भूमिका:
बाल विवाह भारत की उन सामाजिक कुरीतियों में से एक है, जो कानूनी निषेध के बावजूद आज भी लाखों बच्चों, विशेषकर बालिकाओं के जीवन, स्वास्थ्य, शिक्षा और गरिमा को प्रभावित कर रही है। यह केवल एक सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि एक मानवाधिकार उल्लंघन, स्वास्थ्य संकट, लैंगिक अन्याय और विकासात्मक बाधा भी है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (2019–21) के अनुसार, 20–24 वर्ष आयु वर्ग की लगभग 23% महिलाओं का विवाह 18 वर्ष से पहले हो चुका था। यह आँकड़ा इस तथ्य को रेखांकित करता है कि आर्थिक विकास और कानूनी सुधारों के बावजूद बाल विवाह भारत के सामाजिक ताने-बाने में अब भी गहराई से जड़ें जमाए हुए है।
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- इसी गंभीर चुनौती के मद्देनज़र, केंद्र सरकार द्वारा 27 नवंबर, 2024 को शुरू किया गया बाल विवाह मुक्त भारत (बीवीएमबी), जिसे बाल विवाह मुक्त भारत के नाम से भी जाना जाता है, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (एमडब्ल्यूसीडी) की देश भर में बाल विवाहों के उन्मूलन की एक साहसिक राष्ट्रीय प्रतिबद्धता का प्रतिनिधित्व करता है। इसका उद्देश्य साल 2026 तक देश में बाल विवाह की दर को 10% तक कम करना तथा 2030 तक भारत को पूर्णतः बाल विवाह मुक्त बनाना है। यह लक्ष्य न केवल सतत विकास लक्ष्य 5.3 के अनुरूप है, बल्कि भारत के संवैधानिक मूल्यों सम्मान, समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को भी मूर्त रूप देता है।
- इसी गंभीर चुनौती के मद्देनज़र, केंद्र सरकार द्वारा 27 नवंबर, 2024 को शुरू किया गया बाल विवाह मुक्त भारत (बीवीएमबी), जिसे बाल विवाह मुक्त भारत के नाम से भी जाना जाता है, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (एमडब्ल्यूसीडी) की देश भर में बाल विवाहों के उन्मूलन की एक साहसिक राष्ट्रीय प्रतिबद्धता का प्रतिनिधित्व करता है। इसका उद्देश्य साल 2026 तक देश में बाल विवाह की दर को 10% तक कम करना तथा 2030 तक भारत को पूर्णतः बाल विवाह मुक्त बनाना है। यह लक्ष्य न केवल सतत विकास लक्ष्य 5.3 के अनुरूप है, बल्कि भारत के संवैधानिक मूल्यों सम्मान, समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को भी मूर्त रूप देता है।
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ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य:
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- भारत में बाल विवाह के विरुद्ध संघर्ष कोई नया नहीं है। 19वीं शताब्दी में राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर और ज्योतिराव फुले जैसे समाज सुधारकों ने इस प्रथा के विरुद्ध आवाज़ उठाई। इनके प्रयासों से 1891 का सहमति की आयु अधिनियम और 1929 का शारदा अधिनियम अस्तित्व में आया। स्वतंत्रता के बाद, 1948 और 1978 के संशोधनों द्वारा विवाह की न्यूनतम आयु को क्रमशः बढ़ाया गया।
- अंततः 2006 का बाल विवाह निषेध अधिनियम इस दिशा में एक निर्णायक कदम सिद्ध हुआ, क्योंकि इसने बाल विवाह को केवल “नियंत्रित” करने के बजाय पूरी तरह प्रतिबंधित करने का प्रयास किया।
- भारत में बाल विवाह के विरुद्ध संघर्ष कोई नया नहीं है। 19वीं शताब्दी में राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर और ज्योतिराव फुले जैसे समाज सुधारकों ने इस प्रथा के विरुद्ध आवाज़ उठाई। इनके प्रयासों से 1891 का सहमति की आयु अधिनियम और 1929 का शारदा अधिनियम अस्तित्व में आया। स्वतंत्रता के बाद, 1948 और 1978 के संशोधनों द्वारा विवाह की न्यूनतम आयु को क्रमशः बढ़ाया गया।
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बाल विवाह मुक्त भारत : एक परिवर्तनकारी पहल 27 नवंबर 2024 को शुरू किया गया बाल विवाह मुक्त भारत (BVMB) मिशन इस समस्या से निपटने के लिए एक समग्र और प्रौद्योगिकी-आधारित दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। यह पहल सतत विकास लक्ष्य SDG 5.3 के अनुरूप है, जिसका उद्देश्य 2030 तक बाल विवाह और अन्य हानिकारक प्रथाओं का पूर्ण उन्मूलन है। BVMB की विशेषता यह है कि यह केवल दंडात्मक उपायों तक सीमित नहीं है, बल्कि रोकथाम, संरक्षण और सशक्तिकरण को केंद्र में रखता है। इसके अंतर्गत समर्पित बाल विवाह निषेध अधिकारियों (CMPO) की नियुक्ति बहु-क्षेत्रीय जागरूकता अभियान वास्तविक-समय रिपोर्टिंग हेतु डिजिटल पोर्टल समुदायों, स्कूलों, आंगनवाड़ियों और धार्मिक नेताओं की भागीदारी को बढ़ावा दिया गया है। |

