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Daily-current-affairs / 02 Jun 2026

वैश्विक वन लक्ष्य रिपोर्ट 2026 : जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा गरीबी और सतत विकास के बीच वनों का भविष्य

वैश्विक वन लक्ष्य रिपोर्ट 2026 : जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा गरीबी और सतत विकास के बीच वनों का भविष्य

संदर्भ:

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी ग्लोबल फॉरेस्ट गोल्स रिपोर्ट 2026 ने विश्व को वनों की बिगड़ती स्थिति के प्रति आगाह किया है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2015 से 2025 के बीच वैश्विक वन क्षेत्र में लगभग 4 करोड़ हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई है। रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि कृषि विस्तार के अतिरिक्त अब ईंधन लकड़ी (Fuelwood) और चारकोल की बढ़ती मांग भी वन क्षरण का प्रमुख कारण बनती जा रही है, विशेषकर अफ्रीका और एशिया के विकासशील क्षेत्रों में।

      • यह निष्कर्ष ऐसे समय में सामने आया है जब विश्व जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता संरक्षण और सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) की प्राप्ति के लिए वनों को सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों में से एक मान रहा है। भारत सहित विश्व के अधिकांश देशों के लिए यह रिपोर्ट केवल पर्यावरणीय चिंता नहीं बल्कि विकास, ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और सामाजिक न्याय से जुड़ा एक व्यापक नीति दस्तावेज है।

ग्लोबल फॉरेस्ट गोल्स रिपोर्ट 2026:

      • यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र आर्थिक एवं सामाजिक मामलों के विभाग (UNDESA) तथा संयुक्त राष्ट्र वन मंच (United Nations Forum on Forests-UNFF) द्वारा तैयार की जाती है। इसका उद्देश्य वर्ष 2017-2030 के लिए निर्धारित संयुक्त राष्ट्र रणनीतिक वन योजना (UN Strategic Plan for Forests) के अंतर्गत निर्धारित छह वैश्विक वन लक्ष्यों और 26 उप-लक्ष्यों की प्रगति का आकलन करना है।
      • इन लक्ष्यों का उद्देश्य विश्वभर में वन क्षेत्र का संरक्षण, पुनर्स्थापन, सतत प्रबंधन तथा वनों के माध्यम से जलवायु परिवर्तन और गरीबी जैसी वैश्विक चुनौतियों का समाधान करना है।

रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष:

      • वैश्विक वन क्षेत्र में लगातार गिरावट: रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2015 में विश्व का कुल वन क्षेत्र 4.18 अरब हेक्टेयर था, जो 2025 में घटकर 4.14 अरब हेक्टेयर रह गया। अर्थात एक दशक में लगभग 4 करोड़ हेक्टेयर वन क्षेत्र समाप्त हो गया। यह गिरावट वैश्विक स्तर पर वन संरक्षण प्रयासों की सीमाओं को दर्शाती है।
      • प्राथमिक वनों का तेजी से क्षरण: विश्व ने 2015-2025 के बीच लगभग 1.6 करोड़ हेक्टेयर प्राथमिक वन खो दिए। प्राथमिक वन वे प्राकृतिक वन होते हैं जिनमें मानवीय हस्तक्षेप अत्यंत सीमित होता है। ये वन जैव विविधता, जल संरक्षण तथा कार्बन भंडारण के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। दक्षिण अमेरिका में इन वनों का सर्वाधिक नुकसान हुआ है।
      • कृषि विस्तार अभी भी सबसे बड़ा कारण: वनों को कृषि भूमि में परिवर्तित करना वैश्विक स्तर पर वनों की कटाई का सबसे बड़ा कारण बना हुआ है। खाद्य उत्पादन की बढ़ती मांग तथा व्यावसायिक कृषि गतिविधियों ने बड़े पैमाने पर वन क्षेत्रों को प्रभावित किया है।
      • ईंधन लकड़ी और चारकोल की बढ़ती मांग: रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि ऊर्जा गरीबी के कारण विकासशील देशों में लाखों परिवार आज भी ईंधन लकड़ी और चारकोल पर निर्भर हैं। परिणामस्वरूप वन संसाधनों पर भारी दबाव बढ़ रहा है। यह स्थिति विशेष रूप से उप-सहारा अफ्रीका तथा एशिया के कुछ क्षेत्रों में अधिक गंभीर है।
      • जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव: सूखा, हीटवेव, जंगलों में आग, कीट संक्रमण तथा वन रोगों की बढ़ती घटनाएं वन पारिस्थितिक तंत्र को कमजोर कर रही हैं। इससे वन कार्बन सिंक के रूप में अपनी क्षमता खो रहे हैं।
      • वन बहाली की धीमी प्रगति: 91 देशों ने लगभग 19 करोड़ हेक्टेयर वन क्षेत्र के पुनर्स्थापन का संकल्प लिया था, किंतु 2025 तक केवल 4.4 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र ही बहाल किया जा सका। यह दर्शाता है कि वैश्विक स्तर पर वन बहाली की गति अभी भी अपेक्षित स्तर से काफी कम है।

