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Daily-current-affairs / 23 Sep 2026

हिमालय का बदलता स्वरूप: ग्लेशियर क्षरण से कैस्केडिंग आपदाओं तक

हिमालय का बदलता स्वरूप: ग्लेशियर क्षरण से कैस्केडिंग आपदाओं तक

संदर्भ:

हाल के वर्षों में हिमालयी क्षेत्र में बाढ़, भूस्खलन, ग्लेशियल झीलों के फटने, हिमस्खलन और ग्लेशियरों के टूटने जैसी बढ़ती घटनाओं ने इस प्रश्न को महत्वपूर्ण चिंतन का विषय बना दिया है कि क्या हिमालय किसी व्यापकटिपिंग पॉइंटकी ओर बढ़ रहा है।

सितंबर 2026 में ‘इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट’ (ICIMOD) द्वारा जारी प्रॉस्परस एंड रेज़िलिएंट हिमालयाज़’ रिपोर्ट ने संकेत दिया है कि हिंदूकुश-हिमालय (HKH) क्षेत्र में ग्लेशियरों का द्रव्यमान तेजी से घट रहा है और इसके परिणामस्वरूप जल-सुरक्षा तथा आपदा जोखिम दोनों बढ़ रहे हैं।

अगस्त 2026 में नेपाल में हुई विनाशकारी बाढ़ और मलबे का प्रवाह (debris flow) की घटना ने इस संकट को और स्पष्ट किया। इसमें ग्लेशियर एवं बर्फ-पत्थर के मलबे के ढहने, अस्थिर पर्वतीय ढलानों और अचानक नदी के प्रवाह बढ़ने जैसी परस्पर जुड़ी प्रक्रियाओं ने भूमिका निभाई। यह हिमालय में विकसित हो रहे ‘कैस्केडिंग क्रायोस्फेरिक खतरे(cascading cryospheric hazards) की गंभीर चेतावनी है।

हिमालय क्यों महत्वपूर्ण है?

हिमालय केवल एक पर्वत श्रृंखला नहीं है, बल्कि एशिया की जल एवं पारिस्थितिक सुरक्षा का आधार है। हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र से निकलने वाली नदियाँ भारत, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, पाकिस्तान और चीन सहित कई देशों की करोड़ों आबादी को प्रभावित करती हैं।

ग्लेशियर इन नदियों के लिए प्राकृतिक जलाशय की तरह कार्य करते हैं। सर्दियों में बर्फ के रूप में जल का संचय होता है और गर्मियों में पिघलकर यह नदी प्रवाह को बनाए रखने में सहायता करता है। इसलिए ग्लेशियरों में परिवर्तन का प्रभाव केवल पर्वतीय क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अनुप्रवाह (downstream) कृषि, पेयजल, जलविद्युत और पारिस्थितिकी तक पहुँचता है।

जलवायु परिवर्तन और हिमालयी ग्लेशियर:

वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण हिमालयी क्षेत्र तेजी से गर्म हो रहा है। बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियरों का द्रव्यमान संतुलन घट रहा है, अर्थात ग्लेशियर जितना बर्फ खो रहे हैं, उतनी मात्रा में नई बर्फ जमा नहीं हो रही है। परिणामस्वरूप ग्लेशियरों के पीछे हटने के साथ-साथ उनके सामने और आसपास नई ग्लेशियल झीलें बन सकती हैं। इन झीलों को रोकने वाली बर्फ, मलबे या मोरेन की दीवारें हमेशा स्थिर नहीं होतीं। भूकंप, भारी वर्षा, हिमस्खलन या चट्टानों के गिरने से ये अचानक टूट सकती हैं और  हिमनद झील के फटने से बाढ़ (Glacial Lake Outburst Flood -GLOF) उत्पन्न हो सकता है।

टिपिंग पॉइंटका अर्थ

हिमालय के संदर्भ में टिपिंग पॉइंटका अर्थ अचानक पूरे हिमालय के ढह जाने से नहीं है। यह ऐसी अवस्था है जहाँ पर्यावरणीय परिवर्तन इतने व्यापक हो जाएँ कि पारंपरिक पारिस्थितिक एवं जल-प्रणालियों का व्यवहार बदलने लगे।

ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से शुरुआती चरण में नदी का जल स्तर बढ़ सकता है। लेकिन जब ग्लेशियर का आकार और बर्फ भंडार (ice reserve) लगातार कम होता जाता है, तो एक समय ऐसा आता है जब अतिरिक्त पिघला हुआ पानी (meltwater) घटने लगता है। इसके बाद नदी का दीर्घकालीन प्रवाह भी कम हो सकता है। अर्थात् हिमालयी क्षेत्र को दो विपरीत समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है-

अल्पावधि में: अधिक पानी और अचानक बाढ़।

दीर्घावधि में: कम बर्फ, कम पिघला हुआ पानी और जल-संकट।

यही हिमालयी जल-सुरक्षा की सबसे बड़ी चुनौती है।

नेपाल त्रासदी से क्या सीख मिलती है?

नेपाल की 2026 की त्रासदी इस बात को रेखांकित करती है कि पर्वतीय आपदाओं को अब अलग-अलग घटनाओं के रूप में नहीं देखा जा सकता। हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के पीछे हटने से पर्वतीय ढलानों की स्थिरता प्रभावित हो सकती है, जिससे बर्फ और चट्टानों के हिमस्खलन की घटनाएँ बढ़ सकती हैं। इसके बाद नदियों का मार्ग अवरुद्ध होकर मलबे का संचय हो सकता है और अचानक जल-मुक्ति की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इससे तेज बाढ़ और निचले क्षेत्रों में व्यापक विनाश का खतरा बढ़ जाता है। इस प्रकार ग्लेशियरों का पीछे हटना, ढलानों की अस्थिरता, बर्फ-चट्टान का हिमस्खलन, नदी अवरोध, मलबे का संचय, अचानक जल-मुक्ति और फ्लैश फ्लड एक-दूसरे से जुड़ी प्रक्रियाएँ हैं। ऐसी परस्पर जुड़ी और क्रमिक आपदाओं को कैस्केडिंग डिजास्टर” (Cascading Disaster) कहा जाता है।

जलवायु परिवर्तन इस पूरी श्रृंखला में जोखिम को बढ़ा सकता है, क्योंकि तापमान वृद्धि से ग्लेशियर कमजोर हो सकती है, पर्माफ्रॉस्ट (permafrost) पिघल सकता है और पर्वतीय ढलानों की स्थिरता प्रभावित हो सकती है। भविष्य की हिमालयी आपदाओं को केवल बाढ़या भूस्खलनकी श्रेणी में रखना पर्याप्त नहीं होगा। पूरे पर्वतीय आपदा जोखिम तंत्र (hazard system) को एक साथ समझने की आवश्यकता है।

पर्माफ्रॉस्ट:

हिमालयी संकट में पर्माफ्रॉस्ट (permafrost) का महत्व तेजी से बढ़ रहा है। पर्माफ्रॉस्ट ऐसी भूमि है जो कम-से-कम लगातार दो वर्षों तक जमी रहती है। ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में यह चट्टानों और मिट्टी को स्थिर रखने में भूमिका निभाती है। तापमान बढ़ने पर पर्माफ्रॉस्ट पिघल सकता है। इससे चट्टानों और ढलानों की स्थिरता कम हो सकती है तथा चट्टान गिरने की घटना, भूस्खलन और हिमस्खलन का खतरा बढ़ सकता है। अतः हिमालय में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव केवल बर्फ पिघलनेतक सीमित नहीं है। यह बर्फचट्टानमिट्टीपानी प्रणाली को प्रभावित कर रहा है।

भारत के लिए चुनौती:

भारत में हिमालय से निकलने वाली नदियाँ देश की जल, कृषि और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी हैं-

1. जल सुरक्षा

गंगा, यमुना, सतलुज, अलकनंदा, भागीरथी और अन्य हिमालयी नदी प्रणालियाँ भारत के लिए महत्वपूर्ण हैं। ग्लेशियरों में दीर्घकालीन परिवर्तन से नदी प्रवाह के मौसमी स्वरूप में बदलाव आ सकता है।

2. जलविद्युत

हिमालय भारत की जलविद्युत क्षमता का प्रमुख क्षेत्र है। लेकिन बढ़ती अचानक बाढ़, भूस्खलन और जीएलओएफ (GLOF) जैसी घटनाएँ बांधों, सुरंगों और अन्य अवसंरचनाओं के लिए जोखिम बढ़ाती हैं।

