संदर्भ:
हाल ही में अक्टूबर 2026 में जारी वैश्विक भुखमरी सूचकांक (Global Hunger Index- GHI) ने भारत में भूख और कुपोषण की चुनौती को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। इस सूचकांक में भारत 24.1 स्कोर के साथ 122 देशों में 100वें स्थान पर है जो ‘गंभीर’ (Serious) श्रेणी में आता है।
यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है, जब भारत खाद्यान्न उत्पादन, सार्वजनिक वितरण प्रणाली और कल्याणकारी योजनाओं के विस्तार के माध्यम से खाद्य उपलब्धता सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहा है। प्रश्न केवल यह नहीं है कि देश के पास पर्याप्त अनाज है या नहीं, बल्कि यह भी है कि प्रत्येक नागरिक को पर्याप्त, पौष्टिक और संतुलित भोजन मिल रहा है या नहीं।
वैश्विक भुखमरी सूचकांक 2026: प्रमुख निष्कर्ष
वैश्विक भुखमरी सूचकांक (GHI) एक बहुआयामी सूचकांक है, जिसे वेल्टहंगरहिल्फ़ (Welthungerhilfe), इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल लॉ ऑफ पीस एंड आर्म्ड कॉन्फ्लिक्ट (IFHV) तथा हेल्वेटास (Helvetas) संयुक्त रूप से प्रकाशित करते हैं। इसका उद्देश्य विभिन्न देशों और क्षेत्रों में भूख की स्थिति का आकलन करना तथा भूख उन्मूलन के लिए नीतिगत प्रयासों को प्रोत्साहित करना है।
GHI 2026 के अनुसार, भारत का स्कोर 24.1 है। इसकी तुलना में दक्षिण एशिया का औसत स्कोर 23.5 और वैश्विक स्कोर 18.1 है। नेपाल का स्कोर 14.5, बांग्लादेश का 19.2 और पाकिस्तान का 25.5 दर्ज किया गया है। इन आँकड़ों से पता चलता है कि दक्षिण एशिया में पोषण संबंधी चुनौतियाँ व्यापक हैं, लेकिन देशों के बीच उनकी तीव्रता में अंतर भी मौजूद है।
इस सूचकांक में भारत का 100वाँ स्थान महत्त्वपूर्ण है, किंतु केवल रैंकिंग के आधार पर पूरी तस्वीर नहीं समझी जा सकती। इसलिए भारत की वास्तविक प्रगति का आकलन करते समय उसके स्कोर, पोषण संबंधी संकेतकों और दीर्घकालिक रुझानों को भी देखना चाहिए।
वैश्विक भुखमरी सूचकांक (GHI) के चार प्रमुख संकेतक:
वैश्विक भुखमरी सूचकांक चार संकेतकों के आधार पर तैयार किया जाता है।
अल्पपोषण (Undernourishment): यह जनसंख्या के उस अनुपात को दर्शाता है जिसे पर्याप्त कैलोरी नहीं मिलती। भारत में यह दर 9.8 प्रतिशत दर्ज की गई है।
बाल अवरुद्ध विकास (Child Stunting): पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की लंबाई उनकी आयु के अनुपात में कम होना दीर्घकालिक पोषण की कमी का संकेत हो सकता है। भारत में इसकी दर 29.3 प्रतिशत है।
बाल दुबलापन (Child Wasting): बच्चों का वजन उनकी लंबाई के अनुपात में कम होना तीव्र पोषण की कमी से जुड़ा है। भारत में इसकी दर 19 प्रतिशत है, जो विशेष चिंता का विषय है।
बाल मृत्यु दर (Child Mortality): पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर अपर्याप्त पोषण, संक्रमण और स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुँच जैसी परिस्थितियों से प्रभावित हो सकती है। भारत में यह दर 2.7 प्रतिशत दर्ज की गई है।
ये आँकड़े 2026 के सूचकांक में उपयोग किए गए उपलब्ध नवीनतम संबंधित आँकड़ों पर आधारित हैं। अल्पपोषण के लिए 2023–2025, बाल दुबलेपन के लिए 2021–2025 की अवधि के उपलब्ध नवीनतम आँकड़ों तथा बाल अवरुद्ध विकास और बाल मृत्यु दर के लिए 2024 के आँकड़ों का उपयोग किया गया है। इसलिए रिपोर्ट को वर्ष 2026 में मापी गई प्रत्येक स्थिति का तत्काल चित्र नहीं समझना चाहिए।
