पाचन (Anaerobic Digestion) है, जिसमें सूक्ष्मजीव ऑक्सीजन के बिना एक बंद वातावरण में जैविक पदार्थों को विघटित करते हैं।
      • यह प्रक्रिया व्यापक रूप से चार चरणों में होती है। हाइड्रोलिसिस में जटिल जैविक पदार्थ सरल अणुओं में टूटते हैं। एसिडोजेनेसिस के दौरान ये अणु वाष्पशील वसीय अम्लों में परिवर्तित होते हैं। इसके बाद एसीटोजेनेसिस में एसिटिक अम्ल, कार्बन डाइऑक्साइड और हाइड्रोजन जैसे यौगिक बनते हैं। अंत में, मेथेनोजेनेसिस के माध्यम से मीथेन-समृद्ध बायोगैस का उत्पादन होता है।
      • इसके बाद कच्ची बायोगैस को अशुद्धियों को हटाने और मीथेन की मात्रा बढ़ाने के लिए शुद्ध किया जाता है। इसके बाद इसे संपीड़ित करके CBG के रूप में आपूर्ति की जा सकती है। इस प्रक्रिया से डाइजेस्टेट भी उत्पन्न होता है, जिसे फर्मेंटेड ऑर्गेनिक मैन्योर (FOM) में संसाधित किया जा सकता है। इस प्रकार, एक CBG संयंत्र स्वच्छ ईंधन और कृषि पोषक तत्व, दोनों का उत्पादन कर सकता है।

भारत के लिए CBG का रणनीतिक महत्व:

      • CBG का रणनीतिक महत्व इसलिए है क्योंकि भारत अभी भी प्राकृतिक गैस के आयात पर काफी हद तक निर्भर है। घरेलू CBG उत्पादन का विस्तार आयातित जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता को कम करने और अंतरराष्ट्रीय कीमतों तथा आपूर्ति में होने वाले व्यवधानों के प्रति ऊर्जा प्रणाली को अधिक लचीला बनाने में मदद कर सकता है।
      • CBG परिवहन, घरेलू उपयोग, उद्योग और वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों के लिए नवीकरणीय गैस का एक घरेलू स्रोत भी उपलब्ध कराता है। चूँकि शुद्ध CBG रासायनिक रूप से प्राकृतिक गैस के समान है, इसलिए इसे देश के विस्तारित हो रहे गैस बुनियादी ढाँचे में संभावित रूप से उपयोग किया जा सकता है।
      • इसलिए इसका महत्व केवल जलवायु नीति तक सीमित नहीं है। CBG एक साथ ऊर्जा सुरक्षा, आयात में कमी, अपशिष्ट प्रबंधन और ग्रामीण आर्थिक विकास में योगदान दे सकता है।

वास्तविक चुनौती : CBG को व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य बनाना:

      • भारत के पास पर्याप्त मात्रा में बायोमास संसाधन हैं, लेकिन CBG क्षेत्र को ऐतिहासिक रूप से कई व्यावसायिक बाधाओं का सामना करना पड़ा है। फीडस्टॉक अक्सर ग्रामीण क्षेत्रों में बिखरा हुआ होता है और इसकी उपलब्धता मौसमी हो सकती है। इसलिए कृषि अवशेषों और पशुओं के गोबर को एकत्र करना और उनका परिवहन महँगा हो सकता है। CBG संयंत्रों के लिए पर्याप्त प्रारंभिक पूंजी की आवश्यकता होती है, जबकि अनिश्चित ऑफटेक ने निवेशकों को सतर्क बनाए रखा है।
      • नया गोबरधन ढाँचा फीडस्टॉक, उत्पादन, वित्तपोषण, मूल्य निर्धारण, ऑफटेक और बुनियादी ढाँचे को शामिल करने वाली एक एकीकृत व्यवस्था के माध्यम से इन कमजोरियों को दूर करने का प्रयास करता है। यह CBG को केवल एक तकनीक या पायलट परियोजना के रूप में देखने से आगे बढ़कर इसे एक बैंक योग्य ऊर्जा उद्योग के रूप में विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव है।

नई योजना के विकास के छह प्रमुख आधार:

बायोएनर्जी परियोजनाओं से जुड़े बाजार और परिचालन जोखिमों को कम करने के लिए गोबरधन योजना छह आपस में जुड़े हुए नीतिगत आधारों पर निर्मित है:

