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Blog / 19 Sep 2026

तेलंगाना उच्च न्यायालय ने विधायक को अयोग्य घोषित किया

संदर्भ:

हाल ही में, तेलंगाना उच्च न्यायालय ने दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) के तहत खैरताबाद के विधायक दानम नागेंद्र को अयोग्य घोषित कर दिया। न्यायालय ने तेलंगाना विधानसभा अध्यक्ष के उस निर्णय को रद्द कर दिया, जिसमें नागेंद्र को अयोग्य ठहराने की मांग करने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया गया था।

पृष्ठभूमि:

      • नागेंद्र ने 2018 और 2023 में खैरताबाद विधानसभा सीट से चुनाव जीता था। दिसंबर 2023 के विधानसभा चुनाव में वे BRS के टिकट पर निर्वाचित हुए, लेकिन मार्च 2024 में कांग्रेस में शामिल हो गए। बाद में उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में सिकंदराबाद लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन भाजपा के जी. किशन रेड्डी से हार गए।
      • विपक्ष ने विधानसभा अध्यक्ष के निर्णय को चुनौती देते हुए नागेंद्र को अयोग्य घोषित करने की मांग की थी।

उच्च न्यायालय का निर्णय:

      • उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने विधानसभा अध्यक्ष के निर्णय को रद्द करते हुए नागेंद्र को विधायक के रूप में अयोग्य घोषित कर दिया।
      • यह निर्णय महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दर्शाता है कि दसवीं अनुसूची के तहत विधानसभा अध्यक्ष द्वारा लिए गए निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन हैं। यह मामला दल-बदल से संबंधित याचिकाओं पर संवैधानिक प्राधिकारियों द्वारा निर्णय लेने में लगने वाले समय को लेकर भी प्रश्न उठाता है।

संवैधानिक प्रावधान:

      • अनुच्छेद 190 – सीटों का रिक्त होना: अनुच्छेद 190(3) राज्य विधानमंडल में सीटों के रिक्त होने से संबंधित है। विभिन्न परिस्थितियों में किसी सदस्य की सीट तब रिक्त हो सकती है, जब वह सदस्य अयोग्यता के अधीन हो जाता है।
      • अनुच्छेद 191 – सदस्यता के लिए अयोग्यताएँ: अनुच्छेद 191(2) के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्य है, तो वह राज्य की विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य चुने जाने और सदस्य बने रहने के लिए अयोग्य होगा। इस प्रकार, अनुच्छेद 191 राज्य विधानमंडल की सदस्यता और दल-बदल विरोधी कानून के बीच संवैधानिक संबंध स्थापित करता है।

दल-बदल विरोधी कानून के बारे में:

दल-बदल विरोधी कानून को 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 के माध्यम से संविधान में शामिल किया गया था। इसका उद्देश्य निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा राजनीतिक या व्यक्तिगत लाभ के लिए दलों का परिवर्तन करने की प्रवृत्ति को रोकना है।

अयोग्यता के आधार:

दसवीं अनुसूची के तहत किसी विधायक को निम्नलिखित परिस्थितियों में अयोग्य घोषित किया जा सकता है:

      • स्वेच्छा से अपनी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता छोड़ना।
      • पार्टी व्हिप का उल्लंघन करना अर्थात पूर्व अनुमति के बिना पार्टी के निर्देशों के विपरीत मतदान करना या मतदान से अनुपस्थित रहना, और पार्टी द्वारा 15 दिनों के भीतर उस कार्रवाई को स्वीकार न किया जाना।
      • किसी निर्दलीय सदस्य द्वारा चुनाव के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होना।
      • किसी नामित सदस्य द्वारा सदन में सीट ग्रहण करने के छह महीने बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होना।

अपवाद:

      • विलय:
        • दल-बदल के आधार पर अयोग्यता तब लागू नहीं होती, जब कोई राजनीतिक दल किसी अन्य राजनीतिक दल में विलय करता है और संबंधित विधायी दल के कम-से-कम दो-तिहाई सदस्य इस विलय के पक्ष में सहमत हों।
        • पहले मौजूद एक-तिहाई सदस्यों के विभाजन (Split) का अपवाद 91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा समाप्त कर दिया गया था।
      • विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका और न्यायिक समीक्षा:
        • दसवीं अनुसूची के पैरा 6 के तहत अयोग्यता से संबंधित प्रश्नों पर निर्णय लेने का अधिकार विधानसभा अध्यक्ष/सभापति को दिया गया है।
        • के. निहोतो होलोहन बनाम जाचिल्हू (1992) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने दल-बदल विरोधी कानून की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा। साथ ही, न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि विधानसभा अध्यक्ष का निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन है।

महत्त्व:

यह मामला दलीय अनुशासन, विधायी स्थिरता और निर्वाचित प्रतिनिधियों की स्वतंत्रता के बीच संतुलन से जुड़े प्रश्नों को सामने लाता है। यह दल-बदल से संबंधित याचिकाओं पर निर्णय लेने में होने वाली देरी तथा विधायिका के अधिकार और न्यायिक समीक्षा के बीच संतुलन से जुड़े मुद्दों को भी रेखांकित करता है।

 

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