चर्चा में क्यों?
हाल ही में जम्मू की एक विशेष एनआईए (NIA) अदालत ने प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के सरगना हाफिज़ सईद के खिलाफ पहलगाम आतंकवादी हमले के मामले में गैर-मौजूदगी (In Absentia) में मुकदमे का ट्रायल चलाने की प्रक्रिया को मंजूरी दी है।
मामले की पृष्ठभूमि:
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- एनआईए ने एक पूरक आरोपपत्र (Supplementary Chargesheet) दायर किया है, जिसमें हाफिज़ सईद को व्यक्तिगत रूप से तथा लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और उसके प्रॉक्सी संगठन द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF) के प्रमुख के रूप में नामित किया गया है।
- हाफिज़ सईद वर्तमान में पाकिस्तान में छिपा हुआ है और उसे तुरंत भारत लाना संभव नहीं है। इस गैर-जमानती वारंट के जारी होने के बाद, अब हाफिज़ सईद को कानूनी रूप से घोषित अपराधी (Proclaimed Offender) या भगोड़ा घोषित करने का रास्ता साफ हो गया है।
- उस पर निम्न कानूनों के तहत आरोप लगाए गए हैं:
- भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023
- गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (UAPA)
- भारत के विरुद्ध युद्ध छेड़ने तथा सीमा-पार आपराधिक साजिश से संबंधित प्रावधान।
- भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023
- चूंकि हाफिज़ सईद के भारतीय अदालत में पेश होने की संभावना अत्यंत कम है, इसलिए राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 356 के तहत अनुपस्थिति में मुकदमा (Trial in Absentia) चलाने की अनुमति अदालत से मांग सकती है।
- एनआईए ने एक पूरक आरोपपत्र (Supplementary Chargesheet) दायर किया है, जिसमें हाफिज़ सईद को व्यक्तिगत रूप से तथा लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और उसके प्रॉक्सी संगठन द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF) के प्रमुख के रूप में नामित किया गया है।
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अनुपस्थिति में मुकदमा (Trial in Absentia) क्या है?
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- ‘अनुपस्थिति में मुकदमा’ वह आपराधिक मुकदमा है, जिसमें अभियुक्त की शारीरिक उपस्थिति के बिना न्यायिक कार्यवाही संचालित की जाती है।
- BNSS की धारा 356 के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति को घोषित अपराधी (Proclaimed Offender) घोषित किया गया हो और वह मुकदमे से बचने के लिए फरार हो तथा उसकी शीघ्र गिरफ्तारी की संभावना न हो, तो न्यायालय लिखित कारण दर्ज करते हुए जांच, सुनवाई और निर्णय की प्रक्रिया उसकी अनुपस्थिति में जारी रख सकता है।
- ऐसी स्थिति में अभियुक्त की अनुपस्थिति को कार्यवाही में उपस्थित रहने के उसके अधिकार के त्याग (Waiver) के रूप में माना जाता है।
- ‘अनुपस्थिति में मुकदमा’ वह आपराधिक मुकदमा है, जिसमें अभियुक्त की शारीरिक उपस्थिति के बिना न्यायिक कार्यवाही संचालित की जाती है।
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किन व्यक्तियों पर यह प्रावधान लागू होता है?
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- यह प्रावधान केवल BNSS की धारा 84 के तहत घोषित घोषित अपराधियों (Proclaimed Offenders) पर लागू होता है।
- साथ ही, यह केवल उन गंभीर अपराधों तक सीमित है, जिनमें:
- 10 वर्ष या उससे अधिक का कारावास,
- आजीवन कारावास, या
- मृत्युदंड का प्रावधान हो।
- 10 वर्ष या उससे अधिक का कारावास,
- इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि इस व्यवस्था का उपयोग केवल गंभीर आपराधिक मामलों में ही किया जाए।
- यह प्रावधान केवल BNSS की धारा 84 के तहत घोषित घोषित अपराधियों (Proclaimed Offenders) पर लागू होता है।
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प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय (Procedural Safeguards)
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- धारा 356 निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial) के अधिकार की रक्षा के लिए कई सुरक्षा उपाय प्रदान करती है, जैसे-
- कम-से-कम 30 दिनों के अंतराल पर दो गिरफ्तारी वारंट जारी किए जाएं।
- अभियुक्त को नोटिस समाचार-पत्रों में प्रकाशित किया जाए।
- नोटिस उसकी अंतिम ज्ञात आवासीय पते पर चस्पा किया जाए।
- उसके किसी रिश्तेदार या मित्र को सूचना दी जाए।
- आरोप तय (Framing of Charges) होने के 90 दिन बाद ही मुकदमे की सुनवाई प्रारंभ की जा सकती है।
- यदि अभियुक्त का कोई वकील नहीं है, तो न्यायालय राज्य व्यय पर अधिवक्ता (State-funded Defence Counsel) नियुक्त करेगा।
- गवाहों के बयान ऑडियो-विजुअल माध्यम से दर्ज कर सुरक्षित रखे जा सकते हैं, ताकि भविष्य में उनकी समीक्षा की जा सके।
- कम-से-कम 30 दिनों के अंतराल पर दो गिरफ्तारी वारंट जारी किए जाएं।
- धारा 356 निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial) के अधिकार की रक्षा के लिए कई सुरक्षा उपाय प्रदान करती है, जैसे-
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महत्त्व:
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- फरार अभियुक्तों के कारण होने वाली न्यायिक देरी को रोकने में सहायता मिलती है।
- सीमा-पार आतंकवाद के विरुद्ध भारत की कानूनी कार्रवाई को अधिक प्रभावी बनाता है।
- न्यायिक प्रक्रिया की दक्षता (Judicial Efficiency) बढ़ाता है।
- राष्ट्रीय सुरक्षा और निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया के बीच संतुलन स्थापित करता है।
- हाफिज़ सईद का मामला BNSS के इस नए कानूनी प्रावधान की पहली प्रमुख परीक्षाओं में से एक माना जा रहा है।
- फरार अभियुक्तों के कारण होने वाली न्यायिक देरी को रोकने में सहायता मिलती है।
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