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Blog / 27 Jun 2025

"वकील-मुवक्किल विशेषाधिकार पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी"

सन्दर्भ:

हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी में स्पष्ट किया कि पुलिस या अभियोजन एजेंसियों द्वारा अधिवक्ताओं को समन जारी करना, सिर्फ इसलिए कि वे अपने मुवक्किल को कानूनी सलाह दे रहे हैं, कानून के मूलभूत सिद्धांतों और वकीलों के विशेषाधिकारों का उल्लंघन है। यह टिप्पणी उस समय आई जब गुजरात के एक अधिवक्ता को, अपने मुवक्किल को ऋण विवाद मामले में जमानत दिलवाने के कारण, पुलिस द्वारा समन भेजा गया था।

हालिया घटनाक्रम

12 और 18 जून, 2025 को प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ताओं (अरविंद दातार और प्रताप वेणुगोपाल) को केयर हेल्थ इंश्योरेंस लिमिटेड के ESOP आवंटन मामले में समन भेजे गए। इससे वकीलों में व्यापक असंतोष उत्पन्न हुआ और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने इसकी कड़ी आलोचना की।

अधिवक्ता-मुवक्किल संपर्क: एक विशेषाधिकार

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की जगह भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Bharatiya Sakshya Adhiniyam - BSA), 2023 ने ले ली है। इस नए कानून की धारा 132 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अधिवक्ता और उनके मुवक्किल के बीच का संवाद गोपनीय है और उसे तीसरे पक्ष के समक्ष प्रकट नहीं किया जा सकता। यह गोपनीयता न केवल मौखिक, बल्कि लिखित और इलेक्ट्रॉनिक रूपों में भी लागू होती है।

हालाँकि, तीन अपवाद निर्धारित किए गए हैं

1.        यदि मुवक्किल इस गोपनीयता को समाप्त करने की अनुमति देता है,

2.      यदि यह संप्रेषण किसी गैरकानूनी उद्देश्य से संबंधित हो,

3.      यदि अधिवक्ता को सेवा के दौरान कोई अपराध घटित होता हुआ दिखे।

यह विशेषाधिकार केवल अधिवक्ताओं को प्राप्त हैचार्टर्ड अकाउंटेंट्स, कंपनी सेक्रेटरी या अन्य किसी पेशेवर को नहीं।

न्यायालयों की दिशा और विश्लेषण:

भारत की विभिन्न उच्च न्यायालयों ने समय-समय पर स्पष्ट किया है कि अधिवक्ताओं को केवल कानूनी सलाह देने के आधार पर समन नहीं भेजा जा सकता।

1. ए. वी. पवित्रन बनाम सीबीआई (2024): बॉम्बे हाईकोर्ट ने CBI द्वारा गोवा में अधिवक्ता पवित्रन को जारी समन को रद्द करते हुए कहा कि “once privileged, always privileged” (एक बार विशेषाधिकार प्राप्त हुआ, तो वह हमेशा लागू रहेगा)। अदालत ने यह भी कहा कि कोई भी अधिवक्ता अपने पेशेवर दायित्व के दौरान प्राप्त जानकारी को प्रकट नहीं कर सकता।

2. प्रराम इन्फ्रा बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2025): इसी प्रकार, मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने अधिवक्ता राहुल महेश्वरी को जारी समन को भी रद्द करते हुए कहा कि जब अधिवक्ता न तो आरोपी हो और न ही गवाह, तो इस प्रकार का समन देना अनुचित है।

निष्कर्ष:

एक न्यायिक प्रणाली, जहाँ वकील स्वतंत्र रूप से अपने मुवक्किल की रक्षा कर सकें, लोकतंत्र का एक अनिवार्य अंग है। यदि अधिवक्ताओं को बार-बार समन या पूछताछ का सामना करना पड़े, तो इससे उनके पेशे की स्वतंत्रता, मुवक्किल की निजता और न्याय प्राप्त करने के अधिकार पर गहरी चोट पहुँचती है।

 

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