व्हाइट गट डिजीज (White Gut Disease):
हाल ही में आंध्र प्रदेश मत्स्य विभाग ने झींगा (श्रिम्प) फार्मों में व्हाइट गट डिजीज (White Gut Disease-WGD), जिसे व्हाइट फीसेज़ डिजीज (White Feces Disease-WFD) भी कहा जाता है, के प्रकोप को लेकर एक चेतावनी जारी की है।
व्हाइट गट डिजीज (WGD) क्या है?
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- व्हाइट गट डिजीज (WGD) अथवा व्हाइट फीसेज़ डिजीज (WFD) संवर्धित (फार्म-आधारित) झींगों, विशेषकर पैसिफिक व्हाइट श्रिम्प (Litopenaeus vannamei), को प्रभावित करने वाला एक गंभीर स्वास्थ्य विकार है।
- इस रोग की प्रमुख पहचान तालाबों में तैरते हुए सफेद मल-तंतु (White Fecal Strings) का दिखाई देना है, जो झींगों के खराब आंत (गट) स्वास्थ्य का संकेत है।
- यह एक बहु-कारकीय (Multifactorial) रोग है, अर्थात यह किसी एक संक्रामक रोगजनक के कारण नहीं होता, बल्कि रोगजनकों, खराब जल गुणवत्ता, तनाव तथा अपर्याप्त फार्म प्रबंधन जैसे अनेक कारकों के संयुक्त प्रभाव से उत्पन्न होता है।
- व्हाइट गट डिजीज (WGD) अथवा व्हाइट फीसेज़ डिजीज (WFD) संवर्धित (फार्म-आधारित) झींगों, विशेषकर पैसिफिक व्हाइट श्रिम्प (Litopenaeus vannamei), को प्रभावित करने वाला एक गंभीर स्वास्थ्य विकार है।
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लक्षण:
व्हाइट गट डिजीज (WGD) से प्रभावित झींगों में निम्नलिखित प्रमुख लक्षण दिखाई देते हैं:
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- भोजन की मात्रा में कमी तथा भूख समाप्त होना।
- वृद्धि रुक जाना तथा वजन में अपेक्षित बढ़ोतरी न होना।
- भूरी अथवा क्षतिग्रस्त आंत तथा सफेद मल-तंतु का दिखाई देना।
- खोल (Shell) का मुलायम या ढीला हो जाना।
- जीवित रहने की दर में कमी तथा उत्पादन घट जाना।
- भोजन की मात्रा में कमी तथा भूख समाप्त होना।
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यदि समय रहते उचित प्रबंधन नहीं किया जाए, तो यह रोग झींगा किसानों को भारी आर्थिक नुकसान पहुँचा सकता है।
रोकथाम के उपाय:
किसानों को निम्नलिखित उपाय अपनाने की सलाह दी गई है:
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- तालाब की स्वच्छता तथा जल गुणवत्ता बनाए रखें।
- कठोर जैव-सुरक्षा (Biosecurity) उपायों का पालन करें।
- प्रमाणित, रोग-मुक्त झींगा बीज (Seed) तथा गुणवत्तापूर्ण चारा (Feed) का उपयोग करें।
- झींगों के स्वास्थ्य एवं जल गुणवत्ता की नियमित निगरानी करें।
- किसी भी असामान्य लक्षण की सूचना शीघ्रातिशीघ्र मत्स्य विभाग के अधिकारियों को दें।
- तालाब की स्वच्छता तथा जल गुणवत्ता बनाए रखें।
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संस्थागत सहयोग:
राज्य सरकार निम्नलिखित संस्थानों के सहयोग से रोग की निगरानी, रोग सर्विलांस को सुदृढ़ करने तथा किसानों में जागरूकता बढ़ाने का कार्य कर रही है—
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- समुद्री उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (MPEDA)
- आईसीएआर–केंद्रीय खारे जल जलीय कृषि संस्थान (ICAR-CIBA)
- आईसीएआर–राष्ट्रीय मत्स्य आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (ICAR-NBFGR)
- राज्य मत्स्य प्रौद्योगिकी संस्थान (SIFT)
- आंध्र प्रदेश मत्स्य विश्वविद्यालय
- राष्ट्रीय जलीय पशु रोग निगरानी कार्यक्रम (NASPAAD)
- समुद्री उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (MPEDA)
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भारत में झींगा (श्रिम्प) पालन:
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- झींगा पालन भारत की कृषि निर्यात अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण आधार है। पैसिफिक व्हाइट श्रिम्प (Litopenaeus vannamei) देश के कुल झींगा उत्पादन का सबसे बड़ा हिस्सा है। भारत विश्व के सबसे बड़े संवर्धित झींगा निर्यातकों में से एक है, जिसमें आंध्र प्रदेश राष्ट्रीय झींगा उत्पादन एवं निर्यात में सर्वाधिक योगदान देता है। यह क्षेत्र लाखों किसानों, श्रमिकों तथा इससे जुड़े सहायक उद्योगों की आजीविका का प्रमुख स्रोत है।
