राजनीतिक शब्दावली - भाग 2 (Polity Terms - Part 2) : डेली करेंट अफेयर्स

राजव्यवस्था शब्दावली (Pol।ty Terms)

सार तत्व का सिद्धांत

संविधान में राज्यों और केंद्र की विधि बनाने की शक्ति को तीन सूचियों ( संघ सूची ,राज्य सूची, समवर्ती सूची )में विभाजित किया गया है। परन्तु सूची में वर्णित विषयों का विभाजन पूर्ण रूप से वैज्ञानिक ढंग से किया जाना सम्भव नहीं था । ऐसे में केंद्र राज्य के मध्य विवाद उत्पन्न होता रहता है कि कोई विषय एक सरकार के अधिकार क्षेत्र में है या दूसरी सरकार के अधिकार क्षेत्र में ।

मुख्यमंत्री की नियुक्ति और पद ...

ऐसे में न्यायालय मामले के सार को देखता है इसके अंतर्गत तीनों सूचियों की व्याख्या कानून के शीर्षक को देखकर नहीं बल्कि विषयवस्तु के आधार पर सार तत्व के सिद्धांत के आधार पर की जाती है ।

सार तत्व के सिद्धांत को संसद द्वारा बनाये गये कानूनों और राज्य विधानसभाओं द्वारा बनाये गए कानूनों (अनुच्छेद 54) में प्रतिकूलता से संबंधित मामलों में भी लागू की किया जाता है ।

इस सिद्धांत को पहली बार कनाडा के संविधान में स्वीकार किया गया था । और भारत में इसे भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत स्वतंत्रता पूर्व अवधि में अपनाया गया ।

मुम्बई राज्य बनाम बालसारा ए.आई.आर. 1951 मामले में बाम्बे मद्द्य निषेध अधिनियम जिसके द्वारा राज्य में मादक द्रव्यों को खरीदने तथा रखने को निषेध कर दिया गया था। कानून की संवैधानिकता को इस आधार पर चुनौती दी गयी थी कि वह संघ सूची में वर्णित विषय मादक पदार्थों के आयात निर्यात पर अतिक्रमण करता है। क्योंकि मादक द्रव्यों के क्रय विक्रय और उपयोग को रोकने से उसके आयात-निर्यात पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

उच्चतम न्यायालय ने अधिनियम को ‘सार तत्व के सिद्धांत’ के आधार पर वैध माना । उसके अनुसार अधिनियम का मुख्य उद्देश्य राज्य सूची के विषय से संबंधित था संघ सूची से नहीं ।

लाभ का पद

लाभ के पद से तात्पर्य उस पद से है जिस पर रहते हुए कोई व्यक्ति सरकार की ओर से किसी भी तरह की सुविधा लेने का अधिकारी होता है ।

भारतीय संविधान में भाग 5 के अनुच्छेद 102(1)(a) के अंतर्गत संसद सदस्यों के लिए तथा अनुच्छेद 191(1)(a) के तहत राज्य विधानसभा के सदस्यों के लिए ऐसे किसी भी लाभ के पद को धारण करने का निषेध किया गया है जिससे उस पद के धारण करने वालों को किसी भी प्रकार का वित्तीय लाभ मिलता हो ।

संसद (निरर्हता निवारण) अधिनियम 1959 के अनुसार यदि किसी सांविधिक/ गैर सांविधिक निकाय अथवा कम्पनी में निदेशक/सदस्य के तौर पर कार्यरत व्यक्ति प्रतिपूरक भत्ते के अतिरिक्त किसी अन्य पारिश्रमिक का हकदार नहीं है तो वह संसद सदस्य बनने के अयोग्य नहीं माना जायेगा ।

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 9 (ए) में भी सांसदों व विधायकों को लाभ का पद धारण करने से प्रतिबंधित किया गया है ।

संविधान में 'हितों के टकराव' और विधायिका और कार्यपालिका के बीच शक्ति के पृथक्करण के सिद्धांत के क्रियान्वयन हेतु प्रावधान किया गया है कि ‘लाभ के पद' पर आसीन कोई भी व्यक्ति विधायिका का हिस्सा नहीं हो सकता है । लेकिन लाभ के पद' को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है ।