Global Forest Goals Report 2026

ऊर्जा गरीबी और वन संकट : नया दृष्टिकोण

      • ग्लोबल फॉरेस्ट गोल्स रिपोर्ट 2026 की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह वन क्षरण को केवल पर्यावरणीय समस्या के रूप में नहीं देखती, बल्कि इसे ऊर्जा और गरीबी के प्रश्न से जोड़ती है।
      • दुनिया के अनेक गरीब समुदाय आज भी खाना पकाने और घरेलू ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए लकड़ी पर निर्भर हैं। ऐसी स्थिति में वन संरक्षण संबंधी कानून तब तक पूर्णतः प्रभावी नहीं हो सकते जब तक लोगों को वैकल्पिक स्वच्छ ऊर्जा उपलब्ध नहीं कराई जाती।
      • इसलिए स्वच्छ ऊर्जा तक पहुंच, एलपीजी, बायोगैस, सौर ऊर्जा और स्वच्छ खाना पकाने की तकनीकों का प्रसार वास्तव में वन संरक्षण का भी एक महत्वपूर्ण उपाय है। यह दृष्टिकोण सतत विकास लक्ष्यों के एकीकृत स्वरूप को दर्शाता है।

वन संरक्षण और जलवायु परिवर्तन का संबंध:

      • वन वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर पृथ्वी के तापमान को नियंत्रित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अनुमान है कि वैश्विक वन मानव गतिविधियों से उत्सर्जित कार्बन का लगभग एक-तिहाई भाग अवशोषित करते हैं।
      • लेकिन जब वन नष्ट होते हैं, तो दोहरा नुकसान होता है। इसलिए वन संरक्षण को जलवायु परिवर्तन शमन (Climate Mitigation) की सबसे प्रभावी प्राकृतिक रणनीतियों में से एक माना जाता है।

भारत के लिए निहितार्थ:

भारत विश्व के उन देशों में शामिल है जिन्होंने वन संरक्षण और पर्यावरणीय प्रतिबद्धताओं के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया है। भारत ने राष्ट्रीय स्तर पर 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य घोषित किया है तथा अतिरिक्त कार्बन सिंक निर्माण के लिए वन क्षेत्र और वृक्ष आवरण बढ़ाने पर बल दिया है।

भारत की प्रमुख पहलें:

