सन्दर्भ:
हाल ही में 1 फ़रवरी को थाई पूसम पर्व मनाया गया। थाई पूसम दक्षिण भारत, विशेष रूप से तमिल हिंदू समुदाय द्वारा मनाया जाने वाला एक अत्यंत महत्वपूर्ण और आध्यात्मिक रूप से जीवंत त्योहार है। यह पर्व तमिल कैलेंडर के 'थाई' महीने (जनवरी-फरवरी) की पूर्णिमा को मनाया जाता है, जब पुष्य (पूसम) नक्षत्र होता है। यह उत्सव भगवान शिव और माता पार्वती के छोटे पुत्र भगवान मुरुगन (कार्तिकेय) की विजय और शक्ति को समर्पित है।
पौराणिक महत्व:
थाई पूसम का इतिहास धार्मिक मान्यताओं में गहराई से है। पौराणिक कथा के अनुसार, इसी दिन देवी पार्वती ने भगवान मुरुगन को एक दिव्य शक्ति-युक्त भाला, जिसे 'वेल' कहा जाता है, भेंट किया था। इसी 'वेल' की सहायता से मुरुगन ने बुराई के प्रतीक राक्षस तारकासुर और उसकी सेना का वध कर देवताओं को मुक्त कराया था। इसलिए, यह त्योहार अंधकार पर प्रकाश और अज्ञान पर ज्ञान की विजय का प्रतीक माना जाता है।
कठिन तपस्या और अनुष्ठान:
थाई पूसम अपनी कठिन तपस्या पद्धतियों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। इस दिन श्रद्धालु अपनी भक्ति और कृतज्ञता प्रकट करने के लिए कई तरह के अनुष्ठान करते हैं:
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- कावड़ी अट्टम: यह इस पर्व का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। 'कावड़ी' एक सजी हुई लकड़ी या धातु की संरचना होती है जिसे भक्त अपने कंधों पर उठाते हैं। इसे ढोना भगवान के प्रति समर्पण और कष्ट सहने की शक्ति का प्रतीक है।
- शारीरिक कष्ट (Piercing): कई श्रद्धालु अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए अपने गालों, जीभ या शरीर के अन्य हिस्सों में छोटी सुइयां या भाले (वेल) चुभाते हैं। यह इस विश्वास का प्रतीक है कि भगवान के स्मरण में उन्हें दर्द महसूस नहीं होता।
- पाल कुडम: कई भक्त, विशेष रूप से महिलाएं, अपने सिर पर दूध के बर्तन (पाल कुडम) लेकर पैदल चलकर मंदिर तक जाती हैं और भगवान का अभिषेक करती हैं।
- व्रत और शुद्धि: इस दिन की तैयारी 48 दिन पहले से शुरू हो जाती है, जिसमें भक्त ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, केवल सात्विक भोजन करते हैं और निरंतर प्रार्थना करते हैं।
- कावड़ी अट्टम: यह इस पर्व का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। 'कावड़ी' एक सजी हुई लकड़ी या धातु की संरचना होती है जिसे भक्त अपने कंधों पर उठाते हैं। इसे ढोना भगवान के प्रति समर्पण और कष्ट सहने की शक्ति का प्रतीक है।
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वैश्विक स्तर पर आयोजन-
निष्कर्ष:
थाई पूसम केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि मानसिक अनुशासन, आत्मसंयम और अटूट आस्था का जीवंत उदाहरण है। यह पर्व यह संदेश देता है कि दृढ़ विश्वास, तपस्या और भक्ति के माध्यम से मनुष्य जीवन की कठिन से कठिन बाधाओं को भी पार कर सकता है।

