संदर्भ:
हाल ही में 4 नवंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि दो से अधिक संतान वाले व्यक्तियों को स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने वाले कानून वर्तमान समय में अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं। इसका कारण घटती प्रजनन दर और बदलती जनसांख्यिकीय प्रवृत्तियाँ हैं। न्यायालय ने वर्ष 2003 के जावेद बनाम हरियाणा राज्य (Javed v. State of Haryana) मामले में दिए गए निर्णय पर पुनर्विचार के लिए इसे बड़ी पीठ के पास भेज दिया है।
पृष्ठभूमि: दो-संतान मानदंड (Two-Child Norm)
दो-संतान मानदंड से तात्पर्य राज्य स्तर पर लागू उन कानूनी प्रावधानों से है, जिनके तहत दो से अधिक संतान वाले व्यक्तियों को पंचायती राज संस्थाओं और अन्य स्थानीय निकायों में चुनाव लड़ने या निर्वाचित पद पर बने रहने से अयोग्य घोषित कर दिया जाता है। इन प्रतिबंधों को परिवार नियोजन और जनसंख्या स्थिरीकरण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लागू किया गया था, न कि देशभर में परिवार के आकार पर कोई अनिवार्य सीमा लगाने के लिए।
सुप्रीम कोर्ट का पूर्ववर्ती निर्णय: जावेद बनाम हरियाणा राज्य (2003)
वर्ष 2003 में तीन न्यायाधीशों की पीठ ने हरियाणा पंचायती राज अधिनियम, 1994 के तहत दो-संतान मानदंड की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा था। न्यायालय ने कहा था कि जनसंख्या नियंत्रण राज्य का एक वैध उद्देश्य है, चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक अधिकार के बजाय एक वैधानिक अधिकार है तथा यह प्रतिबंध संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन नहीं करता है।
हालिया मामला: मंगला भीमराव इंगले मामला (Mangala Bhimrao Ingle Case)
वर्तमान कार्यवाही महाराष्ट्र के काकोडा ग्राम पंचायत की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव इंगले द्वारा दायर अपील से संबंधित है। वर्ष 2014 में उनकी तीसरी संतान के जन्म के बाद महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 की धारा 14(1)(j-1) के तहत उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया गया था। अगस्त 2025 में बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा उनकी अयोग्यता को बरकरार रखने के बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने जावेद मामले में दिए गए पूर्ववर्ती निर्णय पर पुनर्विचार के लिए इसे बड़ी पीठ के पास भेज दिया।
दो-संतान मानदंड की प्रासंगिकता में कमी का कारण:
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- घटती प्रजनन दर (Declining Fertility Rate): भारत की कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate–TFR) वर्ष 2024 में घटकर 1.9 हो गई, जो लगभग 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर की प्रजनन दर से कम है। यह घटती प्रजनन दर और वृद्ध होती जनसंख्या की ओर बढ़ते बदलाव को दर्शाता है।
- प्रजनन संबंधी स्वायत्तता (Reproductive Autonomy): इस प्रकार के प्रतिबंध अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित प्रजनन संबंधी विकल्पों में हस्तक्षेप कर सकते हैं। अनुच्छेद 21 में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और प्रजनन संबंधी स्वायत्तता का अधिकार भी शामिल है।
- लैंगिक असमानता (Gender Inequality): परिवार नियोजन से जुड़े निर्णयों पर सीमित नियंत्रण होने के बावजूद महिलाओं को ऐसे प्रतिबंधों के कारण असमान रूप से अयोग्यता का सामना करना पड़ सकता है।
- लोकतांत्रिक बहिष्करण (Democratic Exclusion): यह मानदंड अन्यथा पात्र नागरिकों को स्थानीय शासन व्यवस्था में भागीदारी करने से रोक सकता है।
- घटती प्रजनन दर (Declining Fertility Rate): भारत की कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate–TFR) वर्ष 2024 में घटकर 1.9 हो गई, जो लगभग 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर की प्रजनन दर से कम है। यह घटती प्रजनन दर और वृद्ध होती जनसंख्या की ओर बढ़ते बदलाव को दर्शाता है।
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विभिन्न राज्यों में वर्तमान स्थिति:
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत जानकारी के अनुसार, छह राज्य- असम, गोवा, गुजरात, महाराष्ट्र, ओडिशा और उत्तराखंड, अभी भी इस प्रकार के प्रतिबंध लागू किए हुए हैं। सात राज्यों ने ऐसे ही प्रावधानों को समाप्त कर दिया है, जबकि 15 राज्यों में इस तरह के कोई प्रावधान लागू नहीं हैं।
निष्कर्ष:
सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप जनसंख्या नीतियों को बदलती जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप बनाने की आवश्यकता को रेखांकित करता है। बड़ी पीठ द्वारा इस मामले पर पुनर्विचार जनसंख्या स्थिरीकरण, प्रजनन संबंधी स्वायत्तता, लैंगिक न्याय और लोकतांत्रिक भागीदारी के बीच संतुलन स्थापित करने की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होगा।
