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Blog / 15 Jan 2026

एकीकृत रॉकेट-मिसाइल फोर्स

संदर्भ:

हाल ही में भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने भारत के लिए एक एकीकृत रॉकेट-मिसाइल फोर्स बनाने की तत्काल आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने रेखांकित किया कि आधुनिक युद्ध में तेजी से एकीकृत और सटीक-प्रहार (precision-based) क्षमताओं की मांग बढ़ रही है।

रॉकेट फोर्स क्या है?

      रॉकेट फोर्स एक विशेष सैन्य कमान है जो लंबी दूरी की रॉकेट आर्टिलरी और मिसाइल प्रणालियों के संचालन के साथ-साथ सटीक हमलों की योजना, कमान, नियंत्रण और निष्पादन के लिए जिम्मेदार होती है, जिसका मुख्य उद्देश्य दुश्मन के कमांड सेंटरों, एयरबेस, लॉजिस्टिक्स हब और रणनीतिक बुनियादी ढांचे को प्रभावी ढंग से निशाना बनाना है।

प्रमुख विशेषताएं:

      रॉकेट और मिसाइल संपत्तियों के केंद्रीकृत कमान और नियंत्रण के साथ जीपीएस, रडार और इन्फ्रारेड जैसी उन्नत प्रणालियों का उपयोग करके सटीक और प्रभावी हमले सुनिश्चित किए जाते हैं।

      स्टैंड-ऑफ स्ट्राइक क्षमता के माध्यम से सुरक्षित कमांड सेंटरों से हमले किए जाते हैं, जिससे अग्रिम पंक्ति के सैनिकों का जोखिम कम होता है और हताहतों की संख्या न्यूनतम रहती है।

      थल सेना, नौसेना और वायु सेना के एकीकरण से दुश्मन की अग्रिम पंक्तियों के पार गहरी पैठ वाले हमले (deep strikes) और संयुक्त अभियानों को सफलतापूर्वक अंजाम दिया जाता है।

आधुनिक युद्ध में रॉकेट-मिसाइल फोर्स की आवश्यकता क्यों?

      युद्ध की बदलती प्रकृति: आधुनिक संघर्ष अब पारंपरिक आमने-सामने की लड़ाई (टैंक और पैदल सेना) से हटकर सटीकता, तेज गति और लंबी दूरी की मारक क्षमता पर केंद्रित हो गए हैं।

      सटीक और प्रभावी मार: मिसाइलें 400-450 किमी दूर स्थित दुश्मन के ठिकानों को सटीक निशाना बना सकती हैं। इससे सैन्य ठिकानों या रणनीतिक ढांचों की सुरक्षा के लिए 'दूरी' का महत्व खत्म हो गया है, क्योंकि अब कोई भी स्थान पहुंच से बाहर नहीं है।

      कम जोखिम और उच्च सुरक्षा: रॉकेट और मिसाइलों के बढ़ते उपयोग से युद्ध के मैदान में बड़े पैमाने पर सैनिकों को तैनात करने की जरूरत कम हो गई है। इससे दुश्मन के भीतर गहरी पैठ वाले हमले करना संभव हो गया है, जिससे अपनी सेना के हताहत होने का जोखिम काफी कम हो जाता है।

भारत के लिए रणनीतिक तर्क:

दो-मोर्चों की सुरक्षा चुनौती:

      पाकिस्तान और चीन दोनों ही समर्पित रॉकेट या मिसाइल बल संचालित करते हैं।

      चीन ने 2015 में PLA रॉकेट फोर्स की स्थापना की थी।

      पाकिस्तान ने अगस्त 2025 में अपनी 'आर्मी रॉकेट फोर्स कमांड' की घोषणा की, जो कथित तौर पर चीन के मॉडल पर आधारित है।

हालिया अभियानों से सीख:

      ​'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान भारत ने विश्वसनीय मिसाइल स्ट्राइक क्षमताओं का प्रदर्शन किया।

      पाकिस्तानी एयरबेस के खिलाफ कथित तौर पर ब्रह्मोस (BrahMos) मिसाइलों का इस्तेमाल किया गया, जिसमें 10-11 एयरबेस पर नुकसान की सूचना मिली।

इस ऑपरेशन ने सटीक और उच्च-प्रभाव वाले स्टैंड-ऑफ हमलों की भारत की क्षमता को दर्शाया।

भारत की वर्तमान क्षमताएं:

भारत के पास पहले से ही मजबूत रॉकेट और मिसाइल प्रणालियां हैं, जिनमें शामिल हैं:

      पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट सिस्टम: 120 किमी तक की परीक्षित रेंज (इसे 150 किमी तक बढ़ाने की योजना है और दीर्घकालिक लक्ष्य 300-450 किमी तक है)

      प्रलय (Pralay): सामरिक बैलिस्टिक मिसाइल।

      ब्रह्मोस (BrahMos): सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल।

हालाँकि ये प्रणालियाँ मजबूत प्रतिरोध प्रदान करती हैं, लेकिन वर्तमान में ये अलग-अलग कमान संरचनाओं के तहत काम करती हैं, जिससे पूर्ण परिचालन तालमेल (synergy) सीमित हो जाता है।

एकीकृत रॉकेट-मिसाइल फोर्स के लाभ

      हमलों की एकीकृत योजना और समन्वित निष्पादन।

      तेजी से निर्णय लेना और प्रतिक्रिया समय में कमी।

      सटीक-निर्देशित हथियारों (precision-guided munitions) का इष्टतम उपयोग।

      विरोधियों के खिलाफ बेहतर प्रतिरोधक क्षमता।

      थल सेना में हताहतों की संख्या में कमी।

      तीव्र और सीमित संघर्ष दोनों स्थितियों के लिए बेहतर तैयारी।

निष्कर्ष

भारतीय सेना प्रमुख का 'एकीकृत रॉकेट-मिसाइल फोर्स' का आह्वान युद्ध के बदलते स्वरूप और भारत के जटिल सुरक्षा वातावरण का एक सटीक मूल्यांकन है। चीन और पाकिस्तान दोनों द्वारा समर्पित रॉकेट बल संचालित किए जाने के कारण, ऐसी कमान का गठन अब केवल एक विकल्प नहीं बल्कि रणनीतिक आवश्यकता बन गया है। एक सुव्यवस्थित रॉकेट-मिसाइल फोर्स न केवल भारत की प्रतिरोधक क्षमता (deterrence) को सुदृढ़ करेगी, बल्कि देश की सैन्य तैयारियों को 21वीं सदी के आधुनिक युद्ध की वास्तविकताओं के अनुरूप भी बनाएगी।

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