संदर्भ:
हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) में सुधारों को संस्थागत रूप दिया जाना चाहिए और उन्हें सार्थक निरंतरता के साथ लागू किया जाना चाहिए। परीक्षा संबंधी संकट उत्पन्न होने के बाद तत्काल प्रतिक्रिया के रूप में बार-बार नए सुधार लागू करना उचित नहीं है। न्यायालय ने सवाल उठाया कि यदि लगातार नई समितियां बनाई जाती रहें, तो क्या इससे पहले की समितियों की सिफारिशों को ठीक से लागू किए बिना बार-बार बदलाव होते रहेंगे।
पृष्ठभूमि:
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- 2017 में स्थापित NTA देश की प्रमुख राष्ट्रीय परीक्षाएं जैसे NEET-UG, JEE (Main), CUET और UGC-NET आयोजित करती है। इतने बड़े स्तर पर परीक्षाएं आयोजित किए जाने के कारण परीक्षा की विश्वसनीयता और निष्पक्षता करोड़ों विद्यार्थियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- परीक्षाओं में अनियमितताओं को लेकर उत्पन्न विवादों के बाद सरकार ने के. राधाकृष्णन समिति का गठन किया था। समिति ने NTA के प्रशासन, परीक्षा सुरक्षा, तकनीक और परीक्षा संचालन की प्रक्रियाओं में व्यापक सुधारों का सुझाव दिया। इसके बाद वर्ष 2026 में नंदन नीलेकणि की अध्यक्षता में एक नई कार्यदल का गठन किया गया, जिसका उद्देश्य सार्वजनिक परीक्षाओं के तकनीकी और सुरक्षा संबंधी पक्षों को मजबूत करना है।
- 2017 में स्थापित NTA देश की प्रमुख राष्ट्रीय परीक्षाएं जैसे NEET-UG, JEE (Main), CUET और UGC-NET आयोजित करती है। इतने बड़े स्तर पर परीक्षाएं आयोजित किए जाने के कारण परीक्षा की विश्वसनीयता और निष्पक्षता करोड़ों विद्यार्थियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
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सर्वोच्च न्यायालय की चिंता:
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- सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि नई समिति का गठन करने का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि पहले के विशेषज्ञ समूह की सिफारिशों को छोड़ दिया जाए। न्यायालय ने सरकार से राधाकृष्णन समिति की सिफारिशों के क्रियान्वयन के बारे में सवाल किया।
- न्यायालय का मुख्य संदेश था कि सुधार “सजीव और संस्थागत” होने चाहिए तथा उन्हें एक अधिकारी के बाद आने वाले दूसरे अधिकारियों द्वारा भी निरंतर आगे बढ़ाया जाना चाहिए। नई समिति को पहले से उपलब्ध संस्थागत अनुभव और ज्ञान पर आगे निर्माण करना चाहिए, न कि उसे पूरी तरह समाप्त करके नई व्यवस्था शुरू करनी चाहिए।
- सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि नई समिति का गठन करने का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि पहले के विशेषज्ञ समूह की सिफारिशों को छोड़ दिया जाए। न्यायालय ने सरकार से राधाकृष्णन समिति की सिफारिशों के क्रियान्वयन के बारे में सवाल किया।
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परीक्षा सुधार क्यों आवश्यक हैं?