      • हरित भारत मिशन (Green India Mission)वर्ष 2014 में राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (NAPCC) के अंतर्गत शुरू किया गया। इसका उद्देश्य जलवायु परिवर्तन से निपटने हेतु वन एवं वृक्ष आच्छादन बढ़ाना तथा पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करना है।
      • राष्ट्रीय वनीकरण कार्यक्रम (National Afforestation Programme)वर्ष 2000 में प्रारंभ किया गया। इसका उद्देश्य क्षतिग्रस्त एवं अवनत वन क्षेत्रों का पुनर्वास तथा संयुक्त वन प्रबंधन समितियों के माध्यम से सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा देना है।
      • CAMPA निधि (Compensatory Afforestation Fund Management and Planning Authority)इसकी अवधारणा 2002 में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद विकसित हुई तथा प्रतिपूरक वनीकरण निधि अधिनियम (CAF Act), 2016 के माध्यम से इसे वैधानिक आधार मिला। वन भूमि के गैर-वन उपयोग के बदले प्राप्त राशि का उपयोग वनीकरण और वन संरक्षण कार्यों के लिए किया जाता है।
      • वन संरक्षण अधिनियम (Forest Conservation Act)वर्ष 1980 में लागू किया गया था। इसका उद्देश्य वन भूमि को गैर-वन उद्देश्यों में परिवर्तित करने पर नियंत्रण स्थापित कर वनों के संरक्षण को सुनिश्चित करना है। वर्ष 2023 में इसमें महत्वपूर्ण संशोधन भी किए गए।
      • भूमि क्षरण तटस्थता (Land Degradation Neutrality-LDN) लक्ष्य भारत ने वर्ष 2019 में संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम अभिसमय (UNCCD) के तहत 2030 तक भूमि क्षरण तटस्थता प्राप्त करने का लक्ष्य घोषित किया। इसका उद्देश्य भूमि क्षरण को रोकते हुए क्षतिग्रस्त भूमि का पुनर्स्थापन करना है।
      • मिशन LiFE (Lifestyle for Environment) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा वर्ष 2021 में COP-26 (ग्लासगो) में इसकी अवधारणा प्रस्तुत की गई तथा वर्ष 2022 में इसे औपचारिक रूप से लॉन्च किया गया। इसका उद्देश्य पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली और टिकाऊ उपभोग व्यवहार को बढ़ावा देना है।

भारत के नवीनतम वन सर्वेक्षणों के अनुसार देश का वन एवं वृक्ष आच्छादन धीरे-धीरे बढ़ रहा है, लेकिन वन गुणवत्ता, जैव विविधता संरक्षण तथा प्राकृतिक वनों की सुरक्षा अभी भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।

इसके अतिरिक्त भारत के अनेक ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में ईंधन लकड़ी पर निर्भरता आज भी देखी जाती है। ऐसे में स्वच्छ ऊर्जा कार्यक्रमों और वन संरक्षण रणनीतियों को एक-दूसरे से जोड़ना अत्यंत आवश्यक है।

आगे की राह:

वैश्विक वन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए केवल वृक्षारोपण पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए बहुआयामी रणनीति अपनानी होगी:

      • वनों की कटाई को रोकने हेतु कठोर नीतियां।
      • कृषि और वन प्रबंधन के बीच संतुलित भूमि उपयोग।
      • स्वच्छ ऊर्जा तक सार्वभौमिक पहुंच।
      • आदिवासी एवं स्थानीय समुदायों की भागीदारी।
      • वन बहाली कार्यक्रमों के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन।
      • जैव विविधता संरक्षण और जलवायु नीतियों का समन्वय।
      • डिफॉरेस्टेशन-फ्री सप्लाई चेन को बढ़ावा।

निष्कर्ष:

ग्लोबल फॉरेस्ट गोल्स रिपोर्ट 2026 यह स्पष्ट करती है कि वन संरक्षण केवल पर्यावरणीय दायित्व नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। वन जलवायु स्थिरता, जैव विविधता संरक्षण, जल सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और आजीविका का आधार हैं। रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि वन संकट को गरीबी, ऊर्जा, विकास और जलवायु परिवर्तन से अलग करके नहीं देखा जा सकता। भारत सहित विश्व के सामने चुनौती यह है कि विकास और पर्यावरण के बीच कृत्रिम द्वंद्व को समाप्त कर एक ऐसा मॉडल विकसित किया जाए जिसमें आर्थिक प्रगति और प्राकृतिक संरक्षण साथ-साथ आगे बढ़ सकें। 2030 के वैश्विक वन लक्ष्यों की सफलता इसी संतुलित दृष्टिकोण पर निर्भर करेगी।

Aliganj Gomti Nagar Prayagraj