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Blog / 12 May 2026

धार्मिक शिक्षण संस्थानों पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला और इसके निहितार्थ

धार्मिक शिक्षण संस्थानों पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला और इसके निहितार्थ

संदर्भ:

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने धार्मिक शिक्षा प्रदान करने वाले संस्थानों के वर्गीकरण का निर्णय केंद्र सरकार पर छोड़ दिया है। न्यायालय ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि यह नीतिगत मामला केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में आता है। याचिका में मांग की गई थी कि धार्मिक शिक्षा देने वाले संस्थानों को 'धर्मनिरपेक्ष या व्यावसायिक' मानने की अपेक्षा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 26(क) के तहत 'धार्मिक व धर्मार्थ संस्थान' घोषित किया जाए।

मुख्य संवैधानिक प्रावधान:

यह मामला भारतीय संविधान के भाग-3 (मौलिक अधिकार) के तहत विभिन्न अनुच्छेदों के बीच संतुलन और उनकी व्याख्या से जुड़ा है:

      • अनुच्छेद 26(क) बनाम अनुच्छेद 30(1): याचिकाकर्ता का तर्क है कि जो संस्थान किसी विशेष धर्म को बढ़ावा देने के लिए मुख्य रूप से धार्मिक शिक्षा देते हैं, उन्हें अनुच्छेद 30(1) के तहत 'अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान' का विशेषाधिकार नहीं मिलना चाहिए। उन्हें अनुच्छेद 26(क) के तहत 'धार्मिक व धर्मार्थ संस्थान' माना जाना चाहिए।
      • अनुच्छेद 19(1)(छ) का दायरा: याचिका के अनुसार, अनुच्छेद 30(1) कोई अतिरिक्त या विशेष अधिकार नहीं देता, बल्कि यह अनुच्छेद 19(1)(छ) (व्यापार या पेशा करने का अधिकार) का ही विस्तार है। इसलिए, धार्मिक शिक्षा को विशुद्ध व्यावसायिक या धर्मनिरपेक्ष आधुनिक शिक्षा के समकक्ष नहीं रखा जा सकता।
      • सार्वजनिक प्रतिबंधों की प्रयोज्यता: यदि इन संस्थानो को अनुच्छेद 26(क) के तहत वर्गीकृत किया जाता है, तो ये राज्य द्वारा आरोपित सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order), नैतिकता (Morality) और स्वास्थ्य (Health) के प्रतिबंधों के सीधे अधीन आ जाएंगे।

संस्थानों के वर्गीकरण के निहितार्थ:

यदि शिक्षा मंत्रालय इन संस्थानों को 'धार्मिक/धर्मार्थ' घोषित करता है, तो इसके व्यापक प्रशासनिक और सामाजिक प्रभाव होंगे:

      • राज्य का नियामक नियंत्रण: वर्तमान में अनुच्छेद 30(1) के तहत अल्पसंख्यक संस्थानों को प्रशासनिक स्वतंत्रता प्राप्त है। अनुच्छेद 26(क) के अंतर्गत आने पर, राज्य को बच्चों की सुरक्षा, पाठ्यक्रम की निगरानी और शिक्षकों की योग्यता तय करने का व्यापक कानूनी अधिकार मिल जाएगा।
      • शिक्षा का अधिकार (RTE) और अनुच्छेद 21A: 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए अनिवार्य आधुनिक शिक्षा का अधिकार (अनुच्छेद 21A) सुनिश्चित करना राज्य का दायित्व है। धार्मिक संस्थानों के अनियंत्रित संचालन से बच्चों के वैज्ञानिक व धर्मनिरपेक्ष शिक्षा पाने के अधिकार का हनन होने की संभावना बनी रहती है।
      • राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक ताना-बाना: याचिका में सीमावर्ती क्षेत्रों में चल रहे अपंजीकृत संस्थानों का उदाहरण देते हुए कट्टरपंथ की आशंका जताई गई थी। सख्त नियमन से राष्ट्रीय अखंडता और बंधुत्व (Fraternity) को मजबूती मिल सकती है।

न्यायालय का दृष्टिकोण: शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत:

सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में हस्तक्षेप न करके शक्ति पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत का सम्मान किया है। न्यायालय का मानना है कि:

      • किसी संस्थान की प्रकृति तय करना और उसके लिए नियम बनाना कार्यपालिका (Executive) का कार्य है।
      • न्यायपालिका को नीतिगत मामलों में तब तक 'न्यायिक सक्रियता' (Judicial Activism) नहीं दिखानी चाहिए जब तक कि किसी स्पष्ट मौलिक अधिकार का उल्लंघन न हो रहा हो।

निष्कर्ष:

भारत जैसे बहुधार्मिक और धर्मनिरपेक्ष देश में धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25-28) और सांस्कृतिक/शैक्षणिक अधिकार (अनुच्छेद 29-30) के बीच एक बारीक संतुलन आवश्यक है। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय को अब एक स्पष्ट नीतिगत ढांचा तैयार करना चाहिए, जो धार्मिक शिक्षा के अधिकार का सम्मान करने के साथ-साथ यह भी सुनिश्चित करे कि 14 वर्ष से कम उम्र के प्रत्येक बच्चे को मुख्यधारा की आधुनिक व व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त हो सके।

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