3. कृषि

गंगा-ब्रह्मपुत्र जैसी नदी प्रणालियों का प्रवाह भारतीय कृषि के लिए महत्वपूर्ण है। जल उपलब्धता में दीर्घकालीन बदलाव सिंचाई और खाद्य सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है।

4. सीमावर्ती क्षेत्र

हिमालयी क्षेत्र भारत की रणनीतिक सीमाओं से भी जुड़ा है। आपदा के कारण सड़क, पुल, संचार नेटवर्क और सैन्य अवसंरचना प्रभावित हो सकती है।

5. शहरीकरण और पर्यटन

उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश जैसे क्षेत्रों में तेजी से हो रहा पर्यटन एवं अवसंरचना विकास पर्वतीय पारिस्थितिकी पर अतिरिक्त दबाव डालता है।

आगे की राह

1. बेहतर निगरानी

·       सैटेलाइट रिमोट सेंसिंग, ड्रोन, स्वचालित मौसम केंद्र और भू-आधारित सेंसरों का व्यापक उपयोग किया जाए।

·       संवेदनशील क्षेत्रों में वास्तविक समय (Real-time) निगरानी तंत्र विकसित किया जाए।

·       GLOF, फ्लैश फ्लड, भूस्खलन और हिमस्खलन के लिए प्रभावी प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली विकसित की जाए।

2. जोखिम आधारित अवसंरचना विकास

·       हिमालय में सड़क, बांध, सुरंग और शहरी विकास की योजना बनाते समय केवल इंजीनियरिंग व्यवहार्यता पर निर्भर न रहा जाए।

·       परियोजनाओं में संचयी पर्यावरणीय जोखिम का आकलन अनिवार्य किया जाए।

·       संवेदनशील क्षेत्रों में जलवायु-लचीली अवसंरचना को प्राथमिकता दी जाए।

3. वैज्ञानिक आधार पर भूमि-उपयोग नियोजन

·       भूस्खलन और बाढ़-प्रवण क्षेत्रों में अनियंत्रित निर्माण को सीमित किया जाए।

·       पर्वतीय क्षेत्रों में वहन क्षमता (Carrying Capacity) के आधार पर पर्यटन का नियमन किया जाए।

·       संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्रों में विकास गतिविधियों के लिए स्पष्ट क्षेत्र-विशिष्ट मानदंड बनाए जाएँ।

4. क्षेत्रीय सहयोग

·       भारत, नेपाल, भूटान और चीन सहित हिमालयी देशों के बीच जलविज्ञान संबंधी आँकड़ों, ग्लेशियर निगरानी और आपदा पूर्व चेतावनी से संबंधित सहयोग को मजबूत किया जाए।

·       साझा आपदा जोखिमों के लिए क्षेत्रीय डेटा-साझाकरण तंत्र विकसित किया जाए।

5. स्थानीय समुदायों की भागीदारी

·       पर्वतीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय अनुभव को आधुनिक वैज्ञानिक प्रणालियों के साथ जोड़ा जाए।

·       समुदायों को प्रारंभिक चेतावनी, सुरक्षित निकासी और आपदा प्रबंधन के प्रशिक्षण दिए जाएँ।

निष्कर्ष

हिमालय में ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना केवल पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि जल, खाद्य, ऊर्जा और आपदा सुरक्षा से जुड़ी व्यापक चुनौती है। नेपाल की 2026 की त्रासदी ने स्पष्ट किया है कि ग्लेशियर पिघलने, ढलानों की अस्थिरता, हिमस्खलन और अचानक बाढ़ जैसी घटनाएँ एक-दूसरे से जुड़कर कैस्केडिंग आपदाओं का रूप ले सकती हैं। ऐसे में हिमालय के विकास मॉडल को पारिस्थितिक संवेदनशीलता और जलवायु जोखिमों को ध्यान में रखकर पुनर्परिभाषित करना आवश्यक है। वैज्ञानिक निगरानी, प्रारंभिक चेतावनी, जोखिम-आधारित नियोजन और क्षेत्रीय सहयोग के माध्यम से ही हिमालय और उससे जुड़े करोड़ों लोगों की दीर्घकालीन सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।

 

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