सन्दर्भ:
भारतीय लोकतंत्र की शुचिता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करने में भारतीय निर्वाचन आयोग (Election Commission of India-ECI) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। हाल के महीनों में मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और अन्य निर्वाचन आयुक्तों के बीच SIR, फॉर्म 6, ईसीआईनेट (ECINet) तथा आंतरिक निर्णय-प्रक्रिया से संबंधित मतभेदों की रिपोर्ट सामने आई है। यह घटनाक्रम भारत में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव, मतदाता सूची की शुद्धता, संस्थागत पारदर्शिता और निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता जैसे व्यापक संवैधानिक प्रश्नों से जुड़ा है।
संवैधानिक ढाँचा:
संविधान के भाग XV (अनुच्छेद 324–329) में निर्वाचन संबंधी संवैधानिक व्यवस्था का प्रावधान किया गया है। अनुच्छेद 324 के तहत निर्वाचन आयोग को संसद, राज्य विधानमंडलों तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों के लिए निर्वाचक नामावलियों की तैयारी और चुनावों के संचालन का "अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण" प्रदान किया गया है।
'अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण' का अर्थ:
-
-
- सर्वोच्च न्यायालय ने मोहिंदर सिंह गिल बनाम मुख्य चुनाव आयुक्त (1978) में अनुच्छेद 324 की शक्तियों की व्यापक प्रकृति को स्पष्ट किया। आयोग के पास ऐसी परिस्थितियों में आवश्यक कदम उठाने की संवैधानिक शक्ति हो सकती है जहाँ कानून न हो; हालांकि ये शक्तियाँ असीमित नहीं हैं। जहाँ संसद या राज्य विधानमंडल ने वैध कानून बनाया है, आयोग को उसका पालन करना होगा।
- इस प्रकार अनुच्छेद 324 आयोग को चुनावी शुचिता बनाए रखने के लिए पूर्ण/अवशिष्ट शक्तियाँ (plenary/residual powers) देता है, लेकिन यह शक्ति कानून से ऊपर नहीं है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने मोहिंदर सिंह गिल बनाम मुख्य चुनाव आयुक्त (1978) में अनुच्छेद 324 की शक्तियों की व्यापक प्रकृति को स्पष्ट किया। आयोग के पास ऐसी परिस्थितियों में आवश्यक कदम उठाने की संवैधानिक शक्ति हो सकती है जहाँ कानून न हो; हालांकि ये शक्तियाँ असीमित नहीं हैं। जहाँ संसद या राज्य विधानमंडल ने वैध कानून बनाया है, आयोग को उसका पालन करना होगा।
-
आयोग की संरचना:
-
-
- अनुच्छेद 324(2) के अनुसार निर्वाचन आयोग में एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त और उतने अन्य निर्वाचन आयुक्त होंगे, जितने राष्ट्रपति समय-समय पर निर्धारित करें। इस प्रकार संविधान ने निर्वाचन आयुक्तों की संख्या निश्चित नहीं की है।
- भारत में 1950 से 1989 तक निर्वाचन आयोग मूलतः एकल-सदस्यीय निकाय था और मुख्य निर्वाचन आयुक्त इसके प्रमुख थे।
- 1989: पहली बार दो अन्य निर्वाचन आयुक्त नियुक्त किए गए।
- 1990: आयोग पुनः एकल-सदस्यीय हो गया।
- 1993: निर्वाचन आयोग को स्थायी रूप से तीन-सदस्यीय निकाय बनाया गया।
- 1989: पहली बार दो अन्य निर्वाचन आयुक्त नियुक्त किए गए।
- CEC आयोग के पदेन अध्यक्ष होते हैं, लेकिन उनके पास कोई वीटो शक्ति नहीं है। CEC और अन्य निर्वाचन आयुक्तों के मत का संस्थागत निर्णयों में समान महत्व है। बहु-सदस्यीय व्यवस्था का मूल उद्देश्य किसी एक व्यक्ति में अत्यधिक शक्ति के संकेंद्रण को रोकना और नियंत्रण और संतुलन को बनाए रखना था।
- अनुच्छेद 324(2) के अनुसार निर्वाचन आयोग में एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त और उतने अन्य निर्वाचन आयुक्त होंगे, जितने राष्ट्रपति समय-समय पर निर्धारित करें। इस प्रकार संविधान ने निर्वाचन आयुक्तों की संख्या निश्चित नहीं की है।
-
हालिया आंतरिक मतभेद:
हालिया रिपोर्टों के अनुसार, CEC और अन्य निर्वाचन आयुक्तों के बीच मतभेद मुख्यतः SIR, फॉर्म 6 और ईसीआईनेट (ECINet) से संबंधित प्रक्रियाओं पर सामने आए हैं।
-
-
- एसआईआर (SIR): विशेष गहन पुनरीक्षण का उद्देश्य मतदाता सूची से मृत, डुप्लीकेट और अपात्र प्रविष्टियों को हटाना तथा पात्र मतदाताओं को बनाए रखना है। हालांकि, दस्तावेजी सत्यापन के कारण पात्र मतदाताओं के बहिष्करण की आशंका को लेकर चिंता है।