प्रत्यर्पण

एक देश की ओर से किसी अन्य देश को आरोपी व्यक्तियों को वापस सौंपने की व्यवस्था को प्रत्यर्पण कहते हैं । जो मूल देश को ऐसे अपराधों जिनमें वे दोषी या आरोपी हैं और उन्हें न्यायालय के समक्ष पेश किया जाना आवश्यक है, से निपटने में सहायता प्रदान करती है ।

  • अंतरार्ष्ट्रीय विधि में प्रत्यर्पण मुख्यता द्विपक्षीय संधियों पर आधारित है । इस पर सार्वभौमिक नियम नहीं बन सका है। प्राचीन काल से ही राज्यों (राष्ट्रों) ने सदैव विदेशियों को शरण देना अपना अधिकार समझा है । अत: प्रर्त्यपण दो राज्यों (राष्ट्रों) के परस्पर सम्बन्ध से संचालित होता है । अत: अंतरार्ष्ट्रीय विधि का प्रथाओं संबंधी कोई सार्वभौमिक नियम नहीं है जिसके द्वारा राज्यों पर प्रत्यर्पण का उत्तरदायित्व हो ।

भारत में प्रत्यर्पण

प्रत्यर्पण अधिनियम 1962 की धारा 2 (डी) भगोड़े अपराधियों के प्रत्यर्पण से संबंधित विदेशी राज्य के साथ भारत द्वारा की गई संधि, समझौते या व्यवस्था के रूप में प्रत्यर्पण संधि को परिभाषित करती है और इसमें किसी भी संधि, समझौते या व्यवस्था से संबंधित कोई संधि, समझौता या व्यवस्था शामिल है।

सावरकर केस -191

बी.ड़ी. सावरकर एक भारतीय क्रान्तिकारी थे जिन्हें एक जलयान द्वारा भारत लाया जा रहा था उनके विरुद्ध देशद्रोह तथा अपराध को प्रोत्साहन देने के सम्बन्ध में मुकदमा ब्रिटिश भारत की न्यायालय में चलाया जाना था । सावरकर जहाज से भाग निकले परन्तु वह फ्रांस की पुलिस द्वारा पकड़े गये। फ्रांस के जलयान के कप्तान ने उन्हें ब्रिटिश जलयान के कप्तान को सुपुर्द कर दिया। इसके उपरान्त फ्रांस सरकार ने ब्रिटिश सरकार से कहा कि सावरकर को लौटा दें क्योंकि इस मामले में प्रत्यर्पण-सम्बन्धी नियमों का ठीक से पालन नहीं हआ। तथा यह मामला हेग न्यायालय गया जहाँ ब्रिटेन के पक्ष में फैसला सुनाया गया। तात्कालिक विधि शास्त्रियों ने इसकी आलोचना की।

भारत के लिए प्रत्यर्पण संबंधी चुनौतियाँ –

मानवाधिकार संबंधी मुद्दे – भारत की जेलों में अवसंरचनात्मक ढांचे की कमी, स्वच्छता का अभाव, तथा अन्य कारक भारतीय कारावासों को पुनर्वास तथा सज़ा हेतु अनुपयुक्त बनाते हैं। पुलिस सुधार और कारागार सुधारों की उपेक्षा भी प्रत्यर्पण में बाधा उत्पन्न करती है । ब्रिटेन ने इसी आधार पर भारत में प्रत्यर्पण से इंकार कर दिया था ।

भारत द्वारा द्वीपक्षीय प्रत्यर्पण संधियों की उपेक्षा- अन्य देशों की तुलना में भारत की चीन, पाकिस्तान, म्यांमार तथा अफगानिस्तान जैसे कई पड़ोसी राज्यों के साथ कोई प्रत्यर्पण संधि मौजूद नहीं है। उदाहरणतः भारत द्वारा एंटीगुआ तथा बरबूडा के साथ प्रत्यर्पण संधि नहीं की गई है, जिसके कारण मेहुल चोकसी के प्रत्यर्पण में विलंब हो रहा है।

  • जाँच में विलंब संबंधी समस्या
  • प्रभावी निवारक कानूनों की कमी

मार्शल लॉ

भारतीय संविधान में मार्शल लॉ के लागू होने पर अनुच्छेद 34 के अंतर्गत मूल अधिकारों पर प्रतिबंध आरोपित किया जाता है ।

