चर्चा में क्यों?
हाल ही में प्रसिद्ध पंडवानी गायिका एवं पद्म विभूषण सम्मान से अलंकृत तीजन बाई का लंबी बीमारी के बाद रायपुर स्थित एम्स में निधन हो गया। उनके निधन के साथ भारतीय लोकसंगीत और लोककथा-वाचन की एक गौरवशाली परंपरा का महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त हो गया।
तीजन बाई कौन थीं?
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- तीजन बाई भारत की सबसे प्रसिद्ध लोक कलाकारों में से एक थीं। उन्होंने पंडवानी जैसी पारंपरिक लोककथा-वाचन शैली को देश-विदेश में नई पहचान दिलाई। उनका जन्म छत्तीसगढ़ के भिलाई के निकट गनियारी गाँव में हुआ था। साधारण और वंचित पृष्ठभूमि से निकलकर उन्होंने विश्व स्तर पर भारतीय लोक संस्कृति का प्रतिनिधित्व किया।
- वे कपालिक शैली में पंडवानी प्रस्तुत करने वाली पहली महिला मानी जाती हैं। इस प्रकार उन्होंने सदियों से चली आ रही लैंगिक बाधाओं को तोड़ते हुए लोककला के क्षेत्र में महिलाओं के लिए नए अवसरों का मार्ग प्रशस्त किया।
- तीजन बाई भारत की सबसे प्रसिद्ध लोक कलाकारों में से एक थीं। उन्होंने पंडवानी जैसी पारंपरिक लोककथा-वाचन शैली को देश-विदेश में नई पहचान दिलाई। उनका जन्म छत्तीसगढ़ के भिलाई के निकट गनियारी गाँव में हुआ था। साधारण और वंचित पृष्ठभूमि से निकलकर उन्होंने विश्व स्तर पर भारतीय लोक संस्कृति का प्रतिनिधित्व किया।
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पंडवानी के बारे में:
पंडवानी भारत की प्रमुख लोकनाट्य परंपराओं में से एक है, जिसका उद्गम मुख्यतः छत्तीसगढ़ में हुआ। इसका प्रदर्शन मध्य प्रदेश और ओडिशा के कुछ क्षेत्रों में भी किया जाता है। यह संगीत, कथा-वाचन और नाटकीय अभिनय का अनूठा संगम है, जिसके माध्यम से महाभारत के प्रसंगों को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
अर्थ एवं अवधारणा:
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- 'पंडवानी' शब्द का शाब्दिक अर्थ है- "पांडवों की कथा"। इस परंपरा में महाभारत के चुनिंदा प्रसंगों का वर्णन किया जाता है, जिसमें विशेष रूप से भीम के चरित्र पर अधिक ध्यान दिया जाता है।
- पंडवानी का कलाकार एक साथ गायक, कथावाचक और अभिनेता की भूमिका निभाता है। वह अपनी प्रभावशाली प्रस्तुति के माध्यम से महाभारत की कथाओं को जीवंत बना देता है।
- शास्त्रीय रंगमंच के विपरीत, पंडवानी पूरी तरह मौखिक परंपरा, तात्कालिक अभिव्यक्ति (इम्प्रोवाइज़ेशन) तथा कलाकार और दर्शकों के प्रत्यक्ष संवाद पर आधारित होती है।
- 'पंडवानी' शब्द का शाब्दिक अर्थ है- "पांडवों की कथा"। इस परंपरा में महाभारत के चुनिंदा प्रसंगों का वर्णन किया जाता है, जिसमें विशेष रूप से भीम के चरित्र पर अधिक ध्यान दिया जाता है।
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प्रस्तुति शैली एवं संरचना:
पंडवानी का प्रदर्शन अत्यंत जीवंत, प्रभावशाली और अभिव्यक्तिपूर्ण होता है। इसमें कलाकार बहुत कम मंच-सामग्री का उपयोग करता है, लेकिन अपनी कल्पनाशक्ति और अभिनय से अनेक पात्रों तथा घटनाओं को प्रस्तुत करता है।
इसके प्रमुख तत्व हैं:
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- तंबूरा/एकतारा का उपयोग, जो संगीत वाद्य होने के साथ-साथ प्रतीकात्मक मंच-सामग्री का भी कार्य करता है।
- नाटकीय हाव-भाव एवं शारीरिक गतिविधियाँ, जिनके माध्यम से विभिन्न दृश्य प्रस्तुत किए जाते हैं।
- स्वर में परिवर्तन (वोकल मॉड्यूलेशन) द्वारा अलग-अलग पात्रों का चित्रण।
- दर्शकों से प्रत्यक्ष संवाद, जिससे प्रस्तुति अधिक रोचक और प्रभावशाली बनती है।
- तंबूरा/एकतारा का उपयोग, जो संगीत वाद्य होने के साथ-साथ प्रतीकात्मक मंच-सामग्री का भी कार्य करता है।
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प्रस्तुति के दौरान कलाकार कई बार कथा को रोककर उसका अर्थ समझाता है, टिप्पणी करता है या हास्य का समावेश करता है। यही कारण है कि प्रत्येक पंडवानी प्रस्तुति अपने आप में विशिष्ट होती है।
पंडवानी की प्रमुख शैलियाँ:
पंडवानी का प्रदर्शन मुख्यतः दो प्रमुख शैलियों में किया जाता है-
1. कपालिक शैली
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- खड़े होकर प्रस्तुत की जाने वाली अत्यंत नाटकीय शैली।
- इसमें कलाकार मंच पर घूमते हुए अभिनय, हाव-भाव और नृत्य जैसी मुद्राओं का प्रयोग करता है।
- इस शैली को विश्व स्तर पर प्रसिद्ध बनाने का श्रेय तीजन बाई को जाता है।
- खड़े होकर प्रस्तुत की जाने वाली अत्यंत नाटकीय शैली।
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2. वेदमती शैली
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- बैठकर प्रस्तुत की जाने वाली अपेक्षाकृत शांत और कथात्मक शैली।
- इसमें अभिनय की अपेक्षा कथा-वाचन पर अधिक जोर दिया जाता है।
- इसे पारंपरिक मौखिक कथा-पाठ की शैली के अधिक निकट माना जाता है।
- बैठकर प्रस्तुत की जाने वाली अपेक्षाकृत शांत और कथात्मक शैली।
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निष्कर्ष:
तीजन बाई का जीवन प्रेरणादायक उदाहरण है कि दृढ़ संकल्प और प्रतिभा किस प्रकार किसी लोक परंपरा को वैश्विक पहचान दिला सकती है। उन्होंने न केवल पंडवानी को विश्व मंच तक पहुँचाया, बल्कि लोककला के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी को भी नई दिशा दी।