बाल विवाह: अवधारणा और कानूनी स्थिति:
बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 भारत में बाल विवाह को रोकने वाला मुख्य कानून है। बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 के अनुसार, ऐसा कोई भी विवाह जिसमें लड़की की आयु 18 वर्ष से कम या लड़के की आयु 21 वर्ष से कम हो, बाल विवाह की श्रेणी में आता है। यह अधिनियम केवल आयु सीमा तय नहीं करता, बल्कि बाल विवाह को दंडनीय अपराध घोषित करता है और पीड़ितों को संरक्षण, राहत और न्याय उपलब्ध कराने की व्यवस्था करता है।
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- विवाह की न्यूनतम आयु: लड़कियों के लिए 18 वर्ष और लड़कों के लिए 21 वर्ष अनिवार्य है।
- सजा: यदि कोई वयस्क पुरुष नाबालिग लड़की से शादी करता है, तो उसे 2 साल तक का कठोर कारावास और 1 लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है।
- मध्यस्थों को सजा: जो लोग बाल विवाह करवाते हैं, बढ़ावा देते हैं या उसमें शामिल होते हैं (जैसे माता-पिता या पंडित/काजी), उन्हें भी समान सजा का प्रावधान है।
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 ने इस कानूनी ढांचे को और सशक्त किया है। भारतीय न्याय संहिता की धारा 63 के तहत 18 वर्ष से कम आयु की पत्नी के साथ यौन संबंध को बलात्कार की श्रेणी में रखा गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने हालिया निर्णयों में स्पष्ट किया है कि बाल विवाह के भीतर सहमति की अवधारणा लागू नहीं होती, क्योंकि बच्चा कानूनी रूप से सहमति देने में सक्षम नहीं होता।
- अक्टूबर 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने बाल विवाह की रोकथाम हेतु राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को व्यापक दिशा-निर्देश जारी किए। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बाल विवाह व्यक्तिगत स्वायत्तता का उल्लंघन है और यह अक्सर जबरन विवाह में बदल जाता है।
- अमान्य विवाह: बाल विवाह को नाबालिग पक्ष की इच्छा पर 'शून्य' (Voidable) घोषित किया जा सकता है। बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 (Section 3) के तहत बाल विवाह को कानूनन 'शून्यकरणीय' (Voidable) माना गया है।
- पॉक्सो एक्ट (POCSO Act): सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार, 18 वर्ष से कम उम्र की पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाना 'दुष्कर्म' (Rape) की श्रेणी में आता है, भले ही विवाह हुआ हो। इस पर पोक्सो अधिनियम के तहत कठोर कार्रवाई की जाती है, जिसमें उम्रकैद तक का प्रावधान है।
- विवाह की न्यूनतम आयु: लड़कियों के लिए 18 वर्ष और लड़कों के लिए 21 वर्ष अनिवार्य है।
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बाल विवाह का मानव विकास पर प्रभाव:
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- मातृ स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव: कम उम्र में गर्भधारण से किशोरियों में मातृ मृत्यु दर का जोखिम बढ़ जाता है, क्योंकि उनका शरीर पूर्ण रूप से विकसित नहीं होता। एनीमिया, उच्च रक्तचाप और प्रसव जटिलताएँ अधिक देखी जाती हैं।
- शिशु स्वास्थ्य और पोषण संबंधी संकट: बाल विवाह से जन्मे बच्चों में अल्प जन्म-वजन, कुपोषण और शिशु मृत्यु दर अधिक पाई जाती है, जिससे पीढ़ीगत स्वास्थ्य संकट उत्पन्न होता है।
- मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव: कम उम्र में वैवाहिक जिम्मेदारियाँ, घरेलू हिंसा का जोखिम और निर्णय-स्वतंत्रता की कमी बालिकाओं में अवसाद, चिंता और आत्मसम्मान में गिरावट जैसी मानसिक समस्याओं को जन्म देती हैं।
- शिक्षा में व्यवधान: बाल विवाह प्रायः लड़कियों की स्कूली शिक्षा को बीच में ही समाप्त कर देता है, जिससे उनकी शैक्षिक उपलब्धि और कौशल विकास सीमित हो जाता है।
