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Blog / 10 Mar 2026

पश्चिम एशिया संकट: कच्चे तेल की कीमत $100 प्रति बैरल के पार

संदर्भ:

संयुक्त राज्य अमेरिका, इज़राइल और ईरान से जुड़े चल रहे पश्चिम एशिया संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाज़ारों में गंभीर व्यवधान पैदा कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतें 2022 के बाद पहली बार $100 प्रति बैरल के पार चली गई हैं, जिससे भारत जैसे तेल आयातक देशों में ऊर्जा सुरक्षा और महंगाई को लेकर चिंता बढ़ गई है।

तेल की कीमतों में वृद्धि के कारण:

      • होर्मुज़ जलडमरूमध्य में व्यवधान: होर्मुज़ जलडमरूमध्य विश्व के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों (Energy Chokepoints) में से एक है।
        • वैश्विक तेल व्यापार का लगभग 20% इसी संकरे समुद्री मार्ग से गुजरता है, जो ईरान और ओमान के बीच स्थित है।
        • क्षेत्र में सैन्य तनाव और जहाजों पर हमलों के कारण तेल टैंकरों की आवाजाही में कमी आई है।
        • इससे आपूर्ति बाधित होने की आशंका बढ़ी और तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल से ऊपर पहुँच गईं।
      • भू-राजनीतिक जोखिम:
        • खाड़ी क्षेत्र में तेल आपूर्ति मार्गों और उत्पादन केंद्रों को लेकर अनिश्चितता के कारण ऊर्जा बाजारों ने तेल की कीमतों में भू-राजनीतिक जोखिम प्रीमियम जोड़ दिया है।

भारत पर प्रभाव:

      • ऊर्जा आयात लागत में वृद्धि: भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 85% से अधिक आयात करता है, इसलिए वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव का भारतीय अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रभाव पड़ता है।
      • तेल की कीमतों में वृद्धि से:
        • आयात मूल्य में वृद्धि हो सकती है
        • चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) बढ़ सकता है
        • महंगाई बढ़ सकती है
      • गैस आपूर्ति में बाधा
        • संघर्ष के कारण पश्चिम एशिया से आने वाली द्रवीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) की आपूर्ति प्रभावित हुई है।
        • इससे सरकार को औद्योगिक उपभोक्ताओं के लिए गैस आपूर्ति में कटौती पर विचार करना पड़ सकता है।
        • गैस पर निर्भर उद्योगों में ईंधन की कमी की आशंका बढ़ गई है।

व्यापक आर्थिक प्रभाव:

      • महंगाई का दबाव: ऊर्जा कीमतों में वृद्धि से:
        • परिवहन लागत बढ़ सकती है
        • खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ सकती हैं
        • अर्थव्यवस्था में समग्र मुद्रास्फीति (Inflation) बढ़ सकती है
      • वैश्विक व्यापार पर प्रभाव: संघर्ष के कारण समुद्री मार्गों में व्यवधान आया है और फ्रेट (भाड़ा) लागत बढ़ गई है।
      • इससे वैश्विक व्यापार प्रवाह और वित्तीय बाजार प्रभावित हो रहे हैं।
      • वैश्विक ऊर्जा संकट का जोखिम: यदि खाड़ी क्षेत्र में यह व्यवधान जारी रहता है, तो विश्लेषकों के अनुसार यह पिछले तेल संकटों के समान लंबा ऊर्जा झटका बन सकता है।
      • तेल निर्भरता कम करने के लिए भारत की रणनीति: भारत वैश्विक तेल कीमतों के झटकों से बचने के लिए ऊर्जा संक्रमण और स्रोतों के विविधीकरण की रणनीति को तेज़ कर रहा है।

नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार:

      • राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन – ₹19,744 करोड़ की योजना, जिसका उद्देश्य हरित हाइड्रोजन उत्पादन बढ़ाना और जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करना है।
      • पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना – 1 करोड़ घरों में रूफटॉप सोलर स्थापना।
      • पीएम-कुसुम योजनासौर पंपों की स्थापना और ग्रिड-कनेक्टेड पंपों के सौर्यीकरण (solarization) के लिए 60% से 90% तक की भारी सब्सिडी दी जाती है

वैकल्पिक ईंधन और ऊर्जा दक्षता:

      • एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम: फरवरी 2025 तक 17.98% मिश्रण प्राप्त; लक्ष्य 2025–26 तक 20%
      • सतत (SATAT) पहल: कृषि अपशिष्ट से कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) उत्पादन को बढ़ावा।
      • ऊर्जा दक्षता कार्यक्रम: उजाला योजना और ऊर्जा दक्षता सेवा लिमिटेड (EESL) द्वारा LED और ऊर्जा कुशल उपकरणों को बढ़ावा।

जीवाश्म ईंधन सुरक्षा:

      • हाइड्रोकार्बन अन्वेषण एवं लाइसेंसिंग नीति (HELP)घरेलू तेल और गैस अन्वेषण को प्रोत्साहन।
      • एकीकृत पाइपलाइन टैरिफ वन नेशन, वन ग्रिड, वन टैरिफके तहत प्राकृतिक गैस वितरण को सुदृढ़ करना।

आगे की राह:

यह संकट स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि पश्चिम एशिया के तेल पर अत्यधिक निर्भरता के कारण भारत की ऊर्जा व्यवस्था काफी संवेदनशील बनी हुई है। ऐसी स्थिति में भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाने की आवश्यकता है। इसके तहत सबसे पहले तेल आयात के स्रोतों का विविधीकरण करना आवश्यक है, ताकि किसी एक क्षेत्र में संकट आने पर आपूर्ति पर अधिक प्रभाव न पड़े। ऊर्जा आपूर्ति में संभावित बाधाओं से निपटने के लिए रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का विस्तार किया जाना चाहिए। दीर्घकालिक समाधान के रूप में नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में निवेश को बढ़ाना भी अत्यंत आवश्यक है, जिससे जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम हो सके। स्वच्छ और टिकाऊ ऊर्जा भविष्य के लिए इलेक्ट्रिक मोबिलिटी तथा ग्रीन हाइड्रोजन जैसी वैकल्पिक ऊर्जा तकनीकों को भी सक्रिय रूप से बढ़ावा देना चाहिए।