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Daily-current-affairs / 19 Sep 2026

ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स 2026 और भारत: शिक्षा से आर्थिक सशक्तीकरण तक की चुनौती

ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स 2026 और भारत: शिक्षा से आर्थिक सशक्तीकरण तक की चुनौती

संदर्भ:

हाल ही में, विश्व आर्थिक मंच (WEF) ने ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स 2026 जारी की। भारत 145 अर्थव्यवस्थाओं में 131वें स्थान पर है जबकि आइसलैंड, फिनलैंड और नॉर्वे शीर्ष तीन स्थान पर हैं। वैश्विक स्तर पर, लैंगिक अंतर का 69.2% समाप्त हो चुका है, लेकिन विश्व आर्थिक मंच का अनुमान है कि वर्तमान गति से पूर्ण लैंगिक समानता प्राप्त करने में अभी भी लगभग 120 वर्ष लग सकते हैं।

      • वर्ष 2006 से जारी यह सूचकांक महिलाओं और पुरुषों के बीच उपलब्ध अवसरों तथा परिणामों के अंतर को चार प्रमुख आयामों, आर्थिक भागीदारी एवं अवसर, शैक्षिक उपलब्धि, स्वास्थ्य एवं उत्तरजीविता तथा राजनीतिक सशक्तीकरण के आधार पर मापता है।
      • भारत 131वें स्थान पर है और उसका समग्र लैंगिक समानता स्कोर 64.5% रहा। यद्यपि 2006 की तुलना में भारत के स्कोर में 4.3 प्रतिशत अंकों का सुधार हुआ है, लेकिन भारत की स्थिति यह संकेत देती है कि शिक्षा में हुई प्रगति को आर्थिक अवसरों, नेतृत्व और निर्णय-निर्माण में समान भागीदारी में बदलना अभी भी एक बड़ी चुनौती है।

ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स 2026 में भारत की वास्तविक स्थिति:

भारत का प्रदर्शन चारों आयामों में समान नहीं है। यही इस सूचकांक का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है।

      • शिक्षा:
        • भारत ने शैक्षिक उपलब्धि में 96.6% लैंगिक समानता हासिल की है। माध्यमिक और उच्च शिक्षा में नामांकन के स्तर पर भारत लगभग पूर्ण समानता तक पहुँच चुका है। हालांकि, वयस्क साक्षरता में लैंगिक अंतर अभी भी मौजूद है, जहाँ समानता का स्तर 82.5% है।
        • यह भारत के विकास की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। पिछले दशकों में बालिका शिक्षा, विद्यालयी नामांकन, छात्रवृत्ति, मध्याह्न भोजन, स्वच्छता सुविधाओं और सामाजिक जागरूकता जैसे उपायों ने लड़कियों की शिक्षा तक पहुँच बढ़ाई है।
        • लेकिन समस्या यह है कि शिक्षा में समानता अपने आप आर्थिक समानता में परिवर्तित नहीं होती। यदि एक महिला शिक्षित होने के बावजूद रोजगार क्षेत्र में प्रवेश या नेतृत्व के पदों तक नहीं पहुँचती, तो शिक्षा का मानव पूंजी के रूप में पूरा लाभ अर्थव्यवस्था को नहीं मिल पाता। इसलिए भारत के लिए अगली चुनौती केवल बालिका को स्कूल तक पहुँचानेकी नहीं, बल्कि शिक्षा से रोजगार और रोजगार से नेतृत्व तककी पूरी श्रृंखला बनाने की है।
      • आर्थिक भागीदारी:
        • भारत का आर्थिक भागीदारी और अवसर (Economic Participation and Opportunity) स्कोर केवल 41.2% है। महिला श्रमबल भागीदारी में लैंगिक समानता का स्तर 44.1% रहा। वहीं पेशेवर एवं तकनीकी क्षेत्रों में महिलाओं की हिस्सेदारी से संबंधित समानता 2006 के 26.6% से बढ़कर 2026 में 49.9% हुई है। इसके विपरीत विधायक, वरिष्ठ अधिकारी और प्रबंधकीय पदों पर महिलाओं की समानता केवल 13.1% है। यह आँकड़ा भारत की मूल समस्या को स्पष्ट करता है कि महिलाओं की शिक्षा बढ़ रही है, लेकिन रोजगार और नेतृत्व में उसका समान रूपांतरण नहीं हो रहा है। इसलिए महिला रोजगार को केवल सामाजिक न्याय के प्रश्न के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। यह आर्थिक विकास, उत्पादकता और जनसांख्यिकीय लाभांश से भी जुड़ा विषय है।
      • स्वास्थ्य:
        • भारत ने स्वास्थ्य एवं उत्तरजीविता के क्षेत्र में 95.6% समानता दर्ज की है। यह अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति को दर्शाता है। फिर भी जन्म के समय लिंगानुपात से संबंधित अंतर यह बताता है कि स्वास्थ्य संबंधी समानता को केवल स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता से नहीं समझा जा सकता। भारत में महिलाओं के स्वास्थ्य पर पोषण, मातृ स्वास्थ्य, किशोरियों में एनीमिया, स्वच्छता, प्रजनन स्वास्थ्य तथा सामाजिक मान्यताओं का प्रभाव पड़ता है। अतः लैंगिक समानता के लिए स्वास्थ्य नीति को केवल मातृत्व-केंद्रित दृष्टिकोण से आगे बढ़ाकर पूरे जीवन-चक्र आधारित महिला स्वास्थ्य नीति में बदलना आवश्यक है।
      • राजनीतिक सशक्तीकरण:
        • राजनीतिक सशक्तीकरण के क्षेत्र में भारत का स्कोर 24.5% है और इस उप-सूचकांक में भारत की वैश्विक रैंक 67वीं है। संसद में महिलाओं की समानता का स्तर 16.1% और मंत्री स्तर पर 5.9% रहा। यहाँ भी केवल संख्या पर्याप्त नहीं है। वास्तविक राजनीतिक सशक्तीकरण का अर्थ है- प्रतिनिधित्व, निर्णय लेने की शक्ति, नेतृत्व के अवसर और नीति-निर्माण में प्रभाव।
        • स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण ने जमीनी स्तर पर राजनीतिक भागीदारी का आधार व्यापक किया है। इसके बावजूद उच्च स्तर की राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व सीमित है। इस संदर्भ में नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 महत्वपूर्ण है, जिसने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण का संवैधानिक प्रावधान किया है। हालांकि इसका वास्तविक क्रियान्वयन परिसीमन एवं संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। राजनीतिक सशक्तीकरण के लिए केवल संवैधानिक प्रावधान नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों की आंतरिक संरचना, चुनावी वित्त, नेतृत्व प्रशिक्षण और सामाजिक स्वीकृति भी महत्वपूर्ण हैं।

ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स 2026

भारत की वर्तमान स्थिति के प्रमुख कारण:

      • सामाजिक-सांस्कृतिक मान्यताएँ: भारतीय समाज के कई हिस्सों में महिलाओं से घरेलू कार्य और देखभाल की प्राथमिक जिम्मेदारी की अपेक्षा की जाती है। इससे उनके शिक्षा, रोजगार और करियर की निरंतरता प्रभावित होती है।
      • अवैतनिक देखभाल कार्य: महिलाएँ घरेलू कार्य, बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल और अन्य अवैतनिक देखभाल कार्य में पुरुषों की तुलना में अधिक समय देती हैं। इसका सीधा प्रभाव उनके रोजगार विकल्पों पर पड़ता है।
      • शिक्षा और रोजगार के बीच अंतर: भारत ने लड़कियों के विद्यालय और उच्च शिक्षा में प्रवेश को बढ़ाया है, लेकिन शिक्षा के बाद पर्याप्त संख्या में महिलाओं का श्रम बाजार में प्रवेश और लंबे समय तक बने रहना अभी चुनौती है।
      • रोजगार की प्रकृति: ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं का बड़ा हिस्सा कृषि एवं अनौपचारिक क्षेत्र से जुड़ा है। ऐसे रोजगार में आय, सामाजिक सुरक्षा और कार्यस्थल सुरक्षा की समस्याएँ अधिक हो सकती हैं।
      • नेतृत्व का अभाव: पेशेवर एवं तकनीकी क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ने के बावजूद वरिष्ठ प्रबंधन और निर्णयकारी पदों पर उनका प्रतिनिधित्व बहुत कम है।

लैंगिक समानता के लिए प्रमुख पहलें:

      • बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ: बालिकाओं की शिक्षा, सुरक्षा और घटते बाल लिंगानुपात की समस्या से निपटने पर जोर देता है।
      • प्रधानमंत्री मुद्रा योजना: महिलाओं को छोटे एवं सूक्ष्म उद्यम शुरू करने के लिए ऋण उपलब्ध कराती है।
      • स्टैंड-अप इंडिया: महिला उद्यमियों को ग्रीनफील्ड उद्यम स्थापित करने के लिए संस्थागत ऋण की सुविधा देता है।
      • दीनदयाल अंत्योदय योजना राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM): स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को आजीविका, वित्तीय समावेशन और स्वरोजगार से जोड़ता है।
      • मातृत्व संबंधी श्रम सुरक्षा: मातृत्व अवकाश और रोजगार संबंधी सुरक्षा के माध्यम से महिला श्रमिकों के अधिकारों को मजबूत करती है।

आगे की राह:

भारत को लैंगिक समानता के लिए शिक्षा से रोजगार और रोजगार से नेतृत्व तक की पूरी श्रृंखला मजबूत करनी होगी। महिलाओं के कौशल विकास, STEM, AI और डिजिटल अर्थव्यवस्था में भागीदारी बढ़ाने के साथ सुरक्षित एवं लचीले रोजगार अवसर उपलब्ध कराने आवश्यक हैं। क्रेच, डे-केयर और देखभाल सेवाओं के विस्तार से महिलाओं पर घरेलू कार्य का बोझ कम किया जा सकता है। महिला उद्यमिता को ऋण के साथ बाजार, तकनीक और प्रशिक्षण से जोड़ना होगा। संपत्ति स्वामित्व और वित्तीय समावेशन बढ़ाने के साथ राजनीतिक संस्थाओं में महिलाओं की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करना भी आवश्यक है।  

निष्कर्ष:

      • भारत के लिए वैश्विक लैंगिक अंतर सूचकांक का वास्तविक संकेत यह है कि भारत ने शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन उस प्रगति को आर्थिक स्वतंत्रता, रोजगार, नेतृत्व और निर्णय-निर्माण में समान अवसरों में बदलने की गति अभी अपर्याप्त है। भारत में महिलाओं को लाभार्थी के रूप में देखने कि अपेक्षा आर्थिक गतिविधि, उद्यमिता, विज्ञान, तकनीक, प्रशासन और राजनीति में समान भागीदार और निर्णयकर्ता के रूप में स्थापित करना होगा।
      • अंततः लैंगिक समानता केवल महिलाओं का मुद्दा नहीं है। यह समान अवसर, सामाजिक न्याय, मानव पूंजी, उत्पादकता और समावेशी विकास का प्रश्न है। भारत यदि अपने जनसांख्यिकीय लाभांश को वास्तविक आर्थिक शक्ति में बदलना चाहता है, तो महिलाओं की प्रतिभा और श्रमशक्ति का पूर्ण उपयोग उसकी विकास रणनीति का केंद्रीय तत्व होना चाहिए।

 

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