- रोज़गार और आर्थिक स्वतंत्रता में बाधा: शिक्षा और कौशल के अभाव में बाल विवाह की शिकार महिलाएँ औपचारिक रोजगार से वंचित रह जाती हैं, जिससे उनकी आर्थिक निर्भरता और गरीबी बनी रहती है।
- मानव पूंजी निर्माण पर प्रतिकूल प्रभाव: स्वास्थ्य, शिक्षा और उत्पादकता के कमजोर होने से बाल विवाह मानव पूंजी विकास को बाधित करता है, जो दीर्घकाल में राष्ट्रीय आर्थिक वृद्धि और विकास लक्ष्यों को प्रभावित करता है।
- मातृ स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव: कम उम्र में गर्भधारण से किशोरियों में मातृ मृत्यु दर का जोखिम बढ़ जाता है, क्योंकि उनका शरीर पूर्ण रूप से विकसित नहीं होता। एनीमिया, उच्च रक्तचाप और प्रसव जटिलताएँ अधिक देखी जाती हैं।
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बाल विवाह के सामाजिक-आर्थिक कारण:
भारत में बाल विवाह की निरंतरता केवल कानून के अभाव का परिणाम नहीं है, बल्कि यह गरीबी, लैंगिक असमानता, सामाजिक परंपराओं और शिक्षा की कमी जैसे बहुआयामी सामाजिक–आर्थिक कारकों से गहराई से जुड़ी हुई है। ये कारक परस्पर एक-दूसरे को पोषित करते हैं और बाल विवाह को एक पीढ़ीगत दुष्चक्र में बदल देते हैं।
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- गरीबी और आर्थिक असुरक्षा: आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों में बालिका का शीघ्र विवाह अक्सर पारिवारिक बोझ कम करने के साधन के रूप में देखा जाता है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS-5, 2019–21) के अनुसार, सबसे निचले आय-वर्ग (Lowest Wealth Quintile) की महिलाओं में बाल विवाह की दर, सबसे ऊँचे आय-वर्ग की तुलना में लगभग दोगुनी पाई गई है। बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में गरीबी और बाल विवाह के बीच सीधा सहसंबंध स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
- लैंगिक असमानता और सामाजिक संरचना: कई समुदायों में लड़कियों को अभी भी परिवार पर “आर्थिक बोझ” या “पराया धन” माना जाता है, जिससे उनकी शिक्षा और व्यक्तिगत स्वायत्तता को सीमित कर दिया जाता है। NFHS-5 के आँकड़ों के अनुसार, जिन महिलाओं की शिक्षा आठवीं कक्षा से कम है, उनमें बाल विवाह की संभावना उच्च शिक्षा प्राप्त महिलाओं की तुलना में कई गुना अधिक है।
- परंपरा, सामाजिक रूढ़ियाँ और सामुदायिक दबाव: पश्चिम बंगाल, असम और राजस्थान के कुछ जिलों में सामाजिक मर्यादा, जातिगत परंपराएँ और धार्मिक रीति-रिवाज़ कानून से अधिक प्रभावशाली सिद्ध होते हैं। कई मामलों में, सामूहिक विवाह आयोजनों और त्योहारों के दौरान बाल विवाह को “सामाजिक स्वीकृति” मिल जाती है, जिससे इसका पता लगाना और रोकना कठिन हो जाता है।
- शिक्षा और कानूनी जागरूकता की कमी: NFHS-5 के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में बाल विवाह की दर शहरी क्षेत्रों की तुलना में कहीं अधिक है, जो सूचना, जागरूकता और संस्थागत पहुँच में असमानता को दर्शाता है।
- गरीबी और आर्थिक असुरक्षा: आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों में बालिका का शीघ्र विवाह अक्सर पारिवारिक बोझ कम करने के साधन के रूप में देखा जाता है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS-5, 2019–21) के अनुसार, सबसे निचले आय-वर्ग (Lowest Wealth Quintile) की महिलाओं में बाल विवाह की दर, सबसे ऊँचे आय-वर्ग की तुलना में लगभग दोगुनी पाई गई है। बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में गरीबी और बाल विवाह के बीच सीधा सहसंबंध स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
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केस स्टडी: छत्तीसगढ़ का बालोद जिला छत्तीसगढ़ के बालोद जिले का भारत का पहला बाल विवाह मुक्त जिला बनना इस दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। इसी प्रकार सूरजपुर जिले की 75 ग्राम पंचायतों को “बाल विवाह मुक्त पंचायत” घोषित किया जाना यह दर्शाता है कि सामुदायिक भागीदारी और प्रशासनिक इच्छाशक्ति मिलकर ठोस परिवर्तन ला सकती है। ये उदाहरण अन्य राज्यों के लिए अनुकरणीय मॉडल प्रस्तुत करते हैं। |
चुनौतियाँ:
