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Blog / 07 Jan 2026

यूएपीए के तहत ज़मानत पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

संदर्भ:

5 जनवरी 2026 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े साज़िश के मामले में छात्र कार्यकर्ताओं उमर ख़ालिद और शरजील इमाम को ज़मानत देने से इंकार कर दिया। हालांकि, अदालत ने अन्य पाँच सह-आरोपियों को कुछ शर्तों के साथ ज़मानत प्रदान की। यह फैसला आतंकवाद-रोधी क़ानूनों, विशेष रूप से गैरकानूनी गतिविधियाँ (निवारण) अधिनियम (यूएपीए) के अंतर्गत मामलों में अदालत द्वारा अपनाए जाने वाले कड़े और सतर्क न्यायिक दृष्टिकोण को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।

मामले की पृष्ठभूमि:

2020 में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के विरोध प्रदर्शनों के दौरान उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंसक घटनाएँ हुईं, जिनमें कई लोगों की मृत्यु हुई और बड़ी संख्या में लोग घायल हुए। इन घटनाओं की यूएपीए के तहत की गई जांच में आरोप लगाया गया कि राष्ट्रीय राजधानी में सुनियोजित तरीके से हिंसा फैलाने के लिए एक बड़ी आपराधिक साज़िशरची गई थी।

सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियाँ:

      • ज़मानत से इंकार: अदालत ने कहा कि यूएपीए के अंतर्गत उपलब्ध प्रथम दृष्टया सबूत से यह संकेत मिलता है कि उमर ख़ालिद और शरजील इमाम की कथित गतिविधियाँ सार्वजनिक व्यवस्था और आंतरिक सुरक्षा को प्रभावित करने वाली हैं। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यूएपीए की धारा 43डी(5) के तहत ज़मानत सामान्य नियम नहीं बल्कि एक अपवाद है और केवल लंबी अवधि की हिरासत अपने आप में ज़मानत का आधार नहीं बन सकती।
      • भिन्न न्यायिक दृष्टिकोण: जिन पाँच सह-आरोपियों को सशर्त ज़मानत दी गई, उनकी भूमिका सीमित पाई गई। इसके विपरीत, उमर ख़ालिद और शरजील इमाम पर कथित रूप से योजना निर्माण और लोगों को संगठित करने में केंद्रीय भूमिका निभाने का आरोप है।
      • भविष्य में ज़मानत का अवसर: अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अभियुक्त एक वर्ष की अवधि पूर्ण होने के बाद या संरक्षित गवाहों की गवाही के समापन के पश्चात नई ज़मानत याचिका दायर कर सकते हैं, जिससे न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता और संतुलन बना रहे।

यूएपीए के तहत ज़मानत से जुड़े प्रमुख न्यायिक उदाहरण:

      • भारत संघ बनाम के.ए. नजीब (2021):
        • अभियुक्त पाँच वर्षों से अधिक समय तक विचाराधीन हिरासत में रहा, जबकि अभियोजन पक्ष के 276 गवाहों की गवाही अभी शेष थी।
        • सर्वोच्च न्यायालय ने यूएपीए की धारा 43डी(5) की कठोरता के बावजूद, अत्यधिक लंबी हिरासत को आधार बनाते हुए ज़मानत प्रदान की।
      • भीमा कोरेगांव मामला शोमा सेन (अप्रैल 2024):
        • लंबे समय से जारी विचाराधीन हिरासत को देखते हुए अभियुक्त को ज़मानत दी गई।
        • न्यायालय ने पुनः रेखांकित किया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत किसी भी व्यक्ति को स्वतंत्रता से वंचित करना तभी उचित है जब वह न्यायसंगत, उचित और संतुलित हो।
      • शेख़ जावेद इक़बाल मामला (जुलाई 2024):
        • एक नेपाली नागरिक नौ वर्षों से अधिक समय तक यूएपीए के तहत हिरासत में रहा, जबकि अब तक केवल दो गवाहों की ही गवाही हो सकी थी।
        • सर्वोच्च न्यायालय ने इसे त्वरित सुनवाई के अधिकार के उल्लंघन का मामला मानते हुए ज़मानत प्रदान की।

कानूनी तर्क और संवैधानिक पहलू:

      • यूएपीए और सख़्त ज़मानत व्यवस्था:
        • गैरकानूनी गतिविधियाँ (निवारण) अधिनियम, 1967, ज़मानत के लिए अत्यंत कठोर नियम स्थापित करता है।
        • धारा 43डी(5): यदि प्रथम दृष्टया साक्ष्य आरोपों को सही साबित करते हैं, तो यह धारा ज़मानत पर रोक लगाती है। इसका अर्थ है कि प्रारंभिक चरण में रिहाई की संभावना बहुत सीमित हो जाती है और अभियोजन के आकलन को विशेष महत्व दिया जाता है।
        • न्यायिक दृष्टिकोण: यूएपीए के तहत ज़मानत सामान्य प्रक्रिया नहीं है; इसमें अभियुक्त की भूमिका और उपलब्ध साक्ष्यों की गहन न्यायिक जांच आवश्यक है।
      • अनुच्छेद 21 — व्यक्तिगत स्वतंत्रता बनाम वैधानिक सीमाएँ:
        • संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार सुनिश्चित करता है।
        • अदालत ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद से जुड़े मामलों में संवैधानिक संरक्षण स्वतः वैधानिक प्रतिबंधों पर हावी नहीं हो सकता।
        • यूएपीए के तहत प्रथम दृष्टया निष्कर्ष यह दर्शा सकते हैं कि निरंतर हिरासत उचित है, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखता है।

निष्कर्ष:

उमर ख़ालिद और शरजील इमाम को ज़मानत न देने का सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय यूएपीए के तहत कड़े ज़मानत मानकों को स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है। यह फैसला दर्शाता है कि न्यायपालिका संवैधानिक स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास कर रही है। साथ ही, यह निर्णय भारत में आतंकवाद-रोधी कानूनों, विचाराधीन हिरासत, और न्यायिक विवेकाधिकार पर चल रही बहस को भी प्रभावित करेगा।