- हालाँकि निर्यात के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता के बावजूद उद्योग कई चुनौतियों का सामना कर रहा है, जिनमें रोगों का प्रकोप, आयातित ब्रूडस्टॉक (प्रजनन हेतु मूल झींगा) पर निर्भरता, वैश्विक मांग में उतार-चढ़ाव, टैरिफ संबंधी अनिश्चितताएँ तथा संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, यूरोपीय संघ एवं जापान जैसे प्रमुख निर्यात बाजारों द्वारा लागू कठोर खाद्य सुरक्षा एवं ट्रेसबिलिटी (उत्पाद की संपूर्ण आपूर्ति श्रृंखला का पता लगाने की क्षमता) मानक शामिल हैं।
- झींगा पालन भारत की कृषि निर्यात अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण आधार है। पैसिफिक व्हाइट श्रिम्प (Litopenaeus vannamei) देश के कुल झींगा उत्पादन का सबसे बड़ा हिस्सा है। भारत विश्व के सबसे बड़े संवर्धित झींगा निर्यातकों में से एक है, जिसमें आंध्र प्रदेश राष्ट्रीय झींगा उत्पादन एवं निर्यात में सर्वाधिक योगदान देता है। यह क्षेत्र लाखों किसानों, श्रमिकों तथा इससे जुड़े सहायक उद्योगों की आजीविका का प्रमुख स्रोत है।
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प्रमुख सरकारी पहल:
भारत में सतत जलीय कृषि को बढ़ावा देने तथा झींगा क्षेत्र की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के लिए सरकार ने अनेक महत्वपूर्ण पहलें शुरू की हैं:
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- प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY): यह मत्स्य क्षेत्र के सतत विकास के लिए एक प्रमुख योजना है, जिसके अंतर्गत उच्च गुणवत्ता वाले झींगा उत्पादन, कटाई के बाद की अवसंरचना, कोल्ड-चेन विकास, मूल्य संवर्धन, ब्रांडिंग तथा क्षमता निर्माण को प्रोत्साहन दिया जाता है।
- मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र में सतत जलीय कृषि (SAIME): यह एक सामुदायिक आधारित पहल है, जिसका उद्देश्य पर्यावरण-अनुकूल झींगा पालन को मैंग्रोव संरक्षण एवं पुनर्स्थापन के साथ जोड़ना है। इसका विशेष फोकस पश्चिम बंगाल के सुंदरबन क्षेत्र पर है।
- शाफारी (SHAPHARI) प्रमाणन: समुद्री उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (MPEDA) द्वारा शुरू किया गया यह प्रमाणन सुनिश्चित करता है कि जलीय कृषि उत्पाद एंटीबायोटिक-मुक्त हों, उनकी ट्रेसबिलिटी सुनिश्चित हो तथा उनका उत्पादन अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों के अनुरूप किया गया हो। इससे वैश्विक बाजारों तक पहुँच आसान होती है और उपभोक्ताओं का विश्वास बढ़ता है।
- न्यूक्लियर ब्रीडिंग केंद्र:सरकार स्वदेशी, रोग-प्रतिरोधी झींगा ब्रूडस्टॉक विकसित करने के लिए न्यूक्लियर ब्रीडिंग केंद्रों का नेटवर्क स्थापित कर रही है। इसका उद्देश्य आयातित एवं रोगजनक-प्रभावित ब्रूडस्टॉक पर निर्भरता कम करना तथा जैव-सुरक्षा को मजबूत बनाना है।
- प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY): यह मत्स्य क्षेत्र के सतत विकास के लिए एक प्रमुख योजना है, जिसके अंतर्गत उच्च गुणवत्ता वाले झींगा उत्पादन, कटाई के बाद की अवसंरचना, कोल्ड-चेन विकास, मूल्य संवर्धन, ब्रांडिंग तथा क्षमता निर्माण को प्रोत्साहन दिया जाता है।
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निष्कर्ष:
व्हाइट गट डिजीज का यह प्रकोप जलीय कृषि में जैव-सुरक्षा (Biosecurity), जलीय पशु स्वास्थ्य प्रबंधन तथा सतत मत्स्य पालन के महत्व को रेखांकित करता है। ये सभी खाद्य सुरक्षा, निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता तथा तटीय समुदायों की आजीविका सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। साथ ही, यह रोग नियंत्रण, प्रभावी निगरानी तथा सुदृढ़ ब्लू इकोनॉमी (Blue Economy) को बढ़ावा देने में विभिन्न संस्थानों के समन्वित प्रयासों की महत्त्वपूर्ण भूमिका को भी उजागर करता है।
