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Blog / 13 Apr 2026

मतदान का अधिकार और चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं

संदर्भ:

हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान उच्च न्यायालय के एक निर्णय को रद्द करते हुए यह स्पष्ट किया है कि मतदान का अधिकार और चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं हैं, बल्कि ये कानून द्वारा निर्मित और नियंत्रित वैधानिक अधिकार (Statutory Rights) हैं।  यह मामला राजस्थान में जिला दुग्ध उत्पादक सहकारी समितियों के चुनावों से संबंधित था, जहाँ उम्मीदवारों की पात्रता शर्तों को चुनौती दी गई थी।

पृष्ठभूमि:

      • यह विवाद राजस्थान सहकारी समितियाँ अधिनियम, 2001 के तहत उत्पन्न हुआ, जिसमें चुनाव लड़ने के लिए जिला दुग्ध उत्पादक सहकारी समितियों के उपनियमों में निम्नलिखित शर्तें निर्धारित थीं:
        • सदस्यों द्वारा न्यूनतम दूध आपूर्ति
        • निरंतर संचालन में भागीदारी
        • ऑडिट और प्रदर्शन मानक
      • इन पात्रता शर्तों को राजस्थान उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई, जिसने 2015 और 2022 में इन्हें प्रतिबंधात्मक मानते हुए निरस्त कर दिया।

बाद में यह मामला अपील के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट पहुँचा।

सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख अवलोकन:

निर्वाचन अधिकार वैधानिक, मौलिक नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि:

      • मतदान का अधिकार संविधान के भाग III के अंतर्गत मौलिक अधिकार नहीं है
      • चुनाव लड़ने का अधिकार भी संवैधानिक अधिकार नहीं है
      • ये दोनों अधिकार केवल कानून द्वारा प्रदान किए जाने पर ही अस्तित्व में आते हैं

इसलिए ये अधिकार नियंत्रणीय (regulable), शर्तों से युक्त और विधायी नियंत्रण के अधीन हैं।

पात्रता बनाम अयोग्यता:

सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट किया:

      • पात्रता शर्तें (Eligibility conditions)-  सक्षम भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु सकारात्मक आवश्यकताएँ
      • अयोग्यता (Disqualification)-  नकारात्मक कारणों से लगाए गए कानूनी प्रतिबंध

विवादित प्रावधान (न्यूनतम दूध आपूर्ति, निरंतरता) को न्यायालय ने वैध पात्रता शर्तें माना, न कि असंवैधानिक अयोग्यता।

न्यायिक समीक्षा का दायरा:

उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत हस्तक्षेप को अमान्य माना क्योंकि:

      • सहकारी समितियाँ सामान्यतः अनुच्छेद 12 के तहत राज्यनहीं हैं।
      • वे सामान्यतः सार्वजनिक कार्य नहीं करतीं।
      • आंतरिक चुनाव विवादों का समाधान वैधानिक प्रक्रियाओं से होना चाहिए।

वैकल्पिक उपाय का सिद्धांत:

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि:

      • पहले सहकारी समिति अधिनियम के तहत उपलब्ध उपाय अपनाए जाने चाहिए।
      • रजिस्ट्रार और अपीलीय प्राधिकरणों के पास समाधान मौजूद है।
      • जब प्रभावी वैधानिक उपाय उपलब्ध हों, तो न्यायिक हस्तक्षेप सीमित होना चाहिए।  

संवैधानिक और कानूनी महत्व:

      • अनुच्छेद 19(1)(c) और लोकतांत्रिक भागीदारी
        • नागरिकों को संघ बनाने का अधिकार है, लेकिन सहकारी सदस्यता स्वतः मौलिक निर्वाचन अधिकार प्रदान नहीं करती।
      • अनुच्छेद 12 की व्याख्या
        • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सहकारी समितियाँ सामान्यतः राज्यनहीं हैं, इसलिए उन पर मौलिक अधिकारों की सीधी लागूता सीमित है।

पूर्व निर्णयों की पुष्टि:

यह निर्णय पहले के सिद्धांतों के अनुरूप है कि:

मतदान का अधिकार वैधानिक है (जनप्रतिनिधित्व ढांचा) ।

चुनाव लड़ने का अधिकार स्वाभाविक संवैधानिक अधिकार नहीं है।

प्रभाव:

      • सहकारी शासन को मजबूती
        • केवल सक्रिय और योगदान देने वाले सदस्य ही चुनाव लड़ सकेंगे।
        • जवाबदेही और दक्षता में सुधार होगा।
      • न्यायिक संयम
        • सहकारी संस्थाओं के आंतरिक मामलों में न्यायालयों का हस्तक्षेप सीमित होगा।
        • स्व-नियमन की अवधारणा मजबूत होगी।
      • निर्वाचन अधिकारों में स्पष्टता
        • मौलिक और वैधानिक अधिकारों के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित होगा।
        • संवैधानिक दावों के अनियंत्रित विस्तार पर रोक लगेगी।

निष्कर्ष:

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारतीय संवैधानिक व्यवस्था के एक मूल सिद्धांत को पुनः स्थापित करता है कि चुनावी भागीदारी अधिकार संविधान द्वारा स्वतः प्रदत्त नहीं, बल्कि कानून द्वारा नियंत्रित वैधानिक अधिकार है। यह निर्णय सहकारी शासन को सुदृढ़ करता है और न्यायिक हस्तक्षेप को सीमित रखते हुए संतुलित शासन व्यवस्था को बढ़ावा देता है।