संदर्भ:
हाल ही में कराधान तथा अन्य विधियाँ (संशोधन) विधेयक, 2026 लोकसभा द्वारा पारित किया गया है। यह विधेयक आयकर (संशोधन) अध्यादेश, 2026 का स्थान लेता है, जिसे 5 जून, 2026 को प्रख्यापित किया गया था।
विधेयक के उद्देश्य:
इस विधेयक का उद्देश्य इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण को प्रोत्साहित करना, विदेशी निवेश आकर्षित करना, भारत को वैश्विक वित्तीय एवं विनिर्माण केंद्र के रूप में सुदृढ़ बनाना तथा यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) और रुपे (RuPay) लेन-देन से संबंधित शून्य व्यापारी छूट दर (Zero Merchant Discount Rate - Zero-MDR) व्यवस्था में भविष्य में किए जाने वाले परिवर्तनों को वैधानिक आधार प्रदान करना है।
प्रमुख प्रावधान:
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- विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) तथा अंतरराष्ट्रीय निपटान बैंक (BIS) को कर छूट: विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) तथा अंतरराष्ट्रीय निपटान बैंक (Bank for International Settlements - BIS) को 1 अप्रैल, 2026 से सरकारी प्रतिभूतियों (Government Securities – G-Secs) में निवेश से प्राप्त ब्याज एवं पूंजीगत लाभ पर आयकर से छूट प्रदान की गई है। इसका उद्देश्य भारत के ऋण बाजार में विदेशी पोर्टफोलियो निवेश को बढ़ावा देना है।
- इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण को प्रोत्साहन: भारतीय अनुबंधित विनिर्माताओं (Contract Manufacturers) को मोबाइल फोन, लैपटॉप, सर्वर तथा अन्य अधिसूचित इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के निर्माण हेतु सीमा-शुल्क बंधित गोदामों (Customs-Bonded Warehouses) में इलेक्ट्रॉनिक अवयवों का भंडारण करने वाली विदेशी कंपनियों को कर छूट प्रदान की गई है। यह सुविधा 31 मार्च, 2041 तक उपलब्ध रहेगी।
- हीरा क्षेत्र को प्रोत्साहन: विदेशी हीरा खनन कंपनियों, अधिकृत क्रेताओं (Sightholders), दलालों तथा नीलामी संस्थाओं को अधिसूचित विशेष क्षेत्रों में अपरिष्कृत हीरों (Rough Diamonds) की बिक्री से अर्जित आय पर कर से छूट प्रदान की गई है।
- निवेश कोषों के लिए नियमों में शिथिलता: भारत से संचालित अपतटीय (Offshore) निवेश कोषों के लिए न्यूनतम निवेशकों की संख्या, कोष के न्यूनतम आकार तथा निवेश सीमा जैसी शर्तों को समाप्त कर दिया गया है, जिससे भारत को वैश्विक कोष प्रबंधन केंद्र के रूप में विकसित करने में सहायता मिलेगी।
- व्यावसायिक न्यास तथा डेटा केंद्र: इस विधेयक के माध्यम से रियल एस्टेट निवेश न्यास (REIT) तथा अवसंरचना निवेश न्यास (InvIT) के कराधान को अधिक तर्कसंगत बनाया गया है। साथ ही, भारतीय कंपनियों द्वारा संचालित पट्टे (लीज़) पर लिए गए डेटा केंद्रों को भी कर संबंधी लाभ प्रदान किए गए हैं।
- शून्य व्यापारी छूट दर (Zero-MDR) व्यवस्था: इस विधेयक द्वारा भुगतान एवं निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 को आयकर अधिनियम से पृथक कर दिया गया है, जिससे भविष्य में सरकार को UPI तथा RuPay लेन-देन के लिए शून्य-MDR नीति में आवश्यक संशोधन करने का अधिकार प्राप्त होगा।
- विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) तथा अंतरराष्ट्रीय निपटान बैंक (BIS) को कर छूट: विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) तथा अंतरराष्ट्रीय निपटान बैंक (Bank for International Settlements - BIS) को 1 अप्रैल, 2026 से सरकारी प्रतिभूतियों (Government Securities – G-Secs) में निवेश से प्राप्त ब्याज एवं पूंजीगत लाभ पर आयकर से छूट प्रदान की गई है। इसका उद्देश्य भारत के ऋण बाजार में विदेशी पोर्टफोलियो निवेश को बढ़ावा देना है।
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महत्त्व:
यह विधेयक मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया तथा उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना के उद्देश्यों को सुदृढ़ करता है। यह विदेशी पूंजी को आकर्षित करने, भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं से जोड़ने, इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण को बढ़ावा देने, डिजिटल अवसंरचना को सशक्त बनाने तथा वित्तीय बाजारों को गहरा करने में सहायक होगा। साथ ही, यह नीतिगत स्थिरता को बढ़ाकर भारत के निवेश वातावरण को अधिक अनुकूल बनाता है।
चुनौतियाँ:
कर छूटों के कारण अल्पकाल में सरकार के राजस्व में कमी आ सकती है तथा विदेशी कंपनियों को प्राथमिकता दिए जाने संबंधी चिंताएँ उत्पन्न हो सकती हैं। इसके अतिरिक्त, शून्य-MDR व्यवस्था में किसी भी प्रकार का परिवर्तन करते समय भुगतान सेवा प्रदाताओं की वित्तीय स्थिरता तथा व्यापारियों एवं उपभोक्ताओं के लिए डिजिटल भुगतान की वहनीयता के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक होगा।
आगे की राह:
इस विधेयक की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि कर प्रोत्साहनों के परिणामस्वरूप वास्तविक निवेश, रोजगार सृजन तथा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण सुनिश्चित हो। साथ ही, पारदर्शी नियामकीय व्यवस्था, संतुलित कर नीति तथा शून्य-MDR प्रणाली में किसी भी परिवर्तन का सावधानीपूर्वक क्रियान्वयन निवेशकों के विश्वास को बनाए रखने तथा भारत के तीव्र गति से विकसित हो रहे डिजिटल भुगतान तंत्र की सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक होगा।
निष्कर्ष:
कराधान तथा अन्य विधियाँ (संशोधन) विधेयक, 2026 एक दूरदर्शी सुधार है, जिसका उद्देश्य भारत को विनिर्माण, निवेश तथा डिजिटल नवाचार का वैश्विक केंद्र बनाना है। कराधान के युक्तिकरण तथा विभिन्न क्षेत्रों के लिए लक्षित प्रोत्साहनों के माध्यम से यह विधेयक भारत की दीर्घकालिक आर्थिक प्रतिस्पर्धात्मकता को सुदृढ़ करता है तथा समावेशी एवं सतत आर्थिक विकास को गति प्रदान करता है।
