संदर्भ:
31 जुलाई 2025 को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय वस्तुओं पर 25% टैरिफ लगाने की घोषणा की, साथ ही रूस से रक्षा और ऊर्जा की खरीद पर संभावित प्रतिबंधों की बात कही। यह निर्णय भारत-अमेरिका व्यापार वार्ताओं की दिशा को काफी प्रभावित कर सकता है।
भारत-अमेरिका व्यापार समझौता क्या है?
भारत-अमेरिका व्यापार समझौता एक द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) का प्रस्ताव है, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फरवरी 2025 की वाशिंगटन यात्रा के दौरान दोनों देशों ने आगे बढ़ाने पर सहमति जताई थी।
- यह समझौता US-India COMPACT का हिस्सा है, जिसका लक्ष्य 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को $500 अरब तक दोगुना करना है। प्रारंभिक व्यापार सौदे 2025 के अंत तक पूरे करने का लक्ष्य है।
- हालांकि, इन वार्ताओं में पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा लगाए गए 25% टैरिफ के कारण अड़चनें आई हैं।
- चूंकि दोनों देश WTO (विश्व व्यापार संगठन) के सदस्य हैं, इसलिए यह समझौता WTO के नियमों का पालन करना आवश्यक है। WTO की आधारभूत संधि GATT (जनरल एग्रीमेंट ऑन टैरिफ्स एंड ट्रेड) है।
- WTO का एक प्रमुख सिद्धांत है "मोस्ट फेवर्ड नेशन" (MFN), जिसके तहत कोई देश एक व्यापारिक भागीदार को विशेष लाभ नहीं दे सकता जो अन्य को न मिले।
- भले ही यह समझौता औपचारिक रूप से FTA (मुक्त व्यापार समझौता) नहीं कहा जा रहा, लेकिन अगर यह उसी की तरह काम करता है तो इसे कुछ कानूनी शर्तें पूरी करनी होंगी।
- GATT के अनुच्छेद XXIV.8(b) के अनुसार, एक FTA को सदस्य देशों के बीच "लगभग सभी व्यापार" पर शुल्क समाप्त करना होता है, और इस समझौते की जानकारी WTO को देनी आवश्यक है।
भारत-अमेरिका के बीच टैरिफ से जुड़े व्यापारिक विवाद:
भारत और अमेरिका के बीच मुख्य विवाद का कारण भारत की उच्च टैरिफ संरचना है। अमेरिका का मानना है कि इससे व्यापार महंगा और अनुचित हो जाता है।
- भारत औसतन 17% शुल्क वसूलता है, जबकि अमेरिका केवल 3.3%।
- कृषि उत्पादों पर भारत का औसत शुल्क 39% है, जबकि अमेरिका का केवल 5%।
- इस असमानता के कारण अमेरिका का भारत के साथ व्यापार घाटा बढ़कर 2024 में $45.7 अरब हो गया, जो पिछले साल से 5.1% अधिक है।
राजनीति बनाम अर्थव्यवस्था:
ट्रंप की नई घोषणाओं से यह स्पष्ट हुआ है कि अब भारत-अमेरिका संबंधों में अर्थव्यवस्था से अधिक भू-राजनीति (Geopolitics) को प्राथमिकता दी जा रही है।
- ट्रंप ने भारत को रूस से ऊर्जा खरीदने वाला बड़ा देश बताया, और चीन के साथ उसकी तुलना की।
- इसके जवाब में उन्होंने पाकिस्तान के साथ तेल समझौते की घोषणा की जो भारत पर दबाव बनाने की रणनीति मानी जा रही है।
- इससे यह संकेत मिलता है कि अमेरिका अब वार्ता की जगह दबाव के ज़रिए वैश्विक व्यापार समीकरणों को बदलना चाहता है।
भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता में चुनौतियाँ:
- कृषि और डेयरी पर शुल्क घटाने की प्रक्रिया
- गैर-टैरिफ बाधाएँ (जैसे: तकनीकी मानक, सुरक्षा नियम)
- रूल्स ऑफ ओरिजिन – खासकर चीन से जुड़ी आपूर्ति श्रृंखलाओं में
- एंटी-डंपिंग और सेफगार्ड ड्यूटी – जिन्हें अमेरिका हटाना चाहता है
- भारत का अन्य देशों (जैसे UK और UAE) की तरह शून्य शुल्क (Zero-duty access) देने से इनकार
भारत यूरोपीय संघ जैसी निवेश गारंटी या अमेरिका की डिजिटल व्यापार नीति जैसी व्यापक शर्तें स्वीकार करने से पहले लागत-लाभ का मूल्यांकन करना चाहता है।
भारत की रणनीतिक प्राथमिकताएँ:
- निर्यात विविधीकरण – अमेरिकी बाज़ारों पर अत्यधिक निर्भरता को कम करना
- अन्य बड़े समूहों (जैसे EU, अफ्रीकी संघ, लैटिन अमेरिका) के साथ FTA को गहरा करना
- घरेलू प्रतिस्पर्धा को बढ़ाना – उत्पादों की गुणवत्ता और कीमत सुधारना
- संप्रभुता की रक्षा के साथ लचीलापन बनाए रखना – यानि जहां लाभ हो, वहां समझौता करें, लेकिन आत्मसम्मान से समझौता न हो
निष्कर्ष:
भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता अब सिर्फ एक आर्थिक प्रक्रिया नहीं रह गई, बल्कि यह राजनयिक संतुलन और संप्रभु रणनीति की परीक्षा बन चुकी है।
भारत के लिए यह समय है कि वह अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता को मज़बूती से कायम रखे, बहुपक्षीय साझेदारियों को गहराए और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में आपसी सम्मान, पारस्परिकता और संप्रभु समानता जैसे मूल सिद्धांतों पर डटा रहे।