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Daily-current-affairs / 22 May 2026

कोयला गैसीकरण : ऊर्जा सुरक्षा, आत्मनिर्भरता और हरित संक्रमण के बीच भारत की नई रणनीति

कोयला गैसीकरण : ऊर्जा सुरक्षा, आत्मनिर्भरता और हरित संक्रमण के बीच भारत की नई रणनीति

कोयला गैसीकरण : ऊर्जा सुरक्षा, आत्मनिर्भरता और हरित संक्रमण के बीच भारत की नई रणनीति

संदर्भ:

हाल ही में केंद्र सरकार ने ₹37,500 करोड़ की पृथ्वी की सतह के निकट पाये जाने वाले कोयला/लिग्नाइट गैसीकरण परियोजनाओं की प्रोत्साहन योजना को मंजूरी दी है। इसके साथ ही भारत ने वर्ष 2030 तक 100 मिलियन टन कोयले के गैसीकरण का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब वैश्विक ऊर्जा संकट, पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की अस्थिर कीमतें और बढ़ती आयात निर्भरता भारत के लिए गंभीर आर्थिक चुनौती बन चुकी हैं।

      • भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा कोयला उत्पादक देश है। भारत के पास विश्व के सबसे बड़े कोयला भंडारों में से एक (लगभग 401 अरब टन) और लिग्नाइट (कोयले का एक निम्न प्रकार) का लगभग 47 अरब टन भंडार है। देश के ऊर्जा मिश्रण में कोयले की हिस्सेदारी 55 प्रतिशत से अधिक है।
      • गैसीकरण प्रक्रिया द्वारा कोयले/लिग्नाइट को सिंथेटिक गैस (सिन्गैस) में परिवर्तित किया जाता है, जो घरेलू स्तर पर ईंधन और रसायनों के उत्पादन के लिए बहुउपयोगी कच्चा माल है। इसी संदर्भ में कोयला गैसीकरणको ऊर्जा सुरक्षा, औद्योगिक आत्मनिर्भरता और वैकल्पिक ईंधन अर्थव्यवस्था के नए आधार के रूप में देखा जा रहा है।

कोयला गैसीकरण:

      • कोयला गैसीकरण (Coal Gasification) एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें कोयले को सीमित ऑक्सीजन, भाप तथा उच्च तापमान के वातावरण में परिवर्तित कर सिंगैस” (Synthesis Gas या Syngas) बनाया जाता है। इस गैस में मुख्यतः कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोजन होती है।
      • इस सिंगैस का उपयोग अनेक औद्योगिक उत्पादों के निर्माण में किया जा सकता है, जैसे-
        • मेथनॉल
        • अमोनिया
        • यूरिया
        • सिंथेटिक प्राकृतिक गैस (SNG)
        • हाइड्रोजन
        • पेट्रोकेमिकल उत्पाद
      • अर्थात् कोयला केवल विद्युत् उत्पादन तक सीमित न रहकर रसायन और ईंधन उद्योग का भी आधार बन सकता है।

कोयला गैसीकरण की महत्ता:

