संदर्भ:
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने कन्या भ्रूण हत्या और लिंग-चयन संबंधी प्रथाओं को रोकने तथा बालिका के अधिकारों की रक्षा के लिए पूर्व गर्भाधान और प्रसवपूर्व नैदानिक तकनीक (PCPNDT) अधिनियम, 1994 के सख्त क्रियान्वयन की आवश्यकता पर बल दिया।
न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियाँ:
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- न्यायालय ने कहा कि कई राज्यों में जन्म के समय लिंगानुपात अभी भी कम है, जो समाज में गहराई तक जमी पितृसत्तात्मक सोच और पुत्र-प्राथमिकता को दर्शाता है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जब तक समाज वास्तविक लैंगिक समानता को स्वीकार नहीं करता, तब तक कानूनी सुरक्षा उपाय आवश्यक रहेंगे।
- NFHS-5 (2019–21) के आंकड़ों का हवाला देते हुए न्यायालय ने बताया कि भारत का कुल लिंगानुपात बढ़कर प्रति 1000 पुरुषों पर 1020 महिलाएँ हो गया है। हालांकि, जन्म के समय लिंगानुपात केवल 929 लड़कियाँ प्रति 1000 लड़के है, जो दर्शाता है कि लिंग-चयन की प्रथाएँ अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं।
- न्यायालय ने कहा कि कई राज्यों में जन्म के समय लिंगानुपात अभी भी कम है, जो समाज में गहराई तक जमी पितृसत्तात्मक सोच और पुत्र-प्राथमिकता को दर्शाता है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जब तक समाज वास्तविक लैंगिक समानता को स्वीकार नहीं करता, तब तक कानूनी सुरक्षा उपाय आवश्यक रहेंगे।
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पीसीपीएनडीटी अधिनियम क्या है?
पूर्व गर्भाधान और प्रसवपूर्व नैदानिक तकनीक (PCPNDT) अधिनियम, 1994 को कन्या भ्रूण हत्या पर रोक लगाने और भारत में गिरते बाल लिंगानुपात की समस्या से निपटने के लिए बनाया गया था।
प्रमुख प्रावधान:
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- गर्भाधान से पहले और बाद में लिंग चयन पर प्रतिबंध।
- डॉक्टरों या डायग्नोस्टिक केंद्रों द्वारा भ्रूण का लिंग बताने पर रोक।
- सभी आनुवंशिक परामर्श केंद्रों, प्रयोगशालाओं और अल्ट्रासाउंड क्लीनिकों का पंजीकरण अनिवार्य।
- फॉर्म-F सहित विस्तृत अभिलेखों का रख-रखाव आवश्यक।
- नैदानिक तकनीकों का उपयोग केवल आनुवंशिक असामान्यताओं, गुणसूत्रीय विकारों और चयापचय संबंधी रोगों की पहचान के लिए अनुमत।
- गर्भाधान से पहले और बाद में लिंग चयन पर प्रतिबंध।
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दंड:
लिंग निर्धारण परीक्षण करना, बिना पंजीकरण के क्लीनिक चलाना, लिंग चयन सेवाओं का विज्ञापन करना या भ्रूण का लिंग बताना जैसे अपराधों पर 3 से 5 वर्ष तक का कारावास तथा जुर्माने का प्रावधान है।
पीसीपीएनडीटी अधिनियम के क्रियान्वयन में चुनौतियाँ:
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- कमजोर निगरानी और प्रवर्तन।
- उल्लंघनों की कम रिपोर्टिंग।
- पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड मशीनों का दुरुपयोग।
- गहरी पितृसत्तात्मक सोच और पुत्र-प्राथमिकता।
- लैंगिक समानता के प्रति जागरूकता का अभाव।
- कमजोर निगरानी और प्रवर्तन।
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लैंगिक समानता प्राप्त करने के लिए आवश्यक उपाय:
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- बेटियों के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण में परिवर्तन।
- महिला शिक्षा और आर्थिक सशक्तिकरण को बढ़ावा।
- बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे जागरूकता अभियानों को मजबूत करना।
- कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन और निगरानी व्यवस्था में सुधार।
- सभी क्षेत्रों में महिलाओं के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना।
- बेटियों के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण में परिवर्तन।
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निष्कर्ष:
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से स्पष्ट होता है कि यद्यपि पीसीपीएनडीटी अधिनियम लिंग-चयन संबंधी प्रथाओं को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, लेकिन स्थायी लैंगिक समानता केवल सामाजिक सोच में बदलाव, जागरूकता और महिलाओं एवं बालिकाओं के सशक्तिकरण के माध्यम से ही प्राप्त की जा सकती है।
FAQ
प्रश्न 1: पीसीपीएनडीटी अधिनियम क्या है?
उत्तर: यह 1994 का एक कानून है जो लिंग चयन पर रोक लगाता है और कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए प्रसवपूर्व नैदानिक तकनीकों को विनियमित करता है।
प्रश्न 2: भारत के जन्म के समय लिंगानुपात के बारे में NFHS-5 क्या बताता है?
उत्तर: NFHS-5 (2019–21) के अनुसार जन्म के समय लिंगानुपात प्रति 1000 लड़कों पर 929 लड़कियाँ है।
प्रश्न 3: पीसीपीएनडीटी अधिनियम के क्रियान्वयन में प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?
उत्तर: कमजोर प्रवर्तन, उल्लंघनों की कम रिपोर्टिंग, अल्ट्रासाउंड तकनीक का दुरुपयोग तथा समाज में पुत्र-प्राथमिकता।
प्रश्न 4: लैंगिक असंतुलन का दीर्घकालिक समाधान क्या है?
उत्तर: शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, सामाजिक जागरूकता और कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन के माध्यम से लैंगिक समानता को बढ़ावा देना।

