संदर्भ:
16 जनवरी 2026 को मनाए गए तिरुवल्लुवर दिवस के अवसर पर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुप्रसिद्ध तमिल कवि-दार्शनिक तिरुवल्लुवर को श्रद्धांजलि अर्पित की। इस दौरान उन्होंने तिरुवल्लुवर की शिक्षाओं और उनकी साहित्यिक प्रतिभा की शाश्वत प्रासंगिकता पर विशेष बल दिया।
तिरुवल्लुवर के विषय में:
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- तिरुवल्लुवर, जिन्हें अक्सर केवल 'वल्लुवर' के नाम से भी पुकारा जाता है, महानतम तमिल कवि-दार्शनिकों में से एक और शास्त्रीय तमिल साहित्यिक परंपरा के एक प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं। यद्यपि उनके जन्म और जीवन के सटीक विवरणों पर विद्वानों के बीच मतभेद हैं, परंतु परंपरा के अनुसार उन्हें लगभग 2000 वर्ष पूर्व का माना जाता है। कुछ अनुमानों के अनुसार उनका काल ईसा पूर्व चौथी शताब्दी से छठी शताब्दी ईस्वी के मध्य रहा है।
- वे, वर्तमान चेन्नई के मायलापुर के निवासी थे। उनकी कालजयी रचना 'तिरुक्कुरल' में 1,330 दोहे (कुरल) शामिल हैं, जो नैतिकता, शासन व्यवस्था, अर्थशास्त्र, सदाचार और प्रेम जैसे विविध विषयों का अन्वेषण करते हैं। तिरुक्कुरल को उसके सार्वभौमिक मूल्यों, नैतिक स्पष्टता और धर्मनिरपेक्ष ज्ञान के लिए सराहा जाता है, जो धार्मिक और सांस्कृतिक सीमाओं से परे है। इसे अक्सर 'तमिल वेद' या नैतिकता का वैश्विक ग्रंथ भी कहा जाता है।
- तिरुवल्लुवर, जिन्हें अक्सर केवल 'वल्लुवर' के नाम से भी पुकारा जाता है, महानतम तमिल कवि-दार्शनिकों में से एक और शास्त्रीय तमिल साहित्यिक परंपरा के एक प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं। यद्यपि उनके जन्म और जीवन के सटीक विवरणों पर विद्वानों के बीच मतभेद हैं, परंतु परंपरा के अनुसार उन्हें लगभग 2000 वर्ष पूर्व का माना जाता है। कुछ अनुमानों के अनुसार उनका काल ईसा पूर्व चौथी शताब्दी से छठी शताब्दी ईस्वी के मध्य रहा है।
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सांस्कृतिक और दार्शनिक महत्व:
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- तिरुवल्लुवर की शिक्षाएं धर्मपरायण जीवन, नैतिक आचरण, करुणा, पारिवारिक एवं सामाजिक कर्तव्यों और नैतिक शासन पर बल देती हैं। वे यह दर्शाते हैं कि सांसारिक जिम्मेदारियों को पूरा करते हुए भी आध्यात्मिक श्रेष्ठता और नैतिक जीवन प्राप्त किया जा सकता है। उनका यह संदेश नैतिक मूल्यों और सामाजिक सद्भाव पर समकालीन चर्चाओं में गहराई से प्रतिध्वनित होता है।
- संपूर्ण तमिलनाडु और पुडुचेरी में तिरुवल्लुवर दिवस को अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है, जो तमिल साहित्य और भारतीय दर्शन में उनके योगदान का स्मरण कराता है। राजनेता और विद्वान आधुनिक जीवन में नैतिकता, शासन और मानवीय मूल्यों से जुड़ी समस्याओं के समाधान हेतु तिरुक्कुरल की व्यावहारिक प्रासंगिकता को निरंतर रेखांकित करते रहते हैं।
- तिरुवल्लुवर की शिक्षाएं धर्मपरायण जीवन, नैतिक आचरण, करुणा, पारिवारिक एवं सामाजिक कर्तव्यों और नैतिक शासन पर बल देती हैं। वे यह दर्शाते हैं कि सांसारिक जिम्मेदारियों को पूरा करते हुए भी आध्यात्मिक श्रेष्ठता और नैतिक जीवन प्राप्त किया जा सकता है। उनका यह संदेश नैतिक मूल्यों और सामाजिक सद्भाव पर समकालीन चर्चाओं में गहराई से प्रतिध्वनित होता है।
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निष्कर्ष:
तिरुवल्लुवर नैतिक ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक बने हुए हैं। उनकी रचना 'तिरुक्कुरल' न केवल तमिल साहित्यिक परंपरा का आधारशिला है, बल्कि एक वैश्विक नैतिक मार्गदर्शिका भी है, जिसे हर क्षेत्र और युग में महत्व दिया जाता है।