      • ऊर्जा सुरक्षा की आवश्यकता:
        • भारत अपनी कुल कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 85% तथा प्राकृतिक गैस का बड़ा हिस्सा आयात करता है। इसके अतिरिक्त मेथनॉल, अमोनिया और उर्वरकों के लिए भी विदेशों पर निर्भरता बनी हुई है।
        • वैश्विक स्तर पर किसी भी भू-राजनीतिक संकट का सीधा प्रभाव भारत की ऊर्जा लागत पर पड़ता है। रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया संकट ने यह स्पष्ट कर दिया कि आयात-आधारित ऊर्जा व्यवस्था लंबे समय तक टिकाऊ नहीं हो सकती।
        • ऐसे में भारत अपने विशाल घरेलू कोयला भंडार का वैकल्पिक और अधिक उपयोगी तरीके से इस्तेमाल करना चाहता है। कोयला गैसीकरण इस दिशा में महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है।
      • आयात व्यय में कमी: वित्त वर्ष 2025 में एलएनजी, यूरिया, अमोनियम नाइट्रेट, अमोनिया, कोकिंग कोल, मेथनॉल, डीएमई और अन्य प्रमुख प्रतिस्थापन योग्य उत्पादों में भारत का आयात व्यय लगभग 2.77 लाख करोड़ रुपये रहा। यदि कोयले से ही गैस, मेथनॉल और उर्वरक बनाए जाएंगे तो:
        • LNG आयात कम होगा,
        • मेथनॉल आयात घटेगा,
        • उर्वरक उद्योग को घरेलू कच्चा माल मिलेगा।
        • अनुमान है कि इससे भारत को प्रतिवर्ष अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा बचत हो सकती है।
      • आत्मनिर्भर भारत और औद्योगिक विकास: सरकार अब कोयले को केवल ईंधननहीं, बल्कि फीडस्टॉकके रूप में विकसित करना चाहती है। इसका अर्थ है कि कोयले का उपयोग विद्युत् उत्पादन से आगे बढ़कर रसायन उद्योग, परिवहन ईंधन तथा हरित हाइड्रोजन क्षेत्र में भी किया जाएगा। यह नीति मेक इन इंडिया, आत्मनिर्भर भारत, राष्ट्रीय विनिर्माण नीति जैसी पहलों को भी मजबूती देती है।
      • रोजगार सृजन: इस योजना के अंतर्गत कोयला उत्पादन क्षेत्रों में स्थित 25 परियोजनाओं में लगभग 50 हजार (प्रत्यक्ष + अप्रत्यक्ष) रोजगार उत्पन्न होने का अनुमान है।
      • सरकारों को राजस्व: योजना के तहत अनुमानित 75 मिलियन टन गैसीकरण में कोयला/लिग्नाइट उपयोग से सालाना 6,300 करोड़ रुपये का लाभ प्राप्त होने की उम्मीद है। साथ ही माल और सेवा कर (जीएसटी) और अन्य करों से भी राजस्व प्राप्त होगा।
      • प्रौद्योगिकी पारितंत्र: स्वदेशी प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देकर और विदेशी ईपीसी (निर्माण या औद्योगिक परियोजनाओं में इंजीनियरिंग, खरीद सामग्री और निर्माण की पूरी जिम्मेदारी के अनुबंध) ठेकेदारों पर निर्भरता कम करके भारत की घरेलू सतह के निकट स्थित कोयले की गैसीकरण क्षमता सुदृढ़ होगी।

Coal Gasification in India

संभावित लाभ:

      • कोयले का स्वच्छ एवं कुशल उपयोग: पारंपरिक कोयला दहन की तुलना में गैसीकरण अपेक्षाकृत अधिक नियंत्रित और कुशल प्रक्रिया मानी जाती है। इससे ऊर्जा दक्षता बढ़ सकती है।
      • मेथनॉल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा: भारत मेथनॉल अर्थव्यवस्था” (Methanol Economy) की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है। मेथनॉल का उपयोग:
        • परिवहन ईंधन,
        • समुद्री ईंधन,
        • रसायन उद्योग में किया जा सकता है।
        • यदि मेथनॉल घरेलू स्तर पर बनने लगे, तो आयात निर्भरता कम होगी।
      • हरित हाइड्रोजन की दिशा में कदम: सिंगैस से हाइड्रोजन भी प्राप्त की जा सकती है। भविष्य में यह भारत की हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था (Hydrogen Economy) को गति दे सकता है।
      • रोजगार और क्षेत्रीय विकास: झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल जैसे कोयला-समृद्ध राज्यों में:
        • नए उद्योग विकसित होंगे,
        • रोजगार सृजित होंगे,
        • स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी।

चुनौतियां:

