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Blog / 04 Feb 2026

महाराष्ट्र में आदिवासी किसानों का विरोध प्रदर्शन

सन्दर्भ:

हाल ही में महाराष्ट्र के पालघर और नासिक जिलों से हजारों आदिवासी किसान एवं स्थानीय निवासियों ने विरोध प्रदर्शन किया। उनका उद्देश्य लंबे समय से लंबित अधिकारों और पात्रताओं की पूर्ति की मांग को प्रमुखता से उठाना था। इन विरोध प्रदर्शनों में आदिवासी किसानों ने स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर भूमि अधिकार, आजीविका, सिंचाई तथा बुनियादी सेवाओं तक पहुंच से जुड़े मुद्दों की ओर ध्यान आकर्षित किया।

आदिवासी प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगें:

      • वन अधिकार: वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 का पूर्ण और प्रभावी क्रियान्वयन, तथा सरकारी योजनाओं और संस्थागत ऋण तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए व्यक्तिगत नामों से भूमि पट्टों (टाइटल) का निर्गमन।
      • सिंचाई: वर्षा-आधारित धान की खेती से आगे बढ़कर बहु-फसली खेती को संभव बनाने हेतु छोटे बांधों और नदी-लिंकिंग परियोजनाओं का निर्माण।
      • न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP): मक्का, सोयाबीन, प्याज, आम, रागी, ज्वार और बाजरा सहित विविध फसलों के लिए एमएसपी की गारंटी।
      • रोजगार और शिक्षा: पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम (PESA), 1996 का प्रभावी क्रियान्वयन, जिससे आदिवासी स्वशासन और रोजगार के अवसर सुदृढ़ हों। जिला परिषद (जिला परिषद) विद्यालयों में रिक्त पदों को भरना, शिक्षा तक पहुंच में सुधार तथा 24 घंटे बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करना।

पेसा (PESA) अधिनियम और वन अधिकार अधिनियम के बारे में:

PESA अधिनियम, 1996 और वन अधिकार अधिनियम, 2006 आदिवासी समुदायों के सशक्तिकरण और ऐतिहासिक अन्यायों के निवारण हेतु बनाए गए ऐतिहासिक कानून हैं। ये दोनों मिलकर भारत में आदिवासी स्वशासन और वन अधिकारों की आधारशिला हैं।

      • PESA अधिनियम, 1996 (पंचायतों का अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार):
        • पंचायती राज से संबंधित 73वें संविधान संशोधन के प्रावधानों को पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों तक विस्तारित करता है, जो भूरिया समिति की सिफारिशों पर आधारित हैं।
        • ग्राम सभाओं को मुख्य शासन संस्थान के रूप में सशक्त करता है और भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास, लघु जल निकायों तथा खनिजों के प्रबंधन पर अनिवार्य परामर्श अधिकार प्रदान करता है।
        • आदिवासी हितों की रक्षा हेतु शराब, गांव के बाजारों और साहूकारी पर सामाजिक नियंत्रण की व्यवस्था करता है।
        • नोडल मंत्रालय: पंचायती राज मंत्रालय।
      • वन अधिकार अधिनियम, 2006 (FRA):
        • वनवासी अनुसूचित जनजातियों (FDSTs) और अन्य परंपरागत वनवासियों (OTFDs) के पूर्व-विद्यमान अधिकारों को औपचारिक रूप से मान्यता देकर उन्हें भूमि और वन संसाधनों पर अधिकार प्रदान करता है।
        • व्यक्तिगत अधिकार: 13 दिसंबर 2005 से पूर्व खेती की गई भूमि के लिए अधिकतम चार हेक्टेयर तक भूमि पट्टा।
        • सामुदायिक अधिकार: बांस, शहद, तेंदू पत्ता आदि लघु वनोपज (MFP) के संग्रह, प्रबंधन और बिक्री के अधिकार।
        • संरक्षण अधिकार: वन संसाधनों के सतत उपयोग और संरक्षण के लिए सामुदायिक संरक्षण एवं देखरेख।
        • पात्रता: अनुसूचित जनजाति का दर्जा या OTFDs के मामले में वन क्षेत्रों में 75 वर्षों (तीन पीढ़ियों) के निवास का प्रमाण।
        • नोडल मंत्रालय: जनजातीय कार्य मंत्रालय।

प्रणालीगत चिंताएं और क्रियान्वयन में खामियां:

अपने परिवर्तनकारी उद्देश्य के बावजूद, PESA और FRA दोनों के क्रियान्वयन में नौकरशाही उदासीनता, दावों के निपटारे में देरी तथा बड़े विकास परियोजनाओं के साथ टकराव जैसी गंभीर चुनौतियां बनी हुई हैं। एक UNDP रिपोर्ट (2025) ने अधिकार-मान्यता के बाद के शासन” (post-recognition governance) और FRA पट्टाधारकों के बेहतर अभिलेख प्रबंधन की आवश्यकता पर बल दिया है। कुछ अध्ययनों से यह भी संकेत मिलता है कि जहां PESA का प्रभावी क्रियान्वयन हुआ है, वहां वृक्ष आवरण (tree canopy cover) में वृद्धि देखी गई है, जो आदिवासी स्वशासन के सकारात्मक पारिस्थितिक और सामाजिक प्रभावों को दर्शाता है। ये निरंतर बनी खामियां आदिवासी असंतोष को बढ़ावा देती रहती हैं।

निष्कर्ष:

महाराष्ट्र में आदिवासी किसानों के विरोध प्रदर्शन आदिवासी अधिकारों, भूमि शासन और नीतिगत क्रियान्वयन से जुड़ी गहरी संरचनात्मक समस्याओं को उजागर करते हैं। ये PESA और FRA के महत्व को आदिवासी सशक्तिकरण के संवैधानिक साधनों के रूप में रेखांकित करते हैं, साथ ही प्रभावी प्रशासनिक अनुवर्ती कार्रवाई की आवश्यकता और आदिवासी क्षेत्रों में विकास लक्ष्यों, सामाजिक न्याय तथा पारिस्थितिक स्थिरता के बीच संतुलन की व्यापक चुनौती को भी सामने लाते हैं।