न्यूक्लिक एसिड परीक्षण को अनिवार्य बनाने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इंकार किया
संदर्भ:
हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई को खारिज़ कर दिया, जिसमें देश के सभी रक्त बैंकों में न्यूक्लिक एसिड एम्प्लीफिकेशन टेस्टिंग (NAT) को अनिवार्य बनाने की मांग की गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि:
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- यह जनहित याचिका सर्वेशम मंगलम फाउंडेशन नामक गैर-सरकारी संगठन द्वारा दायर की गई थी।
- याचिका में निम्नलिखित निर्देश देने की मांग की गई थी:
- सभी रक्त बैंकों में NAT परीक्षण को अनिवार्य किया जाए।
- “सुरक्षित रक्त का अधिकार” को संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन के अधिकार) का हिस्सा माना जाए।
- सभी रक्त बैंकों में NAT परीक्षण को अनिवार्य किया जाए।
- याचिका में तर्क दिया गया कि वर्तमान स्क्रीनिंग विधियां, जैसे कि ELISA, संक्रमण को प्रारंभिक अवस्था में पहचानने में विफल हो सकती हैं।
- यह जनहित याचिका सर्वेशम मंगलम फाउंडेशन नामक गैर-सरकारी संगठन द्वारा दायर की गई थी।
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सुप्रीम कोर्ट का तर्क:
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस याचिका को स्वीकार करने से इंकार करते हुए कई महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ कीं।
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- नीतिगत निर्णयों के लिए विशेषज्ञ आकलन आवश्यक: न्यायालय ने कहा कि यह तय करना कि NAT परीक्षण को अनिवार्य किया जाना चाहिए या नहीं, एक तकनीकी चिकित्सा विशेषज्ञता और नीतिगत विचार-विमर्श का विषय है, जिस पर निर्णय लेना न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।
- वित्तीय प्रभाव: पीठ ने यह भी उल्लेख किया कि NAT परीक्षण अपेक्षाकृत महंगा है और इसे पूरे देश में अनिवार्य बनाने से राज्यों पर उल्लेखनीय वित्तीय बोझ पड़ सकता है।
- कार्यपालिका की भूमिका: न्यायालय ने याचिकाकर्ता को यह अनुमति दी कि वह स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय तथा राज्य स्वास्थ्य विभागों को एक अभ्यावेदन प्रस्तुत कर सकता है। ये संस्थाएँ विशेषज्ञों से परामर्श करके इस विषय पर नीतिगत स्तर पर निर्णय ले सकती हैं।
- नीतिगत निर्णयों के लिए विशेषज्ञ आकलन आवश्यक: न्यायालय ने कहा कि यह तय करना कि NAT परीक्षण को अनिवार्य किया जाना चाहिए या नहीं, एक तकनीकी चिकित्सा विशेषज्ञता और नीतिगत विचार-विमर्श का विषय है, जिस पर निर्णय लेना न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।
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न्यूक्लिक एसिड परीक्षण (NAT) के बारे में:
न्यूक्लिक एसिड परीक्षण (NAT) एक आणविक निदान तकनीक है, जो रक्त नमूनों में रोगजनकों की आनुवंशिक सामग्री (डीएनए या आरएनए) का पता लगाती है।
प्रमुख विशेषताएँ:
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- यह संक्रमण को प्रारंभिक अवस्था में ही पहचान सकता है, यहाँ तक कि एंटीबॉडी बनने से पहले भी।
- इसका उपयोग निम्नलिखित वायरस की पहचान के लिए किया जाता है:
- एचआईवी
- हेपेटाइटिस बी
- हेपेटाइटिस सी
- एचआईवी
- यह उस “विंडो अवधि” को कम करने में सहायता करता है, जिसके दौरान संक्रमण का पता नहीं चल पाता।
- यह संक्रमण को प्रारंभिक अवस्था में ही पहचान सकता है, यहाँ तक कि एंटीबॉडी बनने से पहले भी।
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NAT बनाम पारंपरिक परीक्षण:
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पहलू |
NAT |
ELISA (पारंपरिक) |
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पहचान की विधि |
वायरल डीएनए/आरएनए का पता लगाता है |
एंटीबॉडी का पता लगाता है |
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विंडो अवधि |
कम |
अधिक |
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सटीकता |
अधिक |
मध्यम |
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लागत |
महंगा |
सस्ता |
भारत में रक्त सुरक्षा का ढाँचा:
कानूनी और नीतिगत ढाँचा:
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- ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स अधिनियम, 1940 – रक्त बैंकों का विनियमन करता है।
- राष्ट्रीय रक्त नीति (2002) – सुरक्षित और पर्याप्त रक्त आपूर्ति सुनिश्चित करने का उद्देश्य रखती है।
- राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (NACO) द्वारा रक्त जांच के लिए दिशानिर्देश।
- ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स अधिनियम, 1940 – रक्त बैंकों का विनियमन करता है।
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वर्तमान स्क्रीनिंग विधियाँ:
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- अधिकांश रक्त बैंक वर्तमान में निम्नलिखित परीक्षणों पर निर्भर करते हैं:
- ELISA परीक्षण
- त्वरित एंटीबॉडी परीक्षण
- ELISA परीक्षण
- NAT परीक्षण वर्तमान में लागत और बुनियादी ढांचे की सीमाओं के कारण केवल कुछ उन्नत अस्पतालों और रक्त बैंकों में ही उपलब्ध है।
- अधिकांश रक्त बैंक वर्तमान में निम्नलिखित परीक्षणों पर निर्भर करते हैं:
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निष्कर्ष:
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय तकनीकी नीतिगत मामलों में न्यायिक संयम को दर्शाता है तथा यह भी रेखांकित करता है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े निर्णय विशेषज्ञों के परामर्श पर आधारित होने चाहिए। यद्यपि NAT परीक्षण रक्त की सुरक्षा को काफी हद तक बेहतर बना सकता है, लेकिन इसे पूरे देश में लागू करने से पहले लागत, बुनियादी ढाँचे और स्वास्थ्य संबंधी प्राथमिकताओं का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन आवश्यक है।