भारत के सामने प्रमुख चुनौतियाँ:
गरीबी और आर्थिक असमानता: कमजोर आय वाले परिवारों के लिए पर्याप्त भोजन जुटाना ही कठिन हो सकता है; संतुलित और विविध आहार उपलब्ध कराना उनके लिए और अधिक चुनौतीपूर्ण है। खाद्य पदार्थों की कीमतें तथा रोजगार की अनिश्चितता भी इस स्थिति को प्रभावित करती हैं।
मातृ एवं शिशु पोषण: गर्भावस्था के दौरान अपर्याप्त पोषण, मातृ एनीमिया, जन्म के समय कम वजन और शिशु को समय पर उपयुक्त पूरक आहार नहीं मिलना बच्चों के विकास को प्रभावित कर सकता है। जीवन के शुरुआती एक हजार दिनों में पर्याप्त पोषण और उचित देखभाल विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं।
स्वच्छ पेयजल, स्वच्छता और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी: बार-बार होने वाले संक्रमणों और दस्त जैसी बीमारियों के कारण शरीर भोजन से मिलने वाले पोषक तत्त्वों का पर्याप्त उपयोग नहीं कर पाता। इस प्रकार भोजन उपलब्ध होने के बावजूद कुपोषण बना रह सकता है।
सामाजिक और क्षेत्रीय असमानताएँ: ग्रामीण तथा दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुँच, महिलाओं की पोषण संबंधी आवश्यकताओं की उपेक्षा और जागरूकता की कमी समस्या को बढ़ा सकती है। इसलिए कुपोषण का समाधान केवल खाद्यान्न वितरण नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वच्छता और सामाजिक सुरक्षा के संयुक्त प्रयासों से संभव है।
सरकारी नीतियाँ:
भारत सरकार ने खाद्य सुरक्षा और पोषण सुधार के लिए कई महत्त्वपूर्ण योजनाएँ लागू की हैं। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के अंतर्गत पात्र परिवारों को खाद्यान्न उपलब्ध कराया जाता है।
प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत लगभग 81.35 करोड़ लाभार्थियों को 1 जनवरी 2024 से पाँच वर्षों तक निःशुल्क खाद्यान्न उपलब्ध कराने का निर्णय लिया गया था। इससे कमजोर परिवारों की खाद्य उपलब्धता और आर्थिक सुरक्षा को सहारा मिलता है।
सक्षम आंगनवाड़ी एवं पोषण 2.0 के अंतर्गत छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं, स्तनपान कराने वाली माताओं और लक्षित क्षेत्रों की किशोरियों के पोषण पर ध्यान दिया जाता है। आंगनवाड़ी सेवाओं में पूरक पोषण, स्वास्थ्य शिक्षा, स्वास्थ्य जाँच और आवश्यकतानुसार रेफरल सेवाएँ शामिल हैं।
प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण (PM POSHAN) योजना विद्यालयों में बच्चों को भोजन उपलब्ध कराने का माध्यम है। वहीं, पोषण अभियान व्यवहार परिवर्तन, सामुदायिक भागीदारी और पोषण संबंधी सेवाओं के समन्वय पर बल देता है।
हालाँकि, योजनाओं का वास्तविक प्रभाव उनके क्रियान्वयन पर निर्भर करता है। लाभार्थियों तक नियमित और गुणवत्तापूर्ण सेवाएँ पहुँचाना, कुपोषित बच्चों की समय पर पहचान करना और उपचार उपलब्ध कराना आवश्यक है। इसलिए केवल वितरित खाद्यान्न या पंजीकृत लाभार्थियों की संख्या की अपेक्षा वास्तविक पोषण परिणामों का भी मूल्यांकन होना चाहिए।
वैश्विक सूचकांक की सीमाएँ और भारत का दृष्टिकोण
वैश्विक भुखमरी सूचकांक उपयोगी अंतरराष्ट्रीय तुलना उपलब्ध कराता है, किंतु इसकी सीमाओं को समझना भी आवश्यक है। इसके चार संकेतकों में से तीन पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण से संबंधित हैं। इसलिए यह सूचकांक संपूर्ण जनसंख्या की खाद्य स्थिति का प्रत्यक्ष माप नहीं है, यद्यपि इसका अल्पपोषण संकेतक पूरी जनसंख्या से संबंधित है।