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- संगठित कदाचार: प्रश्नपत्र लीक होने के पीछे अत्यधिक संगठित गिरोह, बिचौलिए और परीक्षा से जुड़े अंदरूनी लोग शामिल हो सकते हैं। इससे परीक्षा की पूरी व्यवस्था असुरक्षित हो जाती है।
- तकनीकी कमजोरियां: बढ़ते डिजिटलीकरण के कारण हैकिंग, अनधिकृत प्रवेश और आंकड़ों की चोरी जैसे जोखिम भी बढ़ रहे हैं। इसलिए सुरक्षित कूटलेखन, प्रवेश नियंत्रण और लगातार निगरानी आवश्यक है।
- आंतरिक व्यक्तियों से उत्पन्न खतरा: प्रश्नपत्र तैयार करने, छापने, ले जाने और सुरक्षित रखने की प्रक्रिया में अनेक कर्मचारी शामिल होते हैं। किसी भी स्तर पर कमजोर जवाबदेही परीक्षा की गोपनीयता को खतरे में डाल सकती है।
- विद्यार्थियों पर प्रभाव:
- परीक्षाओं में अनियमितताओं के कारण मानसिक तनाव, आर्थिक नुकसान, शैक्षणिक विलंब और अनिश्चितता पैदा होती है। परीक्षाओं को बार-बार रद्द करने और दोबारा आयोजित करने से लाखों अभ्यर्थियों का शैक्षणिक कैलेंडर प्रभावित हो सकता है।
- इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रश्नपत्र लीक होने से योग्यता-आधारित चयन और समान अवसर की भावना कमजोर होती है तथा प्रतियोगी परीक्षाओं में जनता का विश्वास प्रभावित होता है।
- संगठित कदाचार: प्रश्नपत्र लीक होने के पीछे अत्यधिक संगठित गिरोह, बिचौलिए और परीक्षा से जुड़े अंदरूनी लोग शामिल हो सकते हैं। इससे परीक्षा की पूरी व्यवस्था असुरक्षित हो जाती है।
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आवश्यक प्रमुख सुधार:
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- सिफारिशों को संस्थागत रूप देना: विशेषज्ञों की सिफारिशों को स्थायी मानक संचालन प्रक्रियाओं (SOP), सुरक्षा प्रोटोकॉल और जवाबदेही की व्यवस्थाओं में परिवर्तित किया जाना चाहिए।
- तकनीक को मजबूत करना: परीक्षा प्रबंधन में शुरू से अंत तक कूटलेखन, जैवमितीय प्रमाणीकरण, साइबर सुरक्षा जांच, सुरक्षित डिजिटल प्रणालियां और वास्तविक समय में निगरानी को शामिल किया जाना चाहिए।
- मानव संसाधन में सुधार: NTA को साइबर सुरक्षा, मनोमितीय परीक्षण, मूल्यांकन प्रणाली, आंकड़ा विज्ञान और परीक्षा सुरक्षा जैसे क्षेत्रों के विशेषज्ञ पेशेवरों की आवश्यकता है।
- पूरी आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित करना: सुरक्षा व्यवस्था प्रश्न निर्माण और कूटलेखन से लेकर प्रश्नपत्र के परिवहन, भंडारण, वितरण और मूल्यांकन तक पूरी प्रक्रिया में लागू होनी चाहिए।
- स्वतंत्र लेखा-परीक्षण: परीक्षा केंद्रों, तकनीकी प्रणालियों, सेवा प्रदाताओं और सुरक्षा प्रक्रियाओं का नियमित स्वतंत्र लेखा-परीक्षण किया जाना चाहिए, ताकि कमजोरियों की पहचान संकट उत्पन्न होने से पहले ही की जा सके।
- सिफारिशों को संस्थागत रूप देना: विशेषज्ञों की सिफारिशों को स्थायी मानक संचालन प्रक्रियाओं (SOP), सुरक्षा प्रोटोकॉल और जवाबदेही की व्यवस्थाओं में परिवर्तित किया जाना चाहिए।
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आगे की राह:
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- नंदन नीलेकणि के नेतृत्व वाले कार्यदल को पहले किए गए सुधारों को समाप्त करने के बजाय उनके आधार पर आगे बढ़ना चाहिए। सरकार को ऐसी संस्थागत स्मृति विकसित करनी चाहिए, जिससे समितियों, अधिकारियों या सरकारों में बदलाव होने के बावजूद सुधारों की प्रक्रिया लगातार जारी रहे।
- अंतिम उद्देश्य ऐसी NTA का निर्माण होना चाहिए जिसमें व्यावसायिक स्वायत्तता, तकनीकी क्षमता, साइबर सुरक्षा, पारदर्शिता और जवाबदेही का समुचित समन्वय हो।
- नंदन नीलेकणि के नेतृत्व वाले कार्यदल को पहले किए गए सुधारों को समाप्त करने के बजाय उनके आधार पर आगे बढ़ना चाहिए। सरकार को ऐसी संस्थागत स्मृति विकसित करनी चाहिए, जिससे समितियों, अधिकारियों या सरकारों में बदलाव होने के बावजूद सुधारों की प्रक्रिया लगातार जारी रहे।
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निष्कर्ष:
सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी शासन व्यवस्था के लिए एक व्यापक संदेश देती है कि संस्थाओं को हर संकट के बाद स्वयं को बार-बार नए सिरे से गढ़ने के बजाय संकटों से सीखना चाहिए। परीक्षा व्यवस्था में स्थायी सुधार के लिए निरंतरता, प्रभावी क्रियान्वयन और संस्थागत व्यवस्था आवश्यक है। तभी NTA भारत की प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली के लिए आवश्यक विश्वसनीयता, निष्पक्षता और जनविश्वास को पुनः स्थापित कर सकेगी।