हालाँकि कोयला गैसीकरण को अपेक्षाकृत बेहतर तकनीक माना जा रहा है, लेकिन इससे जुड़ी कई चुनौतियाँ भी हैं-

      • कार्बन उत्सर्जन: कोयला अंततः एक जीवाश्म ईंधन ही है। गैसीकरण प्रक्रिया में भी कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन होता है। यदि कार्बन कैप्चर उपयोग और भंडारण (Carbon Capture Utilisation and Storage- CCUS) जैसी तकनीकों का उपयोग नहीं किया गया, तो यह जलवायु लक्ष्यों के विपरीत जा सकता है। CCUS (कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण) एक अत्याधुनिक स्वच्छ तकनीक है जो औद्योगिक संयंत्रों से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड को वायुमंडल में जाने से रोकती है।
      • जल उपयोग की समस्या: गैसीकरण परियोजनाओं में भारी मात्रा में जल की आवश्यकता होती है। भारत के कई कोयला क्षेत्र पहले से ही जल संकट से जूझ रहे हैं।
      • उच्च लागत और तकनीकी चुनौती: यह अत्यधिक पूंजी-गहन तकनीक है। परियोजनाओं की स्थापना और संचालन दोनों में भारी निवेश की आवश्यकता होती है। साथ ही भारत अभी इस तकनीक में पूर्णतः आत्मनिर्भर नहीं है।
      • नवीकरणीय ऊर्जा के साथ संतुलन: भारत एक ओर सौर एवं पवन ऊर्जा को बढ़ावा दे रहा है, वहीं दूसरी ओर कोयला गैसीकरण पर निवेश बढ़ा रहा है। इसलिए नीति-निर्माताओं के सामने चुनौती यह है कि विकास और हरित संक्रमण के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए।

वैश्विक परिप्रेक्ष्य:

      • चीन विश्व में कोयला गैसीकरण का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता है। उसने कोयले से रसायन एवं गैस उत्पादन के बड़े औद्योगिक मॉडल विकसित किए हैं। दक्षिण अफ्रीका भी लंबे समय से इस तकनीक का उपयोग कर रहा है।
      • भारत अब इन देशों के अनुभवों से सीखकर अपनी ऊर्जा रणनीति को नया स्वरूप देने का प्रयास कर रहा है।

आगे की राह:

      • भारत के लिए कोयला गैसीकरण न तो केवल ऊर्जा नीति है और न ही केवल औद्योगिक परियोजना। यह संसाधनों के रणनीतिक उपयोग की व्यापक सोच का हिस्सा है।
      • हालाँकि इसकी सफलता कुछ महत्वपूर्ण बातों पर निर्भर करेगी-
        • स्वदेशी तकनीक का विकास,
        • पर्यावरणीय सुरक्षा,
        • CCUS जैसी स्वच्छ तकनीकों का उपयोग,
        • जल प्रबंधन,
        • निजी निवेश और नीति स्थिरता।
      • यदि इन चुनौतियों का समाधान किया गया, तो कोयला गैसीकरण भारत को ऊर्जा आयातक से ऊर्जा-आत्मनिर्भर राष्ट्र की दिशा में आगे बढ़ा सकता है।

निष्कर्ष:

आज विश्व ऊर्जा संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। भारत के सामने दोहरी चुनौती है- एक ओर ऊर्जा की बढ़ती मांग और दूसरी ओर जलवायु प्रतिबद्धताएँ। ऐसे में कोयला गैसीकरण विकास बनाम पर्यावरणकी बहस के बीच एक संक्रमणकारी समाधान के रूप में उभर रहा है। यह तकनीक भारत को ऊर्जा सुरक्षा, औद्योगिक आत्मनिर्भरता तथा वैकल्पिक ईंधन अर्थव्यवस्था की दिशा में नई संभावनाएँ प्रदान करती है। किंतु इसकी वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत इसे कितनी संतुलित, स्वच्छ और दीर्घकालिक रणनीति के साथ लागू करता है।

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