होम > Blog

Blog / 21 Sep 2026

कर्नाटक में तुलु भाषा को अतिरिक्त आधिकारिक दर्जा

संदर्भ:

हाल ही में 18 सितंबर 2026 को मंगलुरु में आयोजित कर्नाटक मंत्रिमंडल की बैठक में तुलु भाषा को दक्षिण कन्नड़ और उडुपी जिलों में अतिरिक्त आधिकारिक (प्रशासनिक) भाषा का दर्जा देने का निर्णय लिया गया। यह निर्णय तटीय कर्नाटक में तुलु भाषी समुदाय की लंबे समय से चली आ रही मांग के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।

तुलु भाषा:

तुलु दक्षिण भारत की एक प्रमुख द्रविड़ भाषा है। यह मुख्य रूप से कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ और उडुपी जिलों तथा पड़ोसी केरल के कासरगोड क्षेत्र में बोली जाती है। तुलु की अपनी समृद्ध लोक, साहित्यिक और सांस्कृतिक परंपरा है। इसलिए इसका प्रशासनिक स्तर पर उपयोग केवल भाषाई सुविधा का विषय नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संरक्षण और स्थानीय पहचान से भी जुड़ा हुआ है।

Tulu granted status of state's second official language: CM D.K. Shivakumar  announces | Udayavani - Latest English News, Udayavani Newspaper

संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 345

      • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 345 राज्यों को अपनी आधिकारिक भाषा या भाषाएँ निर्धारित करने की संवैधानिक शक्ति देता है। इसके अनुसार, अनुच्छेद 346 और 347 के अधीन रहते हुए, किसी राज्य का विधानमंडल कानून द्वारा राज्य में प्रचलित एक या अधिक भाषाओं अथवा हिंदी को राज्य के सभी या किसी भी आधिकारिक प्रयोजन के लिए अपनाने का प्रावधान कर सकता है।
      • इस प्रकार, संविधान राज्यों को अपनी भाषाई और सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप आधिकारिक भाषा व्यवस्था विकसित करने की पर्याप्त गुंजाइश देता है। वहीं, अनुच्छेद 347 किसी राज्य की आबादी के एक पर्याप्त हिस्से द्वारा किसी भाषा को मान्यता देने की मांग होने पर, राष्ट्रपति को उस भाषा को पूरे राज्य या उसके किसी भाग में आधिकारिक रूप से मान्यता देने का निर्देश देने की शक्ति देता है।

कर्नाटक में कानूनी स्थिति:

      • कर्नाटक राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 2 में कन्नड़ को राज्य की आधिकारिक भाषा घोषित किया गया है। बाद में कन्नड़ भाषा व्यापक विकास अधिनियम, 2022 के माध्यम से सरकारी एवं प्रशासनिक कार्यों में कन्नड़ के उपयोग को और मजबूत किया गया।
      • कुछ विधि विशेषज्ञों और विधि स्नातकों के अनुसार, केवल मंत्रिमंडल का निर्णय पर्याप्त नहीं होगा और तुलु को निर्धारित जिलों में प्रशासनिक भाषा के रूप में लागू करने के लिए संबंधित भाषा कानून में उचित विधायी संशोधन की आवश्यकता पड़ सकती है। इसके बाद विधेयक को राज्य विधानमंडल से पारित कराकर राज्यपाल की स्वीकृति तथा आवश्यक अधिसूचना की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। इस कानूनी प्रक्रिया की अंतिम रूपरेखा संबंधित सरकारी अधिसूचनाओं और विधायी कार्रवाई से स्पष्ट होगी।

अन्य राज्यों का उदाहरण:

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में उर्दू को अतिरिक्त/दूसरी आधिकारिक भाषा का दर्जा देने के लिए संबंधित आधिकारिक भाषा कानूनों में संशोधन किए गए। तेलंगाना में 2017 के संशोधन द्वारा तेलुगु के साथ उर्दू को पूरे राज्य की दूसरी आधिकारिक भाषा घोषित किया गया। आंध्र प्रदेश में भी 2022 में कानून में संशोधन कर उर्दू को सभी जिलों में दूसरी आधिकारिक भाषा का प्रावधान किया गया।

निर्णय का महत्व:

तुलु को अतिरिक्त प्रशासनिक दर्जा मिलने से स्थानीय नागरिकों और प्रशासन के बीच भाषाई पहुँच, सरकारी सेवाओं की प्रभावशीलता तथा सांस्कृतिक संरक्षण को बढ़ावा मिल सकता है। हालांकि, इसके लिए अनुवाद व्यवस्था, प्रशिक्षित मानव संसाधन, प्रशासनिक शब्दावली तथा डिजिटल सामग्री विकसित करना भी आवश्यक होगा।

निष्कर्ष:

तुलु को अतिरिक्त आधिकारिक प्रशासनिक दर्जा देने का निर्णय भारत की भाषाई बहुलता, संघवाद और सहभागी शासन की भावना से जुड़ा विषय है। यह उदाहरण दर्शाता है कि संविधान राज्यों को स्थानीय भाषाओं की प्रशासनिक भूमिका बढ़ाने के लिए पर्याप्त संवैधानिक आधार प्रदान करता है। साथ ही, किसी भी मंत्रिमंडलीय निर्णय को प्रभावी बनाने के लिए संवैधानिक प्रावधानों और मौजूदा राज्य कानूनों के बीच विधिक सामंजस्य आवश्यक है।

 

Aliganj Gomti Nagar Prayagraj