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Blog / 20 Feb 2026

भारत में डायन-प्रथा: कारण, कानून और मानवाधिकार के मुद्दे

संदर्भ:

17 फ़रवरी 2026 को झारखंड के पश्चिम सिंहभूम ज़िले के कलैया गाँव में 32 वर्षीय एक महिला और उसके दो माह के शिशु को कथित रूप से जादू-टोना करने के आरोप में भीड़ ने आग के हवाले कर दिया। यह मामला समाज में अब भी मौजूद अंधविश्वास और सामूहिक हिंसा की गंभीर तस्वीर पेश करता है।

पृष्ठभूमि:

डायन-प्रथा से जुड़ी घटनाएँ झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, बिहार और असम में समय-समय पर सामने आती रहती हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2000 से अब तक 2,500 से अधिक महिलाओं की हत्या जादू-टोना के आरोप में की जा चुकी है।

यद्यपि झारखंड विचक्राफ्ट निवारण अधिनियम सहित विभिन्न राज्यों में इस कुप्रथा के विरुद्ध विशेष कानून लागू हैं, फिर भी दोषसिद्धि की दर बहुत कम है। इसका प्रमुख कारण घटनाओं की कम रिपोर्टिंग, प्रशासनिक उदासीनता, बदले की आशंका और कई बार समुदाय का मौन समर्थन है।

मुख्य कारण:

डायन-प्रथा के बने रहने के पीछे कई सामाजिक और सांस्कृतिक कारण जिम्मेदार हैं:

         लिंग भेद और पितृसत्तात्मक सोच: इस कुप्रथा में विधवा, बुजुर्ग, अकेली या आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर महिलाएँ अधिक निशाना बनती हैं।

         जातिगत और सामाजिक भेदभाव: निचली जातियों तथा आदिवासी समुदाय की महिलाएँ अधिक असुरक्षित रहती हैं।

         अंधविश्वास और अशिक्षा: बीमारी, मृत्यु या फसल खराब होने जैसी घटनाओं का कारण जादू-टोना मान लिया जाता है।

         संपत्ति विवाद और व्यक्तिगत शत्रुता: कई मामलों में जमीन हड़पने या निजी दुश्मनी निकालने के लिए झूठे आरोप लगाए जाते हैं।

आरोपित महिलाओं को शारीरिक हिंसा, सामाजिक बहिष्कार, मानसिक उत्पीड़न और कई बार हत्या तक का सामना करना पड़ता है। स्थानीय स्तर पर ऐसी घटनाओं पर चुप्पी यह दर्शाती है कि समाज में पितृसत्ता और जातिगत पूर्वाग्रह गहराई से जमे हुए हैं।

न्याय प्राप्त करने में चुनौतियाँ:

         कम रिपोर्टिंग: भय, सामाजिक कलंक और प्रशासन पर अविश्वास के कारण पीड़ित परिवार शिकायत दर्ज कराने से हिचकिचाते हैं।

         प्रशासनिक लापरवाही: पुलिस और स्थानीय अधिकारियों में संवेदनशीलता तथा पर्याप्त प्रशिक्षण की कमी रहती है।

         अंधविश्वास को बढ़ावा: कुछ पारंपरिक उपचारकर्ता (जिन्हें अक्सर ओझा या स्वयंभू आध्यात्मिक साधक कहा जाता है) लोगों की गलत धारणाओं को मजबूत करते हैं, जिससे झूठे आरोपों को सामाजिक स्वीकृति मिल जाती है।

मानवाधिकार और संवैधानिक पहलू:

डायन-प्रथा न केवल सामाजिक कुरीति है, बल्कि यह मौलिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन भी है:

         अनुच्छेद 21: जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार

         अनुच्छेद 14: कानून के समक्ष समानता

         अनुच्छेद 15: लिंग सहित अन्य आधारों पर भेदभाव का निषेध

इसके अतिरिक्त यह संविधान के अनुच्छेद 51A(ह) की भावना के विरुद्ध है, जो नागरिकों से वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवता और सुधार की भावना विकसित करने का आह्वान करता है।

समग्र समाधान की आवश्यकता:

जादू-टोना के आरोपों से जुड़ी हिंसा को रोकने के लिए बहुआयामी रणनीति आवश्यक है:

1.     कानून का प्रभावी क्रियान्वयन: विशेष कानूनों का सख्ती से पालन, त्वरित न्याय और दोषियों की जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।

2.     शिक्षा और जागरूकता अभियान: अंधविश्वास दूर करने और वैज्ञानिक सोच विकसित करने के लिए व्यापक जन-जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाएँ।

3.     स्वास्थ्य सेवाओं का सुदृढ़ीकरण: ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध कराकर बीमारियों से जुड़े भ्रम को कम किया जाए।

4.     पीड़ितों का पुनर्वास: प्रभावित महिलाओं और उनके परिवारों के लिए सुरक्षा, परामर्श और आर्थिक सहायता की व्यवस्था हो।

5.     समावेशी नीति निर्माण: लिंग, जाति और आर्थिक कमजोरी के परस्पर संबंधों को ध्यान में रखकर नीतियाँ बनाई जाएँ।

6.     क्षमता निर्माण: पुलिस और न्यायिक तंत्र को संवेदनशील तथा प्रभावी कार्रवाई के लिए प्रशिक्षित किया जाए।

निष्कर्ष:

झारखंड की यह घटना स्पष्ट करती है कि आधुनिक समय में भी अंधविश्वास के कारण निर्दोष महिलाओं को हिंसा का शिकार होना पड़ रहा है। इसके लिए केवल कानूनी कार्रवाई पर्याप्त नहीं है; बल्कि सामाजिक चेतना, सख्त कानून प्रवर्तन, समावेशी विकास और निरंतर जन-जागरूकता की आवश्यकता है। तभी इस कुप्रथा को जड़ से समाप्त कर कमजोर वर्गों के जीवन और गरिमा की रक्षा की जा सकेगी।