संसद द्वारा विशेष परिस्थितियों में पूरे देश में या देश के किसी छोटे से हिस्से में मार्शल लॉ को लगाया जा सकता है। यह ऐसी परिस्थिति का परिचायक है, जहाँ सेना द्वारा सामान्य प्रशासन को अपने नियम कानूनों के तहत संचालित किया जाता है । इस तरह वहां साधारण कानून निलंबित हो जाता है और सरकारी कार्यों को सैन्य अधिकरणों के अधीन किया जाता है। यह सैन्य कानून से अलग है जो कि शास्त्र बलों पर लागू होता है।

मार्शल लॉ को घोषित करने को लेकर संविधान में कोई विशेष प्राधिकरण की व्यवस्था नहीं है ।

मार्शल लॉ को असाधारण परिस्थितियों जैसे – युद्ध, अशांति, दंगे, या कानून का उल्लंघन आदि में लागू किया जा सकता है ।

मार्शल लॉ का न्यायोचित उद्देश्य यही है कि समाज में व्यवस्था बनाई रखी जा सके।

उच्चतम न्यायालय ने घोषणा की कि मार्शल लॉ प्रतिक्रियावादी परिणाम के तहत बंदी प्रात्यक्षीकरण रिट को निलंबित नहीं कर सकता ।

मार्शल लॉ और राष्ट्रीय आपातकाल में अंतर

भारतीय संविधान में मार्शल लॉ के लिए विशिष्ट प्रावधान नहीं हैं,यानि किन परिस्थितियों में इसे लागू किया जायेगा, इसको लेकर अस्पष्टता है I भारतीय संविधान का भाग 18, अनुच्छेद 352-360 तक आपातकाल को लेकर विस्तृत एवं स्पष्ट प्रावधान है I
कानून एवं व्यवस्था के भंग होने पर उसे निर्धारित करता हैI 44वे संविधान संशोधन के बाद तीन आधारों पर लागू किया जाता है-युद्ध, विदेशी आक्रमण, सशस्त्र विद्रोह
मार्शल लॉ केवल मौलिक अधिकारों को प्रभावित करता है  राष्ट्रीय आपातकाल में मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 20-21 को छोड़कर ), संघीय योजनाओं, शक्ति के विभाजन को व्यापक रूप से प्रभावित करता हैI
मार्शल लॉ में सरकार और सामान्य अदालतों को निलंबित कर दिया जाता हैI राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान अदालतें कार्यरत रहती हैं, निलंबित नहीं होती I
इसे देश के कुछ विशेष क्षेत्रों में ही लागू किया जा सकता है I इसे पूरे देश के किसी हिस्से में लागू किया जा सकता है I

क्यू वारंटो (अधिकार पृच्छा)

मूल अधिकारों को प्रवर्तित कराने हेतु सर्वोच्च न्यायालय को अनुच्छेद 32 (2) के तहत पांच प्रकार की रिट ( बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उप्रेषण और क्यू वारंटो) जारी करने की शक्ति प्राप्त है ।

अधिकार पृच्छा का अर्थ है ‘आपका प्राधिकार क्या है?’ यह रिट ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध जारी की जाती है जो किसी लोकपद को अवैध रूप से धारण किये हुए है। यदि व्यक्ति अपने प्राधिकार से सबंधित दावे को प्रमाणित नहीं कर पाता है तो उसे पद से हटा दिया जाता है । इस प्रकार क्यू वारंटो लोक कार्यालय के अवैध अनाधिकार ग्रहण करने को रोंकता है ।

बी.आर.कपूर बनाम तमिलनाडु राज्य मामले में तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता के विरुद्ध ‘क्यू वारंटो’ जारी किया गया था । क्योंकि ‘चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य करार दिए जाने के बावजूद’ जयललिता मुख्यमंत्री पद पर थी। उनका तर्क था अनुच्छेद 164 के अनुसार कोई व्यक्ति जो राज्य विधायिका का सदस्य नहीं है, 6 महीने तक मुख्यमंत्री रह सकता है । लेकिन अनुच्छेद 191 की व्याख्या करते हुए कोर्ट ने कहा ‘चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य करार दिया गया व्यक्ति मुख्यमंत्री पद पर नियुक्त नहीं हो सकता है ।

इस रिट को सिर्फ़ संवैधानिक कार्यालयों से संलग्न मामलों में जारी किया जाता है, निजी कार्यालय के विरुद्ध नहीं ।

संसद अनुच्छेद 32 के तहत किसी अन्य न्यायालय को भी इन रिटों को जारी करने की शक्ति दे सकता है ।