- भौतिक सुनवाई: एसआईआर (SIR) के दौरान कई मतदाताओं को नोटिस और दस्तावेज सत्यापन से गुजरना पड़ा। सुधारों के तहत बीएलओ द्वारा घर पर दस्तावेज एकत्र करने तथा केवल असाधारण मामलों में व्यक्तिगत सुनवाई पर जोर दिया गया है। मुख्य चुनौती मतदाता सूची की शुद्धता और नागरिक सुविधा के बीच संतुलन है।
- फॉर्म 6: नए मतदाताओं के पंजीकरण से जुड़े फॉर्म 6 में अतिरिक्त घोषणा (Declaration) को लेकर सवाल उठे हैं। इसलिए इसके बदलाव को कानूनी वैधता, प्रशासनिक प्रक्रिया और मतदाता सुविधा के दृष्टिकोण से देखना आवश्यक है।
- ईसीआईनेट (ECINet): इसके केंद्रीकरण से फील्ड अधिकारियों की भूमिका को लेकर चिंता सामने आई है। ECI के अनुसार, भूमिका-आधारित पहुँच और विशेषज्ञ समीक्षा के माध्यम से जवाबदेही सुनिश्चित की जा रही है। मुद्दा डिजिटल दक्षता, कानूनी जवाबदेही और डेटा पारदर्शिता के संतुलन का है।
- एसआईआर (SIR): विशेष गहन पुनरीक्षण का उद्देश्य मतदाता सूची से मृत, डुप्लीकेट और अपात्र प्रविष्टियों को हटाना तथा पात्र मतदाताओं को बनाए रखना है। हालांकि, दस्तावेजी सत्यापन के कारण पात्र मतदाताओं के बहिष्करण की आशंका को लेकर चिंता है।
-
न्यायिक हस्तक्षेप: अनूप बरनवाल केस, 2023
-
-
- निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता के प्रश्न पर न्यायपालिका का सबसे महत्वपूर्ण हस्तक्षेप अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2023) में हुआ।
- याचिका में मुख्य प्रश्न यह था कि संविधान के अनुच्छेद 324(2) के बावजूद निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति के लिए संसद ने लंबे समय तक कोई व्यापक वैधानिक व्यवस्था क्यों नहीं बनाई।
- 2 मार्च 2023 को पाँच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान की मूल ढांचा का हिस्सा हैं और निर्वाचन आयोग को नियुक्तियों के संदर्भ में विशेष कार्यकारी नियंत्रण (exclusive executive control) से मुक्त होना चाहिए।
- जब तक संसद कानून नहीं बनाती, न्यायालय ने नियुक्ति के लिए एक अंतरिम व्यवस्था निर्धारित की:
- प्रधानमंत्री
- लोकसभा में विपक्ष के नेता
- भारत के मुख्य न्यायाधीश
- प्रधानमंत्री
- यह व्यवस्था अंतरिम थी, अर्थात संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक लागू होनी थी।
- संसद ने मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 पारित कर भारत के मुख्य न्यायाधीश के स्थान पर केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को चयन समिति में शामिल किया।
- इस प्रकार समिति में कार्यपालिका के दो सदस्य हैं। यही व्यवस्था अब फिर न्यायिक जांच के केंद्र में है।
- निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता के प्रश्न पर न्यायपालिका का सबसे महत्वपूर्ण हस्तक्षेप अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2023) में हुआ।
-
2026 का वर्तमान घटनाक्रम:
23 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट की दो-न्यायाधीशों की पीठ के बीच इस बात पर मतभेद हुआ कि 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं को संविधान पीठ के पास भेजा जाना चाहिए या नहीं। दोनों न्यायाधीशों के अलग-अलग विचार सामने आए और अंततः मामला भारत के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष उपयुक्त संविधान पीठ के गठन पर विचार के लिए भेज दिया गया। महत्वपूर्ण बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने 23 सितंबर 2026 को 2023 के कानून को असंवैधानिक घोषित नहीं किया। कानून की संवैधानिक वैधता का अंतिम निर्णय अभी लंबित है।
चुनाव सुधार समितियाँ और उनकी प्रमुख सिफारिशें:
-
-
- दिनेश गोस्वामी समिति, 1990: समिति ने निर्वाचन आयोग को अधिक स्वतंत्र और प्रभावी बनाने के लिए बहु-सदस्यीय निर्वाचन आयोग, CEC की नियुक्ति में व्यापक परामर्श, अन्य ECs की नियुक्ति में CEC की भूमिका, EPIC का विस्तार, EVM का चरणबद्ध उपयोग और बूथ कैप्चरिंग के विरुद्ध कड़े उपायों की सिफारिश की। हालांकि, इसकी सिफारिशों और अनूप बरनवाल मामले में PM–LoP–CJI वाली अंतरिम समिति को समान मानना उचित नहीं है, क्योंकि दोनों की संस्थागत संरचना अलग थी।