भारत सरकार ने पूर्व के संस्करणों पर अपनी आपत्ति व्यक्त करते हुए GHI को देश में भूख की वास्तविक स्थिति का अपूर्ण माप बताया है। ऐसे दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए सूचकांक की कार्यप्रणाली, आँकड़ों के स्रोत और सीमाओं की समीक्षा होनी चाहिए।
हालाँकि, किसी सूचकांक की सीमाएँ उसके द्वारा सामने लाई गई समस्याओं को अनदेखा करने का आधार नहीं बन सकतीं। अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग को अंतिम सत्य मानना उचित नहीं है, लेकिन बाल दुबलापन, अल्पपोषण और बाल मृत्यु दर जैसे संकेतकों को गंभीरता से लेना आवश्यक है। भारत को GHI के साथ-साथ अपने राष्ट्रीय सर्वेक्षणों, स्वास्थ्य आँकड़ों और जिला-स्तरीय पोषण संकेतकों का भी उपयोग करना चाहिए।
आगे की राह:
भारत को भुखमरी की समस्या से निपटने के लिए बहुआयामी रणनीति अपनानी होगी। सार्वजनिक वितरण प्रणाली में खाद्यान्न की उपलब्धता बनाए रखते हुए दालों, मोटे अनाजों और अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थों तक पहुँच बढ़ाने के विकल्पों पर काम करना चाहिए। स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप विविध आहार को प्रोत्साहित करना आवश्यक है।
गर्भावस्था से लेकर बच्चे के जीवन के पहले एक हजार दिनों तक विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। गर्भवती महिलाओं की नियमित स्वास्थ्य जाँच, पर्याप्त मातृ पोषण, स्तनपान को प्रोत्साहन और छह माह की आयु के बाद उपयुक्त पूरक आहार से कुपोषण के जोखिम को कम किया जा सकता है।
आंगनवाड़ी केंद्रों को पर्याप्त संसाधन, प्रशिक्षित कर्मचारी और नियमित निगरानी उपलब्ध कराई जानी चाहिए। बच्चों के वजन और लंबाई की समयबद्ध जाँच करके कुपोषण की पहचान तथा उपचार सुनिश्चित करना आवश्यक है।
स्वच्छ पेयजल, स्वच्छता, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं और पोषण कार्यक्रमों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया जाए। स्थानीय निकायों, स्वयं सहायता समूहों और समुदायों की भागीदारी से योजनाओं की जवाबदेही बढ़ाई जा सकती है।
पोषण संबंधी नीतियों का मूल्यांकन केवल बजट और लाभार्थियों की संख्या के आधार पर नहीं, बल्कि बच्चों के स्वास्थ्य, आहार विविधता, एनीमिया में कमी और कुपोषण की दरों में सुधार के आधार पर किया जाना चाहिए। इसके लिए विश्वसनीय, नियमित और तुलनीय आँकड़ों की उपलब्धता आवश्यक है।
निष्कर्ष:
वैश्विक भुखमरी सूचकांक 2026 भारत को खाद्य सुरक्षा से आगे बढ़कर व्यापक पोषण सुरक्षा पर ध्यान देने का अवसर प्रदान करता है। देश ने खाद्यान्न वितरण और कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से बड़ी आबादी की भोजन संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के प्रयास किए हैं, लेकिन पोषण की गुणवत्ता, मातृ-शिशु स्वास्थ्य और क्षेत्रीय असमानताओं से जुड़ी चुनौतियाँ अभी भी महत्त्वपूर्ण हैं।
भारत की प्रगति का आकलन केवल अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग से नहीं, बल्कि बच्चों के स्वस्थ विकास, महिलाओं के बेहतर पोषण और परिवारों की पौष्टिक भोजन तक पहुँच से किया जाना चाहिए। सतत विकास लक्ष्य-2 यानी ‘शून्य भुखमरी’ की प्राप्ति के लिए खाद्य उपलब्धता, पोषण, स्वास्थ्य, स्वच्छता और सामाजिक सुरक्षा को एकीकृत करना आवश्यक है। यही दृष्टिकोण भारत को अधिक स्वस्थ, सक्षम और समावेशी समाज की दिशा में आगे बढ़ा सकता है।
