संदर्भ:
हाल ही में, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के वेलबीइंग रिसर्च सेंटर द्वारा वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट 2026' जारी की गई। इसे 'यूएन सस्टेनेबल डेवलपमेंट सॉल्यूशंस नेटवर्क' के साथ साझेदारी में प्रकाशित किया गया है। वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट खुशहाली के स्तरों में निरंतर क्षेत्रीय असमानताओं को प्रदर्शित करती है और युवाओं के घटते कल्याण तथा सोशल मीडिया के प्रभाव जैसी उभरती चिंताओं की ओर ध्यान आकर्षित करती है।
वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष:
· फ़िनलैंड लगातार नौवें वर्ष शीर्ष स्थान पर बना हुआ है।
· फ़िनलैंड के बाद आइसलैंड, डेनमार्क, कोस्टा रिका, स्वीडन का स्थान है।
· अफगानिस्तान सबसे कम खुशहाल देशों में बना हुआ है।
· भारत 147 देशों की सूची में 116वें स्थान पर है। हालांकि रैंकिंग में सुधार हुआ है, लेकिन भारत अभी भी अपने पड़ोसी देशों जैसे नेपाल और पाकिस्तान से पीछे है।
· सबसे कम खुशहाल देश: संघर्षों और अस्थिरता के कारण अफगानिस्तान एक बार फिर सूची में सबसे निचले पायदान पर है, जिसके बाद सिएरा लियोन और मलावी का स्थान है।
· वर्ष 2026 की थीम केयर एंड शेयर (Care and Share) है।

उभरते रुझान:
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- युवाओं के बीच प्रसन्नता में गिरावट, विशेष रूप से पश्चिमी देशों में।
- अत्यधिक सोशल मीडिया उपयोग का संबंध निम्न कल्याण (well-being) से पाया गया।
- सामाजिक विश्वास और सामुदायिक समर्थन खुशहाली के प्रमुख निर्धारक बने हुए हैं।
- युवाओं के बीच प्रसन्नता में गिरावट, विशेष रूप से पश्चिमी देशों में।
रिपोर्ट का महत्व:
रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि केवल आर्थिक विकास ही खुशहाली तय नहीं करता; सामाजिक और संस्थागत कारक इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
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- कल्याण को एक नीतिगत लक्ष्य के रूप में प्राथमिकता देना।
- सामाजिक विश्वास और शासन की गुणवत्ता के महत्व पर प्रकाश डालना।
- देशों को जीडीपी से इतर विकास का आकलन करने में मदद करना।
- मानसिक स्वास्थ्य और डिजिटल व्यवहार के रुझानों में अंतर्दृष्टि प्रदान करना।
यह समावेशी और सतत विकास को बढ़ावा देने के वैश्विक प्रयासों के अनुरूप है।
- कल्याण को एक नीतिगत लक्ष्य के रूप में प्राथमिकता देना।
चुनौतियां:
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- युवाओं के बीच बढ़ते मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे एक गंभीर चिंता का विषय हैं। सामाजिक समर्थन और सार्वजनिक सेवाओं तक पहुंच में असमानता समस्या को और बढ़ा देती है, जिससे कई लोग सुरक्षा तंत्र के बिना रह जाते हैं।
- डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अत्यधिक निर्भरता भी कल्याण पर भारी पड़ रही है, सोशल मीडिया अक्सर चिंता और अकेलेपन को बढ़ावा देता है। इसके अलावा, खुशहाली में निरंतर क्षेत्रीय असमानताएं समावेशी विकास की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं।
- युवाओं के बीच बढ़ते मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे एक गंभीर चिंता का विषय हैं। सामाजिक समर्थन और सार्वजनिक सेवाओं तक पहुंच में असमानता समस्या को और बढ़ा देती है, जिससे कई लोग सुरक्षा तंत्र के बिना रह जाते हैं।
वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट के विषय में:
वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट एक वार्षिक प्रकाशन है जो 'गैलप वर्ल्ड पोल' और अन्य स्रोतों के डेटा का उपयोग करके वैश्विक खुशहाली को मापता है। यह 'कैंट्रिल लैडर' (Cantril ladder) पर लोगों द्वारा स्वयं बताई गई जीवन संतुष्टि के आधार पर देशों को रैंक करता है।
उपयोग किए गए मुख्य संकेतक:
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- प्रति व्यक्ति जीडीपी (GDP)
- सामाजिक समर्थन
- स्वस्थ जीवन प्रत्याशा
- जीवन के विकल्प चुनने की स्वतंत्रता
- उदारता
- भ्रष्टाचार की धारणा
- प्रति व्यक्ति जीडीपी (GDP)
यह रिपोर्ट नीति निर्माताओं के लिए शासन में जन-कल्याण को शामिल करने हेतु एक महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में कार्य करती है।
आगे की राह:
इन चुनौतियों से निपटने के लिए, पारंपरिक जीडीपी-केंद्रित दृष्टिकोणों से आगे बढ़कर नीति निर्धारण में 'वेल-बीइंग मेट्रिक्स' (कल्याण मेट्रिक्स) को एकीकृत करने की आवश्यकता है। हानिकारक डिजिटल प्रथाओं को विनियमित करना और डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा देना तकनीक के नकारात्मक प्रभावों को कम करने में मदद कर सकता है। क्षेत्रीय असमानताओं को पाटने और यह सुनिश्चित करने के लिए कि विकास का लाभ सभी को मिले, समावेशी विकास और सुशासन को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण है।
निष्कर्ष:
विश्व प्रसन्नता रिपोर्ट 2026 इस बात पर जोर देती है कि खुशहाली न केवल आय से, बल्कि सामाजिक विश्वास, स्वास्थ्य और शासन से आकार लेती है। भारत जैसे देशों के लिए, खुशहाली में सुधार के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है जो आर्थिक प्रगति को सामाजिक और संस्थागत सुधारों के साथ जोड़े।