- तारकुंडे समिति: इस समिति ने निर्वाचन आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया को अधिक स्वतंत्र, पारदर्शी और परामर्श-आधारित बनाने पर जोर दिया। इसका मुख्य उद्देश्य नियुक्तियों में कार्यपालिका के अत्यधिक प्रभाव को कम करना था।
- विधि आयोग की 255वीं रिपोर्ट, 2015: विधि आयोग ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति में व्यापक परामर्श, सभी चुनाव आयुक्त को अधिक संस्थागत सुरक्षा, अन्य निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य चुनाव आयुक्त के समान निष्कासन सुरक्षा देने पर विचार तथा निर्वाचन आयोग के लिए अधिक स्वतंत्र प्रशासनिक ढाँचे की सिफारिश की। इन सभी सिफारिशों का व्यापक उद्देश्य निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और संस्थागत स्वायत्तता को मजबूत करना है।
- दिनेश गोस्वामी समिति, 1990: समिति ने निर्वाचन आयोग को अधिक स्वतंत्र और प्रभावी बनाने के लिए बहु-सदस्यीय निर्वाचन आयोग, CEC की नियुक्ति में व्यापक परामर्श, अन्य ECs की नियुक्ति में CEC की भूमिका, EPIC का विस्तार, EVM का चरणबद्ध उपयोग और बूथ कैप्चरिंग के विरुद्ध कड़े उपायों की सिफारिश की। हालांकि, इसकी सिफारिशों और अनूप बरनवाल मामले में PM–LoP–CJI वाली अंतरिम समिति को समान मानना उचित नहीं है, क्योंकि दोनों की संस्थागत संरचना अलग थी।
-
आगे की राह:
-
-
- निर्वाचन आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता और विश्वसनीयता को मजबूत करने के लिए नियुक्ति प्रक्रिया, संवैधानिक सुरक्षा, प्रशासनिक स्वायत्तता तथा डिजिटल प्रणालियों में सुधार आवश्यक हैं। सर्वप्रथम, 2023 की चयन समिति में कार्यपालिका के 2:1 प्रभाव को देखते हुए ऐसी संतुलित व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए, जिसमें सरकार, विपक्ष और स्वतंत्र संस्थाओं की भूमिका संतुलित हो। हालांकि, न्यायपालिका को नियुक्ति प्रक्रिया में शामिल करने से जुड़े संभावित संस्थागत प्रश्नों पर भी विचार जरूरी है।
- CEC और अन्य निर्वाचन आयुक्तों के बीच हटाने की सुरक्षा (Removal Protection) में अंतर को कम किया जाना चाहिए, ताकि आयुक्त स्वतंत्र रूप से असहमति और निर्णय व्यक्त कर सकें। साथ ही, स्वतंत्र निर्वाचन आयोग सचिवालय से प्रशासनिक, वित्तीय और परिचालन स्वायत्तता मजबूत की जा सकती है।
- ईसीआईनेट (ECINet) जैसी डिजिटल प्रणालियों का स्वतंत्र तकनीकी एवं साइबर सुरक्षा ऑडिट, डेटा सुरक्षा, एल्गोरिदमिक जवाबदेही और ऑडिट ट्रेल सुनिश्चित किया जाना चाहिए। तकनीकी दक्षता को कानूनी जवाबदेही का विकल्प नहीं बनाया जाना चाहिए।
- अंततः, SIR में मतदाता सूची की शुद्धता और मतदाता समावेशन के बीच संतुलन आवश्यक है। अपात्र नाम हटाने के साथ यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रक्रियागत कठिनाइयों के कारण कोई पात्र नागरिक अपने मताधिकार से वंचित न हो। यही लोकतांत्रिक निर्वाचन की मूल भावना है।
- निर्वाचन आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता और विश्वसनीयता को मजबूत करने के लिए नियुक्ति प्रक्रिया, संवैधानिक सुरक्षा, प्रशासनिक स्वायत्तता तथा डिजिटल प्रणालियों में सुधार आवश्यक हैं। सर्वप्रथम, 2023 की चयन समिति में कार्यपालिका के 2:1 प्रभाव को देखते हुए ऐसी संतुलित व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए, जिसमें सरकार, विपक्ष और स्वतंत्र संस्थाओं की भूमिका संतुलित हो। हालांकि, न्यायपालिका को नियुक्ति प्रक्रिया में शामिल करने से जुड़े संभावित संस्थागत प्रश्नों पर भी विचार जरूरी है।
-
निष्कर्ष:
भारत में चुनाव केवल मतदान की प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक वैधता का आधार हैं। इसलिए मतदाता सूची की शुद्धता और मतदाता के अधिकार, दोनों को समान महत्व दिया जाना चाहिए।