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- हालाँकि भारत में बाल विवाह की व्यापकता में पिछले कुछ दशकों में उल्लेखनीय कमी आई है, फिर भी सबसे बड़ी चुनौती कानून और सामाजिक व्यवहार के बीच का अंतर है। बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 जैसे सशक्त कानूनों के बावजूद, कई समुदायों में सामाजिक स्वीकृति और परंपरागत मान्यताएँ कानून के ऊपर हो जाती हैं।
- दूसरी महत्वपूर्ण चुनौती प्रवर्तन में क्षेत्रीय असमानताएँ हैं। कुछ राज्यों और जिलों में प्रशासनिक इच्छाशक्ति, संसाधनों और प्रशिक्षित मानवबल की कमी के कारण कानून का प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो पाता। शहरी क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण और दूरदराज़ इलाकों में बाल विवाह की निगरानी और रोकथाम अधिक कठिन सिद्ध होती है।
- तीसरी चुनौती डेटा संग्रह, रिपोर्टिंग और निगरानी तंत्र की सीमाएँ हैं। कई मामलों में बाल विवाह की घटनाएँ दर्ज ही नहीं होतीं, क्योंकि ये सामाजिक रूप से स्वीकृत या गोपनीय रूप से संपन्न की जाती हैं।
- हालाँकि भारत में बाल विवाह की व्यापकता में पिछले कुछ दशकों में उल्लेखनीय कमी आई है, फिर भी सबसे बड़ी चुनौती कानून और सामाजिक व्यवहार के बीच का अंतर है। बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 जैसे सशक्त कानूनों के बावजूद, कई समुदायों में सामाजिक स्वीकृति और परंपरागत मान्यताएँ कानून के ऊपर हो जाती हैं।
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आगे की राह:
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- शोध स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि शिक्षा के प्रत्येक अतिरिक्त वर्ष के साथ बाल विवाह की संभावना में उल्लेखनीय कमी आती है। इसके साथ ही, आर्थिक सशक्तिकरण, कौशल विकास और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के माध्यम से परिवारों की आर्थिक निर्भरता कम करना आवश्यक है। स्थानीय स्वशासन संस्थाओं, पंचायतों, स्वयं सहायता समूहों और समुदाय-आधारित संगठनों की सक्रिय भागीदारी बाल विवाह के विरुद्ध सामाजिक निगरानी और सामूहिक जिम्मेदारी को मजबूत कर सकती है। कानून, जागरूकता, शिक्षा और समुदाय, इन चारों स्तंभों के समन्वित प्रयास से ही भारत बाल विवाह मुक्त भविष्य की ओर निर्णायक रूप से आगे बढ़ सकता है।
- शोध स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि शिक्षा के प्रत्येक अतिरिक्त वर्ष के साथ बाल विवाह की संभावना में उल्लेखनीय कमी आती है। इसके साथ ही, आर्थिक सशक्तिकरण, कौशल विकास और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के माध्यम से परिवारों की आर्थिक निर्भरता कम करना आवश्यक है। स्थानीय स्वशासन संस्थाओं, पंचायतों, स्वयं सहायता समूहों और समुदाय-आधारित संगठनों की सक्रिय भागीदारी बाल विवाह के विरुद्ध सामाजिक निगरानी और सामूहिक जिम्मेदारी को मजबूत कर सकती है। कानून, जागरूकता, शिक्षा और समुदाय, इन चारों स्तंभों के समन्वित प्रयास से ही भारत बाल विवाह मुक्त भविष्य की ओर निर्णायक रूप से आगे बढ़ सकता है।
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निष्कर्ष:
भारत में बाल विवाह उन्मूलन की यात्रा सामाजिक सुधार आंदोलनों से शुरू होकर सशक्त कानूनी ढांचे और आधुनिक नीति-पहल तक पहुँची है। बाल विवाह मुक्त भारत मिशन इस संघर्ष को एक नई दिशा देता है, जहाँ कानून, तकनीक और समुदाय मिलकर काम कर रहे हैं। यह पहल न केवल SDG 5.3 की प्राप्ति की दिशा में कदम है, बल्कि एक ऐसे भारत की नींव भी रखती है जहाँ हर बच्चा शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वायत्तता के साथ जीवन जी सके। निरंतर राजनीतिक इच्छाशक्ति, सामाजिक जागरूकता और सामूहिक प्रयासों से भारत निश्चित रूप से बाल विवाह मुक्त भविष्य की ओर अग्रसर हो सकता है।
| UPSC/PCS मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न: बाल विवाह केवल एक कानूनी अपराध नहीं, बल्कि मानवाधिकार और नैतिकता का प्रश्न भी है। इस कथन के आलोक में बाल विवाह उन्मूलन में समाज, राज्य और स्थानीय स्वशासन संस्थाओं की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए। |