      • सुनिश्चित CBG ऑफटेक ढाँचा: वाणिज्यिक CBG उत्पादन के सामने सबसे महत्वपूर्ण बाधाओं में से एक बाजार में अनिश्चितता रही है। इसे दूर करने के लिए योजना में एक अनिवार्य ब्लेंडिंग व्यवस्था शुरू की गई है। वित्त वर्ष 2026-27 से 3% अनिवार्य ब्लेंडिंग दायित्व शुरू होकर वित्त वर्ष 2028-29 तक 5% हो जाएगा। इसके तहत प्राकृतिक गैस विपणन कंपनियों के लिए घरेलू CBG खरीदना अनिवार्य होगा, जिससे उत्पादित गैस के प्रत्येक अणु के लिए एक सुनिश्चित आधारभूत मांग तैयार होगी।
      • स्थिर प्रशासित मूल्य निर्धारण: पूंजी-गहन बायोएनर्जी संयंत्रों के लिए राजस्व की पूर्वानुमेयता महत्वपूर्ण है। नीति के तहत सरकार समर्थित दीर्घकालिक प्रशासित मूल्य निर्धारण ढाँचा लागू किया गया है, जिसमें CBG की कीमत ₹2,110 प्रति MMBTU (लगभग ₹105 प्रति किलोग्राम) निर्धारित की गई है और यह मूल्य 10 वर्षों तक रहेगा। इससे उत्पादकों को वैश्विक जीवाश्म ईंधन बाजारों की अत्यधिक अस्थिरता से सुरक्षा मिलेगी और स्थिर नकदी प्रवाह सुनिश्चित होगा।
      • लक्षित पूंजी सहायता: इन संयंत्रों की स्थापना की उच्च प्रारंभिक लागत को कम करने के लिए सरकार व्यापक प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता प्रदान करती है। उत्पादन क्षमता के आधार पर सब्सिडी को बढ़ाकर ₹2 करोड़ प्रति टन प्रति दिन (TPD) तक किया गया है। पूंजी सहायता के इस बड़े प्रावधान से उद्यमियों की इक्विटी आवश्यकता सीधे कम होती है और परियोजनाओं की आंतरिक प्रतिफल दर (IRR) में सुधार होता है।
      • बुनियादी ढाँचा और ग्रिड कनेक्टिविटी: यह योजना ग्रामीण उत्पादन केंद्रों और शहरी उपभोग केंद्रों के बीच मौजूद भौतिक दूरी को कम करने के लिए समर्पित धनराशि उपलब्ध कराती है। CBG संयंत्रों को मौजूदा सिटी गैस वितरण नेटवर्क से सीधे जोड़ने वाली पाइपलाइनों के निर्माण के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है, जिससे गैस को निर्बाध रूप से ग्रिड में डाला जा सके। इसके अतिरिक्त, वाणिज्यिक ऋणदाताओं के लिए ब्याज दरों को कम करने और जोखिमों को कम करने हेतु एक मजबूत क्रेडिट गारंटी व्यवस्था स्थापित की गई है।
      • फीडस्टॉक और बायोमास मैपिंग: यह समझते हुए कि बायोएनर्जी संयंत्र की विश्वसनीयता उसकी आपूर्ति श्रृंखला जितनी ही मजबूत होती है, नीति के तहत कृषि क्षेत्रों में व्यापक और तकनीक-आधारित बायोमास मैपिंग को अनिवार्य किया गया है। एक समर्पित कोष फसल अवशेषों की पहचान, संग्रहण और स्थानीय भंडारण को समर्थन प्रदान करता है, जिससे मौसमी कमी को रोका जा सके और कच्चे माल की कीमतों में स्थिरता लाई जा सके।
      • फर्मेंटेड ऑर्गेनिक मैन्योर (FOM) में मूल्य संवर्धन: अंतिम आधार बायोगैस के साथ उत्पन्न होने वाले ठोस और तरल डाइजेस्टेट का व्यावसायीकरण करने पर केंद्रित है। विशेष मूल्य संवर्धन सुविधाओं के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करके यह योजना कच्चे FOM को मानकीकृत और पोषक तत्वों से भरपूर जैविक उर्वरक में बदलने में मदद करती है। इससे संयंत्र संचालकों के लिए अतिरिक्त राजस्व का स्रोत तैयार होता है और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा मिलता है।

गोबरधन और चक्रीय अर्थव्यवस्था:

गोबरधन, CBG से आगे बढ़कर चक्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देता है, जिसमें जैविक कचरे को CBG और फर्मेंटेड ऑर्गेनिक मैन्योर (FOM) में परिवर्तित किया जाता है तथा स्वच्छ ऊर्जा और कृषि पोषक तत्व उत्पन्न होते हैं। इससे लैंडफिल पर दबाव कम किया जा सकता है, फसल अवशेष जलाने की समस्या को कम किया जा सकता है और पोषक तत्वों को वापस मिट्टी में पहुँचाया जा सकता है। इस प्रकार पर्यावरण संरक्षण को आर्थिक विकास के साथ जोड़ा जाता है।

निष्कर्ष:

CBG भारत की व्यापक अपशिष्ट-से-ऊर्जा (Waste-to-Energy) क्षमता का हिस्सा है। जहाँ अवायवीय पाचन जैव-अवक्रमणीय कचरे के लिए उपयुक्त है, वहीं इंसीनरेशन, पायरोलिसिस और गैसीफिकेशन जैसी तकनीकों के माध्यम से अन्य प्रकार के कचरे का प्रसंस्करण किया जा सकता है। गोबरधन सतत (SATAT), बाजार विकास सहायता (Market Development Assistance), बायोमास एकत्रीकरण मशीनरी (Biomass Aggregation Machinery), पाइपलाइन अवसंरचना विकास और राष्ट्रीय जैव ऊर्जा कार्यक्रम जैसी पहलों पर भी आधारित है तथा इस क्षेत्र में अधिक एकीकरण और बड़े पैमाने पर विस्तार को बढ़ावा देता है।

आगे की राह:

गोबरधन की सफलता प्रभावी कार्यान्वयन पर निर्भर करेगी, जिसमें बायोमास मैपिंग, संग्रहण, भंडारण, परिवहन, बुनियादी ढाँचा और स्थिर मूल्य निर्धारण शामिल हैं। सरकारों, किसानों, सहकारी समितियों और उद्योगों के बीच मजबूत समन्वय आवश्यक है। इसके साथ ही CBG के साथ-साथ जैविक खाद के बाजार का भी विकास होना चाहिए। क्षेत्र-विशिष्ट और विकेंद्रीकृत मॉडलों को भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। यदि इसे प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है, तो गोबरधन पशुओं के गोबर, फसल अवशेषों और जैविक कचरे को ईंधन, उर्वरक, रोजगार और आय में परिवर्तित कर सकता है तथा कचरे को एक नए चक्रीय आर्थिक तंत्र की शुरुआत में बदल सकता है।

 

Aliganj Gomti Nagar Prayagraj